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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - शिक्षा नीति 2020: ये तो होना ही था

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - शिक्षा नीति 2020: ये तो होना ही था

देश की शिक्षा नीति में 34 साल बाद बदलाव किया जा रहा है। इस बदलाव को लेकर हमेशा की तरह सत्तापक्ष कसीदे पढ़ रहा है और विपक्ष आलोचना कर रहा है। डब्ल्यूटीओ के एजेंडे से बंधे होने के कारण हमें थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ डब्ल्यूटीओ द्वारा दिये गये मसौदे के अनुसार शिक्षा नीति घोषित करनी थी। जिसकी शुरूआत यूपीए की सरकार के समय 2013 में ही हो चुकी थी। जब दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम लाया गया था तब बहुत सारे वामपंथी संगठनों और कांग्रेस की अपने संगठन के भारी विरोध को देखते हुए इसे वापस लेना पड़ा था, उस समय आरएसएस ने इसका विरोध नहीं किया था। आज आरएसएस थोड़ी बहुत असहमति के साथ शिक्षा नीति का स्वागत कर रही है।

नई शिक्षा नीति 2020 का मूल दस्तावेज सुंदर और सुनहरे शब्दों से सजा लगभग 480 पृष्ठों का प्रतिवेदन है। इसे भारत की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक स्तर के अनुकूल ढालने के बेहद उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह सही है कि बदलते समय की आवश्यकता के अनुकूल शिक्षा में समय-समय पर परिवर्तन की आवश्यकता होती है। 1948, 1968, 1986, 1992 वे पड़ाव है जब शिक्षा पद्धति में सामयिक परिवर्तन हुए। इक्कीसवीं सदी वैश्वीकरण की सदी है। इसके फलस्वरूप आर्थिक-सामाजिक स्तर पर जो परिवर्तन हुए हैं उनके अनुरूप भारत जैसे पिछड़े देश के शिक्षा में भी बदलाव की मांग अनावश्यक नहीं है, लेकिन यदि विश्व पूंजीवाद की मांग और बाजार की जरूरत के अनुसार शिक्षा को रूपांतरित करना अनिवार्य मान लिया जाए तो शिक्षा निश्चय ही अपने बुनियादी उद्देश्य से भटक जाएगी। नई शिक्षा नीति की नीयत इस बात से खुल जाती है कि शिक्षा को लोककल्याणकारी राज्य की प्राथमिक जि़म्मेदारी नहीं, बल्कि पण्य वस्तु  (बिकाऊ माल) की तरह देखा जा रहा है। दरअसल विश्व व्यापार संगठन की रीति-नीति से बँधी सरकारों पर शिक्षा के कथित अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने का दबाव है। इसके तहत उच्च शिक्षा में सकल नामांकन दर में वृद्धि, देसी शिक्षा बाज़ार को विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए सुगम बनाना, शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता प्रदान करना, उत्कृष्टता संस्थानों को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करना, यूरोपीय मानक के अनुरूप चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू करना आदि उपाय शामिल हैं। इनके चलते शिक्षा के पंजीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग की पहुँच मुश्किल होगी यानी शिक्षा सामाजिक भेदभाव में बढ़ोत्तरी करेगी और अद्र्धशिक्षित युवाओं की फौज तैयार करेगी जो अभी भी हमारे यहां मौजूद है। इस मसौदे में 3 वर्ष से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त अनिवार्य शिक्षा, 2025 तक पूर्व प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण, एक भौगोलिक क्षेत्र के विद्यालयों का क्लस्टर, मिड डे मील के साथ नाश्ते के प्रबंध, शिक्षकों के स्तरोन्नयन के उपाय, शिक्षा के बजट में वृद्धि आदि अनेक अच्छे सुझाव भी हैं। शिक्षा के भगवाकरण की जो आशंका थी, वह मुखर हो कर दिखाई नहीं देती। लेकिन सबसे बड़ी आशंका यही है कि सरकार अपने प्रच्छन्न एजेंडा को चोर दरवाज़े से भी लागू कर सकती है। वैसे भी नई शिक्षा नीति का मसौदा अभी केवल सार्वजनिक किया गया है। संसद से उसकी स्वीकृति, बजट प्रावधान आदि औपचारिकताएं अभी बाकी हैं। अगर यह लागू होता है तो अच्छी बातें लागू होने के लाभ की तुलना में वे प्रावधान ज़्यादा नुकसानदेह होंगे जिन्हें विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के तहत लागू करने की प्रतिबध्दता उससे सम्बधित समझौते पर हस्ताक्षर करने के साथ ही सरकार जता चुकी है।

पूरी दुनिया में एक तरह के शिक्षा फ्रेम वर्क को लेकर 1999 में पहली बार इटली के बलूना नामक शहर में शिक्षा एक तरह की होना चाहिए, इस पर विचार हुआ। कॉलेज एजुकेशन ने 4 वर्षीय यूरोपियन मॉडल स्वीकार किये गये और सकल अनुपात नामांकन का लक्ष्य भी न्यूनतम 50 प्रतिशत तक लाने की बात हुई। इस सम्मेलन के दो साल बाद जर्मनी कन्वेशन हुआ जिसमें पूरी दुनिया में क्वालीफिकेशन फ्रेमवर्क पर बात हुई। इसी आधार पर पिछले साल हमारे देश के चुनिंदा 20 शिक्षण संस्थाओं और पिछड़े क्षेत्र के महाविद्यालयों से मसौदे पर राय मांगी गई। हमारे देश में सबसे पहले 1948 में डॉ. राधाकृष्ण की अध्यक्षता में किस तरह की शिक्षा हो इसके लिए समिति बनी। इस समिति ने आजादी के समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा। उसके बाद औद्योगिकरण को ध्यान में रखकर 1964 में कोठारी कमेटी गठित की गई जिसने 1966 में रिपोर्ट दी। 1986 में 21वीं सदी को ध्यान में रखकर नई शिक्षा नीति आई। वर्ष 1992 में राममूर्ति कमेटी बनी, फिर यशपाल कमेटी की अनुशंसाएं आई जिसके आधार पर आज तक की शिक्षा व्यवस्था संचालित है। नेशनल केलीकुलम फेमवर्क द्वारा पाठ्यक्रम 2005 में तैयार किया गया था जिसमें बदलाव का काम शुरु हो गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया। 1985 के पहले शिक्षा मंत्रालय ही था। भाजपा सरकार की नाम बदलने में विशेष रूचि है।

पूरी दुनिया के तय व्यापार की तरह शिक्षा भी एक व्यापारनीति है जिसमें सारी दुनिया में एक तरह की पढ़ाई हो, यह डब्ल्यूटीओ चाहता है। जबकि होना यह चाहिए कि हमारे देश की और समय की आवश्यकता के अनुसार शिक्षा नीति बने, ना की शिक्षा को व्यापार में बदलने वाली नीति। शिक्षा नीति के मसौदे को अंतिम रूप देने में अहम भूमिका निभाने वाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आग्रह पर धर्म, ज्योतिष, पुरातन ज्ञान, मातृभाषा को तो शामिल कर लिया गया, किंतु उसके विरोध के बावजूद विदेशी शिक्षण संस्थाओं को अपने कैंपस खोलने की अनुमति दे दी गई। आरएसएस का कहना है कि नई नीति को और लचीला बनाना चाहिए। अनिवार्य रूप से हिन्दी को शामिल करना चाहिए था। स्वदेशी जागरण मंच ने विदेशी विवि के कैंपस स्थापित करने का विरोध किया है।

शिक्षा नीति 2020 के मसौदे में उच्च शिक्षा के लिए जो तीन तरह के विश्वविद्यालय की बात कही गई है उसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। ए श्रेणी के विश्वविद्यालय जो रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में काम करेंगे। ब श्रेणी के विश्वविद्यालय जिनमें रिसर्च वर्क नहीं होगा, ये आटोनामस होंगे। स श्रेणी के विश्वविद्यालय जो सामान्य विश्वविद्यालय होंगे, जैसे मौजूदा विश्वविद्यालय हैं। इस शिक्षा नीति से विश्वविद्यालय की स्वायतता को खतरा बताया जा रहा है। दरअसल यह सब डब्ल्यूटीओ के फ्रेमवर्क में पहले से मौजूद बाते हैं जिन्हें स्वीकारना राष्ट्रों की मजबूरी है।

नई शिक्षा नीति को लेकर छत्तीसगढ़ के शिक्षाविदों का कहना है कि हमारे राज्य में लर्निंग कम्युनिटी, मातृभाषा में पढ़ाने या फार्मूला पहले ही हैं। नई शिक्षा नीति मातृभाषा में पढ़ाने की बात कर रही है वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में जिन चुनिंदा सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में तब्दील किया गया है वहां एडमिशन की मारामार हो रही है। यह इस बात का संकेत है कि लोग मातृभाषा से ज्यादा अंग्रेजी माध्यम से पढऩा चाहते हैं।

नई शिक्षा नीति के प्रारंभिक ड्राफ्ट और सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर लोगों का कहना है कि इस नीति के लागू होने से अपनी मातृभाषा में तो पढ़ाई करेंगे किन्तु वे अंग्रेजी से वंचित होंगे। इस नीति से निजी और सरकारी स्कूलों के बीच खाई बढ़ेगी। रोजगार की संभावनाओं पर असर पड़ेगा। लोगों के मन में यह भी आशंका है कि सरकार शिक्षा का निजीकरण कैसे रोकेगी। ज़ाहिर है शिक्षा नीति के अनूठे से लगते प्रावधानों में नया कुछ नहीं है। इनकी चर्चा पहले भी होती रही है। मगर इनसे शिक्षा की दिशा किसी हद तक ज़रूर बदलेगी।