मजदूरों को भी हैं वतन से ईश्क़

मजदूरों को भी हैं वतन से ईश्क़

जयमान एक्का

यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।


1. तेरे दर पे, हम भले मजलूम ही सही, पर मजदूर हैं ।

    तेरे शहर के वो चकाचौंध के दिए, वो हमसे ही नूर हैं ।।

    माना तेरे शहर, दौलत के मगरूर में बस किस कदर चूर हैं ।

    पर यकीन मानो, शहर हमारे कंधों पर ही टिका भरपूर हैं ।।

    तेरे ऊँचे-ऊँचे मंजिलों के हम ही तो करिगार हैं ।

    उनके दीवारों के भी, हम ही सिपाही-चौकीदार हैं ।।


यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

पर हमको भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।


2. देखों आज इन शहरों के कौन सरदार हैं ?

  शहर में क्या आफत आई, वो सड़को-सीमाओं पे,

  जैसे हमारे लिए ही खड़ा कर रहा पहरेदार हैं ।।

   बीमार आमिर शहजादे-शहजदियों को लाये गये,

   कितने शिद्दत से, जैसे कोई उनके रिश्तेदार हैं ।

   हम घर जाने निकले तो,

   हमें पकड़ के कारागार में ठूस रहे हैं,

    जैसे हम ही इस देश के असली गुनाहगार हैं ।।

यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।


3. हमारे देश में जो भी घुस रहा, 

    लगभग वो सभी देशी-विदेशी बीमार हैं ।

    फिर भी उन सभी प्रवेश द्वारों पे,

    न ही डिटेंशन कैम्प, न ही कोई दवादार हैं ।।

    हरेक आते विज़ादारों का चौदह दिन के,

    न ठीक से निरीक्षण-परीक्षण हो रहा,

   बस देश के हम सभी रहवासियों को ही,

   पुलिस डंडे लेकर क्यों कर रहा ख़बरदार हैं ??


यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क हैं ।।


4. मालूम हैं सभी को कोरोना बीमारी,

   लोगों में कितना असरदार हैं ?

    सभी तरफ मौत के ख़ौफ़ से,

    देखों हो रहा कितना हाहाकार हैं ??

     तौभी साहेब हमें जाने दो,

    हमारे जिन्दगी के आखिरी सांस तक,

     शायद हो रहा हमारा यह सफर हैं ।

     हम यहाँ खुद का हिफ़ाजत किससे करें ?

     महामारी या भूख से,

     मौत तो दोनों का ही एक बराबर हैं ।।

    हम जानते हैं, आपके चन्द ख़िदमतों से,

     न बदलने वाला ये हमारा तक़दीर हैं ।

      हमकों यह भी पता हैं, पूरे जीवन भर,

     भटकने वाले हम एक राहगीर हैं ।।


यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।


5. गाँव जायेंगे, वहाँ बिना ग़फ़लत के,

   थोड़ा महफूज रहेंगे ।

    रहे यहाँ तो भूख-प्यास से,

     जीएँ कैसे, कन्फ्यूज रहेंगे ??

    दिल को थोड़ा गाँव में, 

    अच्छा सुकून मिलेंगे ।

    इस तपती धूप में भी, वहाँ पेड़ों के,

    शीतल छाँव मिलेंगे ।।

   यहाँ रोज कितने जीने के वास्ते,

     मद्दत का गुहार लगाते रहेंगे ?

      वहाँ जाते ही गाँव में,

      रोज कई मददगार मिलेंगे ।।

यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं ।

 पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।


6. देश में बदहाली के बादल,

     छाये रहेंगे कब तक ?

   और जमी पे जुल्मदारों के,

     सितम होते रहेंगे कब तक ??

      मजदूरों का ईधर से उधर हो रहा पलायन, 

   यह सब बेरोजगारी का ही धोतक हैं ।

    जब तक हैं, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, नक्सलवादी,

    देश के लिए ये सभी बहुत घातक हैं ।।

    पता नही ये सभी कब से साथ चल रहा हैं,

    कई इंसानों के जन्म से मृत्यु तक ?

     पूछना था, आजादी के इतने सालों तक भी,

     ये किसके साये में पल रहा हैं अब तक ??


यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।

7. यहाँ किसको फ़र्क पड़ता हैं ?

    कोई गरीब-गरीबी से, कोई भूखा-भूखमरी से, 

   भले कितना भी तड़प-तड़प के मरता हैं ।

   

बदकिस्मती हैं कि कोई बीमारी से मरता हैं ।

यहाँ के इंसान तो हिन्दू-मुस्लिम के, 

    नफरतों में भी बेवजह मरता हैं ।।

      

धीरे-धीरे हो रहा लोकतंत्र भी अब लाचार हैं ।

क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में,

      हिन्दू-मुस्लिम के ही,

      ख़बर बस रहता जोरदार हैं ।।

     अर्थव्यवस्था सब चौपट, बैंक भी सभी डूब रहे हैं,

    

नेता, उद्योगपति जैसे बन गये कोई शाहूकार हैं ।

      अखबार से, टीवी से, क्यों हैं मुद्दे गायब ?

    वाजिब खबर यहाँ तो कितने भरमार हैं ??

    राज्यों के देश के सभी सरदार क्यों मौन हैं ?

    

कौन पूछेगा, देश के बदहाली का जिम्मेदार कौन हैं ??

यू तो रहना शहर में बड़ा रिश्क हैं।

पर हमकों भी अपने वतन से ईश्क़ हैं ।।