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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रशासनिक सुधार सरकारों की मंशा नहीं

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-प्रशासनिक सुधार सरकारों की मंशा नहीं

जिस तरह बहुत बार, बहुत से मसलों पर आयोग, समितियां गठित होती हैं किन्तु उनकी अनुशंसाएं, सिफारिशें लागू होने की बजाय दफ्तरों की फाईलों में धूल खाती रहती है, उसी तरह प्रशासनिक सुधार आयोगों की अनुशंसाएं। दरअसल, सरकार बहुत बार कुछ लोगों को उपकृत करने, कुछ मुद्दों, समस्याओं और मांगों से ध्यान हटाने के लिए जांच समितियां, आयोग गठित करती है, प्रशासनिक सुधार आयोग की कुछ इसी तरह की कवायद का नाम है।

हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेज चले गये, औलाद छोड़ गये। ये औलादें कौन है? ये औलादें वह मानसिकता, वह सिस्टम है जो आम जन के हित की बजाय अपना हित साधती हैं। अंग्रेजों ने अपनी शासन-व्यवस्था को चलाने के लिए जो नियम-कानून लागू किये थे, जो प्रशासनिक इकाईयां बनाई थी, वह आज भी लगभग यथावत है। कानून की धाराएं कोर्ट के नोटिस की भाषा और सरकारी कार्यप्रणाली बार-बार भारत में अंग्रेजी राज की याद दिलाती है।

हमारे यहां केवल यह परिवर्तन हुआ है कि अब अधिकांश कलेक्टर, कमिश्नर सत्ता के लिए लाईजनिंग आफिसर, जनरल मैनेजर होकर रह गये हैं जो अंग्रेजों की हुकूमतों में उनके अनुसार मन चाहा आदेश देते थे। अब वे जनतांत्रिक व्यवस्था में नये हुकुमरानों के लिए आदेश देते हैं। ये गिरगिट की तरह हैं जो सत्ता के साथ अपना रंग बदलते रहते हैं।

नुक्कड़-नाटकों में कुछ इस तरह के जनगीत गाया जाता है।

गोरे हाकिम भागे रे भैय्या, आ गये हाकिम काले

बदल गयी है चाबी, लेकिन बदले नहीं है ताले

मैं हूं थानेदार रे भैय्या है, मैं हूं सूबेदार,

पहले एक मुर्गा खाता था, अब खाता हूं चार।

दमादम मस्त कलंदर, दमादम मस्त कलंदर।  

नौकरशाही को लेकर समय-समय पर बहुत सारे लोगों ने महत्वपूर्ण बातें कही हैं। आईएएस नरेश चंद सक्सेना ने अपनी किताब 'व्हाट एल्स द आई ए एस एंड व्हाय इट फेल्स टू डिलीवर के माध्यम से कहा है कि देश नौकरशाही, गरीबों उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है। इसके पहले नौकरशाही को घोड़ा और सरकार को घुड़सवार की संज्ञा देकर भी बहुत कुछ कहा जा चुका है। इसे चलाने के लिए अच्छे घुड़सवार की जरूरत है, वरना नौकरशाही अपने हिसाब से चलने लगती है। जिस तरह देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मूल्यों में गिरावट आई है, वैसी ही गिरावट समूची प्रशासनिक प्रणाली में महसूस की जा रही है। प्रशासन तंत्र में संवेदनशीलता कम ही दिखाई देती है। ईमानदारी और संवेदनशीलता को लेकर समूची ब्यूरोक्रेसी पर सवाल उठने लगे हैं। इसी बीच देश और प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए अलग-अलग कमेटियां भी गठित की गई, किन्तु इनकी अनुशंसाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया गया।

देश का प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग 5 जनवरी 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित हुआ। बाद में मोरारजी के केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हो जाने की वजह से के. हनुमंतैया को अध्यक्ष नियुक्त किया गया। आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट 20 अक्टूबर 1966 को तथा दूसरी रिपोर्ट 30 जून 1977 को पेश की, जिनमें कुल 578 सुझाव दिए गए थे। इन सुझावों सबसे महत्वपूर्ण था लोक प्रशासकों के विरुद्घ जनता के अभियोगों को निराकरण हेतु लोकपाल एवं लोकायुक्त की नियुक्ति। मंत्रिपरिषद का आकार आवश्यकतानुसार रखा जाना, प्रधानमंत्री के अधीन कार्मिक विभाग की स्थापना।

भारत सरकार ने 31 अगस्त 2005 को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में द्वितीय प्रशासनिक आयोग का गठन किया। इस आयोग को सरकार के सभी स्तरों पर देश के लिए एक सक्रिय, प्रतिक्रियाशील, जवाबदेह, सतत प्रशासन के लिए सुझाव दिया। अपनी महत्वपूर्ण सिफारिश में मोइली समिति ने कहा था कि 14 वर्षों की सेवा के बाद की जाने वाली समीक्षा  मुख्यत: लोकसेवकों को उनके मजबूत और कमजोर पहलुओं से अवगत कराने के उददेश्य से होनी चाहिए। वहीं 20 वर्षों की सेवा के बाद की जाने वाली समीक्षा का उद्देश्य यह तय कर होना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी/लोक सेवक आगे सेवा में रहने योग्य हैं अथवा नहीं। इसी सिफारिश के आधार पर सरकार द्वारा आदेश जारी कर बहुत से लोगों को सेवा से पृथक किया गया, किन्तु प्रशासनिक सुधार और कसावट को लेकर की गई अनुशंसाएं आज भी लागू नहीं हुई हैं।

प्रशासनिक सुधार के नाम लोकसेवा गारंटी अधिनियम लाया गया। इस अधिनियम के जरिये सरकारी कार्यालयों से दी जाने वाली विभिन्न सेवाओं, कार्यों को चिन्हित कर उनके लिए समय-सीमा का निर्धारण किया गया।  निर्धारित समय पर काम नहीं होने पर आवेदन को परिव्यय पाने का अधिकार भी दिया गया। सतत मॉनिटरिंग के अभाव में और अधिकतम एक हजार जुर्माने की राशि का प्रावधान होने तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ किसी तरह की कार्यवाही नहीं होने की वजह से यह प्रभावी नहीं बन पाया। प्रशासन में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से 2005 में सूचना का अधिकार कानून लाया गया। जिसे आवश्यक संशोधन कर धीरे-धीरे भोथरा करने की कोशिश जारी है।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उच्चाधिकारियों को सेवानिवृत्ति के उपरांत पुर्नवास देने की परंपरा की शुरुआत पूर्व मुख्य सचिव अरुण कुमार को छत्तीसगढ़ प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष बनाने के साथ हुई। उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में इस दिशा में कोई पहल नहीं की। इसके बाद सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश डीएन तिवारी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की। इस कमेटी की रिपोर्ट को भी दरकिनार कर दिया गया। बीच-बीच में इंदिरा मिश्रा कमेटी, सरजियस मिंज कमेटी जैसी कमेटियां गठित होती रही। सितम्बर 2015 में तत्कालिन भाजपा सरकार ने छत्तीसगढ़ प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन कर सेवानिवृत्त मुख्य सचिव एस.के. मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। श्री एस. के. मिश्रा द्वारा वर्ष 2018 दिसम्बर में अपनी अनुशंसाओं के साथ अपना प्रतिवेदन शासन को सौंप दिया गया जो आज तक लालफीताशाही के बक्से में बंद है। 

प्रशासनिक सुधार के लिए एस. के. मिश्रा आयोग ने जो अनुशंसाएं की उनमें प्रमुख हैं- कनिष्ठ सेवा चयन आयोग का गठन। मंत्रालय प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना। प्रशासनिक सुधार एवं प्रशिक्षण विभाग का गठन। कार्यपालिक शासन के कार्य नियम एवं सचिवालय कार्यपुस्तिका मैनुअल का पुनरीक्षण, सभी विभागों के कार्य मैनुअल बनाया जाना। जिसमें कर्तव्यों का निर्धारण एवं विभागीय प्रक्रियाओं का उल्लेख हो। सुशासन संस्थान की स्थापना। गोपनीय प्रतिवेदन में संख्यात्मक ग्रेडिंग का प्रावधान किया जाए। सूचना प्रौद्योगिकी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर प्रभावी संप्रेषण की व्यवस्था की जाए। राजधानी में राज्य के अन्य क्षेत्रों से तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी शासकीय कार्य से जब आते हैं तो उनके लिए एक सुविधायुक्त विश्राम गृह का निर्माण किया जाए। शासकीय सेवकों के उत्कृष्ट कार्य के प्रोत्साहन के लिए प्रशंसा पत्र दिया जाना चाहिए। एस. के. मिश्रा आयोग की अनुशंसा आज तक छत्तीसगढ़ में लागू नहीं की गई है।

तमाम प्रशासनिक सुधार आयोग और समितियों को रिपोर्ट को दरकिनार करने वाली सरकार कोरोना से उपजे आर्थिक संकट और अर्थव्यवस्था  के नाम पर श्रम कानूनों में संशोधन कर काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 करने की सोच रही है। ओवर टाईम के नाम पर कर्मचारियों से चार घंटे काम कराया जा सकेगा। सरकार चाहेगी तो इसे अपने अधीनस्थ सभी कार्यालयों संस्थानों में भी लागू कर सकती है। यहां भी सवाल यही है कि अभी भी क्या सरकारी अमला, अफसर निर्धारित समय सीमा में पहुंचकर अपने मन से दिनभर काम कर रहे हैं। अपनी सीट से गायब रहना, काम के दौरान इतर कामों में लगे रहना और समय-सीमा के कामों को भी टालमटोल करना आज सरकारी कार्यसंस्कृति का हिस्सा हो गई है। काम के घंटों में इजाफा की बजाय ऐसा कार्य वातावरण तैयार करने की जरुरत है कि सरकारी अमला बिना किसी उपरी दबाव, मानिटरिंग के अपने मन से काम करें। 

अमेरिका की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शासन-प्रशासन में विशेषज्ञ सेवाओं के लोगों को सीधे लाने के लिए संयुक्त सचिव स्तर पर अधिकारियों की पदस्थापना कर रही है। छोटे-मोटे प्रशासनिक सुधारों आदेशों-निर्देशों से हमारी वर्तमान प्रशासनिक प्रक्रिया कार्यपद्घति नहीं बदलने वाली है। यदि हमें इसे वाकई अपने देश के अनुसार, बनाना चाहते हैं तो हमें अपने लोगों की जरुरत, अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेने होंगे।