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किसान क्यों हैं परेशान ?

किसान क्यों हैं परेशान ?

व्ही. एस.भदौरिया

 भारत में खेती व किसानों की समस्या पुरानी है,इसके लिए किसी एक पार्टी को दोष देना उचित न होगा,लेकिन इसके पहले की सरकारें अपने इरादों और फैसलों से यह भरोसा कायम रखने मे सफल होती रही हैं कि वे किसान हितैषी हैं.पहली बार यह भरोसा टूटता नजर आ रहा है.

पिछले एक दशक से कृषि के इनपुट्स की लागत लगातार बढ़ती जा रही है,किंतु उत्पाद की कीमतें या तो स्थिर हैं या पहले से कम हो गयी हैं. स्वामिनाथन आयोग ने एमएसपी के निर्धारण का जो फार्मूला सुझाया था, उसे भी बदल दिया गया है,परिणामस्वरूप कृषि लागत व मूल्य आयोग द्वारा, वास्तविक अपेक्षित कीमत से कम मूल्य ( एमएसपी) निर्धारित किया जा रहा है, इसी संशोधित फार्मूले को स्वीकार कर लें तो भी सरकार द्वारा घोषित एमएसपी देश के केवल 6% किसानों को ही मिल रहा है.इसका सीधा सा मतलब है,कि 94% किसानों को अपनी उपज लागत से कम मूल्य पर बेचनी पड़ रही है.ऐसे मे कर्ज के बोझ तले डूबा किसान आत्महत्या न करेगा तो क्या करेगा ? 

कोई भी जन हितैषी सरकार अपने किसानों की लागत से कम मूल्य पर उपज बेचने की बाध्यता पर उदासीन नहीं रह सकती है, लेकिन कार्पोरेट्स के हितों को वरीयता देने के चलते वर्तमान सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति उदासीन नजर आ रही है.तीन नये कानूनों को किसानों के लिए फायदेमंद साबित करने के लिए सरकार कुछ भी कहे, लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि,सरकार खेती का अमरीका जैसा कार्पोरेट नियंत्रित माडल लागू करने जा रही है. यह माडल जब अमरीका मे ही फेल हो चुका है,तब भारत मे उसके सफल होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? अमरीका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है,अर्थात वहां खेती को सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त है,वहां सब्सिडी के बूते कार्पोरेटीकरण के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने की कोशिश की जा रही है,इसके बावजूद खेती के प्रति रूझान घटता जा रहा है.

नये कानून लागू होने के बाद  सरकार अपनी जवाबदारी से पल्ला झाड़ लेगी और किसानों को पूरी तरह बाजार की ताकतों के हवाले छोड़ देगी.दुनिया के दूसरे देशों की तरह हमारे देश मे भी सरकार के सपोर्ट बगैर किसान सर्वाइव नहीं कर सकता है.सरकारी मंडियों मे क्रय पर शुल्क वसूलने और प्रायवेट मंडियों को शुल्क मुक्त रखने की भेदभावपूर्ण व्यवस्था से सरकारी मंडियां अस्तित्वहीन हो जायेंगी. जमाखोरी की असीमित छूट, किसानों व उपभोक्ताओं, की लूट का मार्ग प्रशस्त करेगी.

किसानों के मन मे सरकार की नीयत के प्रति संदेह की सबसे बड़ी वजह वर्तमान सरकार का अडानी अंबानी के प्रति अतिशय मोह है.किसानों के अलावा अब तो आम जन के मन मे यह बात घर करती जा रही है कि, अधिकांशतः सरकारी नीतियां इन दो व्यापारियों के हितों को ध्यान मे रखकर बनायी जा रही हैं, देश के लोग गरीब जरूर हैं,पर मूर्ख नहीं हैं. कोरोनाकाल मे जहां सबके व्यापार धंधे चौपट हो रहे थे, वहीं इन दो कार्पोरेट घरानों का मुनाफा व नेटवर्थ कई गुना बढ़ता जा रहा है.आखिर दुनिया की सभी नामी कंपनियां इन्हीं दो कंपनियों मे निवेश क्यों कर रही हैं ? उन्हें पता है कि इनकी पीठ व सर पर सरकार का हाथ होने से बेहतर रिटर्न मिलना सुनिश्चित है.

खेती का सालाना व्यापार  20-25 लाख करोड़ का है, कोरोना संकट के दौरान केवल कृषि की विकास दर मे 3.5 फीसदी वृद्धि परिलक्षित हुई है, शेष सेक्टर पूरी तरह धराशायी हो गये हैं.किसानों से कम दाम पर खरीद कर उपभोक्ताओं को मंहगे दाम पर बेंच कर छोटे कारोबारी बड़ा मुनाफा कमाते हैं, इस मोटी कमाई पर लंबे समय से अडानी अंबानी की नजर है,और सरकार का खुला समर्थन मिलने से उनकी राह एकदम आसान हो गयी है.

आज देश के किसान आंदोलित हैं. अब तक चल चुके बातचीत के कई दौर बेनतीजा रहे हैं.लगता है सरकार को कोई जल्दी नहीं है,कदाचित वह किसानों की ताकत को तौलना चाह रही है. अपनी जनता से 'तोल मोल के बोल' का खेल ठीक नहीं है. संतोषजनक समाधान तक पहुंचने के लिए चालाकी का बर्ताव करना छोड़कर खुले मन से उनकी पीड़ा को एड्रेस करना होगा. सरकार को समस्या व समाधान, दोनों पता है,फिलहाल वह समाधान की ओर बढ़ने की इच्छुक नहीं दिख रही है.भगवान सरकार को सद्बुद्धि दे, और आंदोलनरत किसानों ने गांधीजी द्वारा दिखाये गये अहिंसा व सत्याग्रह के मार्ग पर चलते हुए अब तक जिस तरह के धैर्य का परिचय दिया है, उस पर कायम रहें.

किसानों का यह स्वत:स्फूर्त आंदोलन,भारत के लोकतंत्र,आम जनता की ताकत व गांधी जी के विचारों की प्रासंगिकता की कठिन परीक्षा भी है.