II तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर...सुभाष मिश्र उन दानवीरों की गाथाएं बता रहे हैं जो कोरोना.काल में किसी फरिश्ते की तरह जरूरतमंदों की मदद को सामने आए'

II तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर...सुभाष मिश्र उन दानवीरों की गाथाएं बता रहे हैं जो कोरोना.काल में किसी फरिश्ते की तरह जरूरतमंदों की मदद को सामने आए'

सुभाष मिश्र

कोरोना समय में समाज की सकारात्मकता और रचनात्मकता के सैकड़ों उदाहरण रोज देखने, सुनने मिलते हैं। हमारे मिथक के अनुसार 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य का जीवन मिलता है। मनुष्य बाकी प्राणियों से अपनी सामाजिकता, बुद्धि विवेक और जिज्ञासा के कारण अलग पहचान रखता है। मानव जाति के उत्पत्ति के विकास क्रम में मनुष्य ने धीरे-धीरे प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करके अपने को सिविलाईज किया है। उसकी आवश्यकताओं ने उससे नये-नये आविष्कार के लिये प्रेरित किया। मनुष्य ने कभी भी हार नहीं मानी। जिस चांद सितारों, ग्रहों को वो आश्चर्यचकित होकर देखता था, अपने गीतों में अपनी माशूका से वह कह रहा था 'चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो। उसने कल्पना से आगे उठकर उस चांद पर जाने का साहस किया अब वह कालोनी भी बसाना चाहता है। समूची मानव सभ्यता में मनुष्य की जिजीविषा के सैकड़ों उदाहरण मिलते हैं।

कला, संगीत, साहित्य और उसकी अपनी कल्पनाशक्ति मनुष्य को हर बार नया रचने के लिये प्रेरित किया। जो रचेगा, वो बचेगा. ये बात हमारा इतिहास हमें बताता है। दुनिया में विनाश के विरुद्ध सिर्फ एक ही उत्तर है और वह है सृजन। ऐसे अंधेरे समय में जब आपकी कुछ साफ-साफ दिखाई, सुनाई नहीं दे रहा हो तो आप जो कर सकते हैं, वह जरूर करें। इस सूत्र वाक्य को अपनाकर हमने कोरोना के कारण अपने-अपने घरों में बाकी लोगों से फिजिकल दूरी बनाकर बैठ लोगों ने अपनी सकारात्मक और रचनात्मक सोच के बहुत से उदाहरण प्रस्तुत किये है और जिनका सिलसिला निरंतर जारी है। इस कोरोना समय में घर में बैठे लोगों द्वारा सोशल मीडिया का जितना उपयोग किया जा रहा है शायद ही इसके पहले देखने को मिला है। अपनी तमाम तरह की व्यवस्थाओं के चलते जिन लोगों को अपनी रूचि के अनुसार काम के खुद में छिपी प्रतिभा को जानने, समझाने के अवसर नहीं मिले थे, उन्होंने खुद को नये तरीके से प्रस्तुत किया है। खेती किसानी, काम-धंधे और रोजी-रोटी की जद्दोजहद में लगे बहुत से लोग अपनी सकारात्मक भूमिका के साथ सामाजिक दायित्व में लगे हुए है। कोरोना में घर बैठे या ड्यूटी पर तैनात बहुत से लोगों की रचनात्मक नये तरीके से सामने आ रही है।

छत्तीसगढ़ बिलासपुर डीएसपी अभिनव उपाध्याय ने कोरोना के संक्रमण से बचने के लिये लोगों को गाना गाकर जागरूक किया। अभिनव उपाध्याय ने 'इक प्यार का नगमा है की तर्ज पर घर में ही रहना है, बाहर नहीं जाना है, सैनिटाइजर लगाना है, मिलकर हमको कोरोना को हराना है, गाकर लोगों को जागरुक किया। इसी तरह के गाने, कविताएं, टीकटॉक , लाईक वीडियो, खाना बनाने की विधि, पेंटिंग, स्लेमबुक, ट्रेडिशनल लुक में अपनी तस्वीर पोस्ट करना तथा नया क्या पढ़ रहे हैं सृजित कर रहे हैं ये भी एक-दूसरे को बताया जा रहा है। कोई जोक बना रहा है तो कोई गाने गा रहा है। किसी के पास आध्यात्मिक ज्ञान का भंडार है, तो कोई अध्यात्म का टार्च बेच रहा है। जिन चीजों से लोग वंचित हैं उन पर बहुत से टिकटाक, लाईक और वीडियो बनकर सामने आ रहे हैं।

पति-पत्नी के रिश्ते, दोस्तों की महफिल, शराब की जरूरत प्रेमी-प्रेमिकाओं का ना मिल पाना, खाना बनाने की विधियां तक आपस में शेयर कर रहे हैं। घर की चार दीवारी में कोरोना रूपी राक्षस से खुद को व अपने आसपास के लोगों को बचाते हुए जिनके पास टीवी, रेडियो, मोबाईल, इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटाप है से वे ढूंढ-ढांढकर वो सब देख रहे हैं जो उन्होंने इसके पहले नहीं देखा। धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे जाकर अपना बहुत सा समय काट देते थे या तीर्थाटन को निकल जाते थे, वे भी ईश्वर की तरह अपने अपने घरों में अकेले है। हिन्दी पट्टी के लोग जिन्होंने किताबों से दूरी बनाकर अच्छा पढऩा लिखना छोड़ दिया था अब पीडीएफ फार्म में कालमियों, कविताएं पोस्ट कर रहे हैं जिन्होंने अपने घरों में किसी भी काम में हाथ नहीं बंटाया था, वे घर में काम करते हुए वीडियो पोस्ट कर रहे हैं। ऐसे समय में घर बैठे लोगों को हमारे प्रधानमंत्री जी भी नये नये आइडिए के साथ ताली-थाली बजवा रहे हैं तो कहीं घर की बत्ती गोल करके मोमबत्ती, दीया, मोबाइल की लाईट जलाकर रोशनी करके राष्ट्रीय एकता का परिचय देने की बात बता रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, कोरोना समय में देश के लोगों को इसी तरह के नयाब आइडिया से जोड़े रखेंगे, उनके पास जनता को जोड़े रखने के बहुत से हुनर जानते हैं। दुनिया के और समाज की तुलना में भारतीय समाज के लोग ज्यादा ही वाचाल और सामाजिक है। हम उत्सवधर्मि समाज में रहते है। हमारे यहां साल भर कोई न कोई तीज त्यौहार होता है। हम तो तेरहवीं की उत्सव की तरह मनाते हैं। समाज में बढ़ रही उत्सव धार्मिकता और दिखाने की संस्कृति पर रोक लगाने के लिए बहुत से समाज के लोगों ने तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। इस प्रतिबंधित कोरोना समय में उत्सव धर्मिता से भरे लोग घर में खाली तो बैठ नहीं सकते सो उनकी व्यक्तिगत रचनात्मक और सामाजीकरण जारी है।

बहुत से लोगों को इस कोरोना समय में मीडिया के जरिए घर बैठे—बैठे इस तरह का दिव्य ज्ञान भी प्राप्त हुआ है। आज अमेरिका अग्रणी देश नहीं है। चीन ने तीसरे विश्वयुद्ध का आगाज किया और बिना एक मिसाइल फायर किये, उसे जीत भी लिया। यूरोपीय उतने शिक्षित नहीं जितना उन्हें समझा जाता था। हम अपनी छुट्टियाँ बिना यूरोप या अमेरिका गये भी आनन्द के साथ बिता सकते हैं। भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता विश्व के लोगों से बहुत ज्यादा है। कोई पादरी, पुजारी, ग्रन्थी,मौलवी या ज्योतिषी एक भी रोगी को नहीं बचा सका। स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस कर्मी, प्रशासन कर्मी ही असली हीरो हैं ना कि क्रिकेटर, फिल्मी सितारे व फुटबाल प्लेयर। बिना उपभोग के विश्व में सोना-चॉंदी व तेल का कोई महत्व नहीं।, पहली बार पशु व परिन्दों को लगा कि यह संसार उनका भी है। तारे वास्तव में टिमटिमाते हैं यह विश्वास महानगरों  के बच्चों को पहली बार हुआ।, विश्व के अधिकतर लोग अपना कार्य घर से भी कर सकते हैं।, हम और हमारी सन्तान बिना जंक फूड के भी जिन्दा रह सकते है।, एक साफ सुथरा व स्वच्छ जीवन जीना कोई कठिन कार्य नहीं है।, भोजन पकाना केवल स्त्रियां ही नहीं जानती।, अभिनेता केवल मनोरंजनकर्ता हैं जीवन में वास्तविक नायक नहीं।

पूरे देश में अचानक से कोरोना संक्रमण के कारण लागू हुए लाकडाउन के कारण लोगों को समझ में नहीं आया घर बैठे क्या करें चूंकि पहले से उनकी हाबी नहीं थी। अधिकांश भारतीयों की तरह या तो लोग घर से खेत, घर से काम पर, घर से नौकरी पर, नौकरी से घर पर या मंदिरों में या मोहल्ले के चबुतरों पर या सामाजिक कार्यों में लगे रहते थे, बहुत से लोग अपनी रोज मर्रा की दिनचर्या से अपने लिए समय ही नहीं निकाल पाते थे। घरेलु स्त्रियां घर परिवार की जिम्मेदारियों में ही उलझी रहती थी जो थोड़ा बहुत समय मिलता था, वह सास—बहू के सीरियल में चला जाता था. अब वे अक्सर सोचती थीं-

जिंदगी फुरसत यदि देती तो ऐसा देखते
जागती आंखों से हम भी कोई सपना देखते


खाली दिमाग शैतान का घर कहावत यूं ही नहीं बनी है। जब आदमी खाली होता है तो उसे तरह-तरह की शैतानियां सूझती है। यदि उसकी सोच सकारात्मक है तो वह समाज हित में सोचता है, करता है। वो लोगों से अक्सर बी पाजिटिव कहता है वहीं नेगेटिव कोच वाले आत्मकेंद्रित परपीड़क किस्म के लोग इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि दूसरों का जीना कैसे हराम करें। ऐसे लोग सोशेल मीडिया पर पूरी शिद्दत के साथ साम्प्रादायिक्ता के साथ जहर फैलाने में लगे हुए हैं ऐसे लोगों को ही देखकर बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आता है

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी जिसको भी देखना कई बार देखना।

हमारे इर्द गिर्द आज जो कुछ घटित हो रहा है उसे दखने, समझने का नजरिया अलग-अलग है। हमारा मीडिया और बहुत सी संस्थाएं एक दूसरे के प्रति नकारात्मक भाव पैदा करने में ही अपना काम समझती हैं। मीडिया में जो नेगेटिव है वही खबर है। नेगेटिव खबरों से उब चुके समाज के लिए बहुत से मीडिया हाऊस किसी एक दिन नो नेगेटिव खबर भी बना रहे हैं। अब चूंकि कोरोना ने सबको घर में बैठा दिया जिसकी किसी ने भी कल्पना नहीं थी. सबके पास समय ही समय है। अब ऐसे में करे भी तो क्या करें? पर चूंकि मनुष्य की फितरत सीधे बैठने की नही और वह मूलत: सामाजिक प्राणी है इसलिए वह जो भी कर सकता है, वह कर रहा है। ऐसे बहुत से रचनात्मक और सृजनात्मक उदाहरण हमारे सामने है जो इस कोरोना समय में हमें नई ताकत, नई ऊर्जा और थोड़ा बहुत अपने आस-पास को जानने समझने का मौका दे रहे है।

अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करके 1500 से अधिक बीसी सखियां सामाजिक सुरक्षा पेंशन पहुंचा रही है। ये बीसी सखियां ज्यादा बुजुर्ग, दिव्यांग और अक्षम लोगों के घर पहुंच कर उन्हें पेंशन राशि प्रदान कर रही है। शहरी आजीविका मिशन से जुड़ी 100 महिलाएं मॉस्क बनाने का कार्य कर रही हैं। बीते 9 दिन में सवा लाख से अधिक मॉस्क तैयार किए जा चुके हैं। इस कार्य में क्षेत्र स्तरीय संगठन नवा अंजोर सहित कई स्व सहायता समूह की महिलाएं जुड़ी हुई हैं।

रायगढ़ जिले में कोविड 19 कोरोना वायरस से लडऩे के लिए सारंगढ़ विधायक उत्तरा जांगड़े ने अपनी विकास निधि से 5 लाख दिए हैं। गायत्री परिवार से जुड़े लोग रायपुर के इंडोर स्टेडियम में जनता से मिली सामग्री से भोजन के पैकेट बनाकर वितरित कर रहे हैं। 'पिगी बैंकÓ लेकर पुलिस और सरकार तक पहुंचीं बिलासपुर की 12 साल की रुबी ने मुख्यमंत्री सहायता कोष में १११२ रुपए जमा किए। वहीं, रायपुर की 11 साल की योगिता और 7 साल की बहन रिया को लेकर थाने पहुंची और अपनी गुल्लक पुलिस को दे आई।

हाल ही में सुकमा में हुए नक्सली हमले में शहीद हुए 17 जवानों में से जशपुर के शहीद जवान अमरदीप खलखो कुनकुरी के हर्राडांड़ के परिवार को सुकमा एसपी शलभ सिन्हा ने 50 हजार रुपए की आर्थिक सहायता दी है। जीत फाउंडेशन महासमुंद की संगीता शुक्ला रोजाना अपने घर में खुद अपने परिवार और फाउंडर मेंबर के साथ मिलकर 60 से 70 स्लम लोगों के लिए भोजन बनाती है और उसे शहर के स्लम क्षेत्र में जाकर गरीबों को खुद बांटती है। ये महासमुंद के पूर्व एसपी जितेन्द्र शुक्ला की पत्नी हैं।