महामारी के जंग में 100 साल पुराना बीसीजी का टीका बनेगा कोरोना कवच?

महामारी के  जंग में 100 साल पुराना बीसीजी का टीका बनेगा कोरोना कवच?

 

वॉशिंगटन। दुनिया भर में पैर पसार  चूका कोरोना का  इलाज ढूंढने में वैज्ञानिकों के पसीने छूट रहे हैं।  अस्पतालों और केयर होम में हर दिन सैंकड़ों लोगों की मौत हो रही है। दुनिया ने टेक्नॉलजी और विज्ञान के क्षेत्र में चाहे जितनी भी तरक्की कर ली हो और लेकिन कोरोना का वैक्सीन ढूंढने में अभी तक इसे कामयाबी नहीं मिल पाई है। 21वीं सदी में हो रहे अत्याधुनिक प्रयोगों के बीच भी वैज्ञानिकों को फिर 100 साल पीछे जाने को मजबूर हो गए हैं। वैज्ञानिकों को कोरोना से लड़ाई में बीसीजी (बेसिलस कैलमेट-ग्यूरिन) का टीका एक उम्मीद की किरण बनकर दिखा है जिसका सबसे पहले इस्तेमाल 1921 में आधिकारिक रूप से शुरू किया गया था।

बीसीजी बैक्टीरिया से होने वाले रोग टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) का इलाज करता है और कुछ वैज्ञानिक टाइपो-1 डाइबेटिक बीमारी में इसके प्रभाव को लेकर भी शोध कर रहे हैं। टीबी और कोविड 19 दो अलग तरह का रोग है। टीबी बैक्टीरिया से जुड़ी बीमारी है तो कोविड19 वायरस से है। 

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, मेसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में इन्युनोलॉजी विभाग की निदेशक और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की असोसिएट प्रफेसर डॉ.डिनाइज फौस्टमैन इस तथ्य पर रोशनी डालती हैं।

अमेरिका के फूड ऐंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने नोवेल कोरोना वायरस से निपटने के लिए कोई वैक्सीन और इलाज उपलब्ध नहीं कराया है।

बीसीजी पर कई देशों ने क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिया है यानी इंसानों पर प्रयोग जारी है। इन देशों में ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड्स भी शामिल हैं। अमेरिका में इसकी तैयारी शुरू की जा रही है।

chandra shekhar