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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से रंगभेद, जातिभेद और सामाजिक तानाबाना

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से रंगभेद, जातिभेद और सामाजिक तानाबाना

-सुभाष मिश्र

आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में क्रिकेट मैच के दौरान दो भारतीय खिलाडिय़ों पर दर्शकों ने रंगभेदी टिप्पणी करके उन्हें ब्राउन डाग, बिग मंकी जैसे संबोधनों से अपमानित किया। आईसीसी ने इस संबंध में अपनी नाराजगी जाहिर की। दरअसल, ऐसी नाराजगी से कुछ होना जाना नहीं है। जो रंगभेदी मानसिकता आस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों में है, उसी तरह की मानसिकता हमारे यहां दलितों को लेकर है। दोनों जगहों पर इस तरह की टीका-टिप्पणी में पढ़ा-लिखा वर्ग भी शामिल है। ग्रामीण अंचल में इससे इतर दलितों के प्रति परहेज है, घृणा नहीं है। यह परहेज उन्हें बराबरी से बैठने, एक कुएं का पानी पीने और छुआछूत को मानने के लिए बाध्य करता है। भारतीय समाज में सामंतवादी मानसिकता के साथ ही साथ पूंजीवाद के प्रति भी रुझान है। उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में सामंतशाही, लठैतों और जातिगत भेदभाव का सच दिखाई देता है। वैसा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में नहीं है। जातिवाद सामंतवाद की पैदाइश है। हम जिस समाज में रहते हैं वह अभी भी बहुत हद तक सामंतवादी है, जिसके कारण जाति वर्ग बन गया है। एशिया और अफ्रीका के लोग जो अश्वेेत थे, पिछड़े थे वहां पर गोरे साम्राज्यवादियों ने कब्जा कर लिया और इनका शोषण किया, यहां तक कि खनिज, वन संपदा को लूटा। अब जब विज्ञान ने तरक्की कर ली है, ये देश आजाद होकर बराबरी में खड़े होने लगा है, तो सामंतवादी मानसिकता के लोगों को ये नागवार गुजर रहा है। नस्ली टिप्पणी उसी मानसिकता का परिचायक है।

हमारी कथा, कहानी, साहित्य, सिनेमा में जिस तरह सांप्रदायिकता की खाई को दूर करने के लिए पात्र गढ़े जाते हैं, वे उदार होते हैं। वैसे पात्र रंगभेदी, दलितों के प्रति आचरण को लेकर नहीं है। यहां का पात्र एक दूसरे से अपने अपमान का बदला लेना चाहता है। यही वजह है कि यदि इस समाज का कोई व्यक्ति बड़े ओहदे पर, पॉवर सेंटर में पहुंच जाता है तो वह अपने पूर्वजों के अपमान का बदला लेना चाहता है। नौकरी में आने के बाद जिस तरह का भाईचारा पनपना चाहिए था, वह नहीं पनपा बल्कि बदले की आस्था ज्यादा गहरी होती गई। जातिभेद सबसे ज्यादा हिन्दू समाज में है। यही वजह है कि सांप्रदायिकता के खिलाफ दिखने वाला भाईचारा दलित विमर्श में बदले की भावना में तब्दील हो जाता है। आरक्षण व्यवस्था के चलते बेरोजगारी झेल रहे लोगों को लगता है कि उनके हिस्से की नौकरी ये लोग खा गये। हकीकत इससे भिन्न है। दरअसल, सरकारी नौकरियां इतनी कम है कि चाहकर भी ये सभी को नहीं मिल सकती, किन्तु सवर्णों के मन में नौकरियों को लेकर बहुत ज्यादा असंतोष है। इस आग में घी का काम किया मंडल आयोग ने जिसका खामियाजा पूरे देश ने भुगता। गुजरात में आरक्षण विरोधी आंदोलन को सांप्रदायिक रूप दे दिया गया।

हम देखते हैं कि व्यक्ति के जातिगत संस्कार बहुत गहरे होते हैं, जो पाश्चात्य देश टेक्नालॉजी में बहुत आगे निकल गये हैं। किन्तु वहां के कुछ नागरिकों के मन में जो सहिष्णुता और सद्भाव होना चाहिए, वह नहीं दिखता। हालिया घटना उसी का प्रतिबिंब है। सिडनी में आस्ट्रेलिया के खिलाफ तीसरे टेस्ट के तीसरे दिन के दौरान टीम के खिलाड़ी जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद सिराज के साथ एक स्टैंड में उपस्थित नशे में धुत्त एक दर्शक ने मंकी (बंदर) कहा, जिससे 2007-08 में भारतीय टीम के आस्ट्रेलिया दौरे के मंकीगेट प्रकरण की याद ताजा हो गई।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के जरिये दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन का नेतृत्व किया। वे औपनिवेशिक और नस्लवाद विरोधी आंदोलनों की प्रेरणा बने। गांधीजी ने कहा था कि समय आ गया है जब गोरों को यह मान लेना चाहिए कि सभी लोग समकक्ष हैं। चमड़ी की सफेदी के पीछे कोई रहस्य नहीं है। यह बारंबार सिद्ध हो चुका है कि समान अवसर मिले तो किसी भी रंग का देश का व्यक्ति दूसरों के पूर्णतया समकक्ष बनकर दिखा सकता है। वे भारत में सामाजिक समानता की स्थापना के पैरोकार थे और जाति प्रथा का उन्मूलन उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य था।

कुछ समय पहले अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयर्ड की क्रूर हत्या के बाद शुरू हुए ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के दौरान अमरीका में कुछ प्रदर्शनकारियों ने गांधीजी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया।

गांधीजी ने कहा था कि अगर हम भविष्य की बात करें तो क्या हमें आने वाली पीढिय़ों के लिए विरासत में ऐसी सभ्यता नहीं छोडऩा चाहिए, जिसमें सभी नस्लों का सम्मिश्रण हो। एक ऐसी सभ्यता जिसे शायद विश्व ने अब तक नहीं देखा है। यह बात उन्होंने 1908 में कही थी। समय के साथ उनके विचार विकसित और परिपक्व होते गए और 1942 में उन्होंने रुजवेल्ट को एक पत्र में लिखा, मेरा विचार है कि मित्र देशों का यह दावा कि वे दुनिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं तब तक खोखला जान पड़ेगा जब तक कि ग्रेट ब्रिटेन भारत और अफ्रीका का शोषण करता रहेगा और अमरीका में नीग्रो समस्या बनी रहेगी।
दलितों के साथ छुआछूत का ताजा मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के थाना भोजपुर इलाके का है, जहां नाई समाज (मुसलमानों के सलमानी समुदाय जिन्हें पहले हज्जाम के तौर पर जाना जाता था) अपनी दुकानों में दलित (वाल्मीकि) समाज के बाल काटने और दाढ़ी बनाने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि वे किसी भी कीमत पर इन लोगों के बाल नहीं काटेंगे। उनका कहना है कि हमारे सामने कभी उनके बाल गांव की दुकानों पर कटते नहीं देखे। यदि हमने इनके बाल काटे तो हमारी बिरादरी के लोग ही हमारी दुकान पर नहीं आएंगे। इसी तरह की घटना राजस्थान गंगापुर के पोटला में हुई। यहां के दलित समाज के लोगों का कहना है कि गांव में हमारे समाज के साथ आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती है। होटल वाले तथा अन्य दुकानदार भी छुआछूत करते हैं। उनका कहना है कि होटल वाले न तो वहां बैठने देते और न ही पानी को हाथ लगाने देते हैं। ऐसे में दलितों को बाल काटने के लिए गंगापुर व भीलवाड़ा जाना पड़ता है। जातिगत भेदभाव, छुआछूत को लेकर कानून बहुत ही कड़े हैं, बावजूद इसके यह छुआछूत, भेदभाव की मानसिकता खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने पर 3 (1) एससी/एसटी एक्ट में कम से कम तीन साल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा और कोई घटना होती है तो 10 साल की सजा का प्रावधान है।
हमारे देश के बाहर ब्रिटेन में भी दलितों के साथ छुआछूत की शिकायतें आम बात है। ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई मूल के करीब 30 लाख लोग रहते हैं। जिनमें 50,000 से 2 लाख के बीच आबादी दलितों की है। भारत की तरह ब्रिटेन में दलित उत्पीडऩ रोकने के लिए कानून नहीं है। हालांकि वहां नस्लीय उत्पीडऩ रोकने के लिए समानता कानून है। भारतीय मूल के दलितों का दावा है कि अगर अश्वेत व्यक्ति नस्लीय भेदभाव का शिकार होता है, तो वह इस काननू के तहत मामला दर्ज कराकर न्याय की गुहार लगा सकता है, लेकिन किसी दक्षिण एशियाई मूल के व्यक्ति को जातिसूचक शब्द या छुआछूत का शिकार होना पड़ता है, तो न्याय पाना तो दूर वह अधिकारियों को समझा भी नहीं पाता है कि वह नस्लीय भेदभाव कितने ही खतरनाक जातीय भेदभाव या छुआछूत का शिकार हो रहा है।