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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - आपदाकाल में सार्वजनिक क्षेत्रों की उपयोगिता

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - आपदाकाल में सार्वजनिक क्षेत्रों की उपयोगिता

- सुभाष मिश्र

बोकारो, भिलाई स्टील प्लांट जैसे सार्वजनिक उपक्रमों की आप कितनी ही आलोचना करें, सरकार निजीकरण के नाम पर बहुत सारे सरकारी उपक्रमों को बेच दें या बेचने की प्रक्रिया शुरू करे, परन्तु जब आपदा आती है तो यही सार्वजनिक /सरकारी संस्थांए बहुत ही तत्परता के साथ सरकार की श्वॉंस नली में आक्सीजन देने का काम करती है। कोरोना महामारी के बीच लोगों ने देखा की किस तरह से सरकारी अस्पताल, सरकारी अमला अपनी जान जोखिम में डालकर दिन-रात सेवा के काम में लगा हुआ है। जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए है या उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव या तेंलगाना के स्थानीय निकाय चुनाव सभी जगहों पर भीषण कोरोना संक्रमण के बीच सरकारी अमले ने अपनी ड्यूटी का निर्वाह किया। इस दौरान ड्यूटी में तैनात बहुत सारे लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। 01 मई को मजदूर दिवस से पूरे देश में 18 वर्ष से 45 वर्ष के आयु समूह के लोगो का टीकाकरण होना है, ऐसे में बहुत से राज्य में वैक्सीन नहीं होने के कारण टीकाकरण का कार्यक्रम शुरू नहीं हो पाएगा। चूंकि यह दोनों कंपनी में से एक कंपनी निजी हाथों में है और दूसरी पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण है। ऐसे में राज्य सरकारें अपने आपको असहाय महसूस कर रही है। राज्यों के मुख्यमंत्री लोगो से अपील कर रहे हैं कि टीकाकरण के लिए लाइन न लगाएं। हमारे पास अभी टीके नहीं है, जब आयेगे तो हम आपको सूचित करेंगें। टीकाकरण कार्यक्रम कब से शुरू होगा, किसी को निश्चित तारीख नहीं मालूम।

आक्सीजन की कमी के ऐसे हाहाकारी समय में छत्तीसगढ़ कई राज्यों में ऑक्सीजन की आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर सामने आया है। छत्तीसगढ़ में वर्तमान में लगभग 386.92 मीट्रिक टनप्रतिदिन ऑक्सीजन का उत्पादन हो रहा है। इसमें से छत्तीसगढ़ में केवल 160 मीट्रिक टन का ही उपभोग हो रहा है। शेष ऑक्सीजन निर्बाध रूप से अन्य राज्यों को भेजी जा रही है। देश-दुनिया में लोहे के लिए पहचाना जाने वाला भिलाई इस्पात संयंत्र अब ऑक्सीजन देकर लोगों की जान बचाने के लिए नई पहचान बना रहा है। भिलाई इस्पात संयंत्र प्रतिदिन 265 टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहा है।

देश में ऑक्सीजन को लेकर मचे बवाल और न्यायालयों के आदेश के बीच कोरोना संक्रमण के मरीजों की टूटती सासों को लौटाने में बीएसएल सहित सेल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बीएसएल, भिलाई सहित सेल के अन्य प्लांटों से देश के कई हिस्सों में तरल मेडिकल ऑक्सीजन की लगातार आपूर्ति सड़क मार्ग और ऑक्सीजन एक्सप्रेस से की जा रही है। दिल्ली, यूपी, गुजरात, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में ऑक्सीजन की कमी हो रही है। हालांकि, अब केंद्र सरकार की ओर से लगातार ऑक्सीजन की सप्लाई को बढ़ाई जा रही है। हवाई मार्ग, रेलवे, सड़क मार्ग के जरिए ऑक्सीजन की सप्लाई हो रही है, वहीं विदेश से भी ऑक्सीजन कंटेनर्स मंगवाए जा रहे हैं।

इसी तरह हमारी भारतीय रेल सेवा है जिसे भी आधुनिकता के नाम पर बहुत तेजी से निजी हाथों में सौपनें की तैयारी हो रही है, उसने भी कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच अस्पतालों में बिस्तर की कमी को दूर किया है। भारतीय रेलवे द्वारा कुल 5601 ट्रेन कोचों को कोविड केयर सेंटर केरूप में परिवर्तित किया गया था।

नव-उदारीकरण की विश्व-व्यवस्था के तहत यूँ तो पिछली सदी के अंतिम दशक में ही भारत की अर्थनीति ने आकार लेना शुरू कर दिया था, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद स्पष्ट विनिवेश नीति तैयार की गयी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का निजीकरण करने के लिये पृथक मंत्रालय गठित किया गया। 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सत्ता में आने के बाद इस मंत्रालय को समाप्त कर दिया गया। ज़ाहिर है, इससे निजीकरण की रफ़्तार में कमी आयी। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार ने विनिवेश और निजीकरण को प्राथमिकता के आधार पर अपने एजेंडा में लिया। ख़ास कर 2019 के बाद अथवा कोरोना संक्रमण के दौर के पहले बजट में कुछ महत्तवपूर्ण सार्वजनिक उद्योगों के विनिवेश की योजना का ऐलान वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने किया। भारत की अर्थव्यवस्था की बदहाली के बीच नव-उदारवादी अर्थशास्त्र के सुझाए गए विनिवेश के नुस्ख़े को रामबाण मानकर अर्थव्यवस्था के संकट से उबारने की कोशिश शुरू की गई। प्रधानमंत्री मोदी की विश्वसनीय छवि को भारतीय नव-मध्यवर्ग द्वारा मिल रही स्वीकृति के चलते इस नुस्ख़े को भी मोदी है तो मुमकिन है के अंदाज़ में कारगर मान लिया गया। जनमत मोदी के साथ था और उनके हर कदम पर भरोसा करने वाले भक्तजनों ने इसका खूब प्रचार भी किया। यह बात जनता के दिलो दिमाग में बिठा दी गई कि सार्वजनिक क्षेत्र की उपयोगिता खत्म हो चुकी है और वे भारत के लिए बोझ की तरह हैं जिनसे जल्द छुटकारा पालिया जाना चाहिये।

लेकिन कोरोना संक्रमण के दूसरे दौर में जब निजी क्षेत्र के औद्योगिक प्रतिष्ठान, चाहे वह दवाई और टीका बनाने वाली कम्पनी हो या अस्पताल, पूंजीवादी बाज़ार तंत्र से बाहर निकल कर राष्ट्रीय दायित्व निभाने की अपेक्षा मुनाफ़ा कमाने की लालसा का शिकार हो गए। निजी अस्पतालों की लूट और अत्यंत आवश्यक जीवनरक्षक औषधि या ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी के दृश्य आम हो गए तब सार्वजनिक उद्योगों, सरकारी अस्पतालों और सरकारी कर्मियों ने ही चरमराते स्वास्थ्य ढाँचे को किसी हद तक सम्हाला है, इसे आज सहज ही देखा जा सकता है।

आक्सीजन के देशव्यापी संकट के बीच जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सरकारों को लताड़ लगाकर कह रही है कि आप कहीं से भी मरीजों के लिए आक्सीजन का प्रबंध करो। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को कोरोना महामारी पर केंद्र द्वारा उठाए गए कदमों को लेकर सुनवाई के दौरान केंद्र से टेस्टिंग, ऑक्सीजन व वैक्सीनेशन को लेकर उठाए गए कदमों से जुड़े सवालों का जवाब देने कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से भी केंद्र के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाने को कहा। कोर्टने कहा कि दिल्ली के लोगों के लिए ऑक्सीजन और दवाइयां जुटाने के लिए मिल कर काम करने की हिदायत देते हुए कहा है कि राजनीति चुनाव के समय होती है, विपत्ति के समय नहीं।

कोर्ट ने वैक्सीनेशन अभियान के अंतर्गत सभी लोगों को मुफ्त वैक्सीनेशन की सुविधा दी जाने की बात कही। कोर्ट ने कहा कि यह वैक्सीन निर्माता कंपनी पर नहीं छोड़ा जा सकता कि वह किस राज्य को कितनी वैक्सीन उपलब्ध करवाए। यह केंद्र के नियंत्रण में होना चाहिए। कोर्ट ने कहा वैक्सीन विकसित करने में सरकार का भी पैसा लगा है। इसलिए, यह सार्वजनिक संसाधन है। साथ ही सवाल किया, केंद्र सरकार 100 फीसदी वैक्सीन क्यों नहीं खरीद रही। एक हिस्सा खरीदकर बाकी बेचने के लिए वैक्सीन निर्माता कंपनियों को क्यों स्वतंत्र कर दिया गया है। सरकार का बस चले तो सारे बेरियर प्रायवेट सेक्टर के लिए खोल दे। अभी हाल ही में बैंकर्स ने निजीकरण के खिलाफ आंदोलन किया। किसान लगातार कारपोरेट पूंजी से होने वाले नुकसान का अनुमान लगाकर नये कृषि कानूनों का विरोध कर रहे है।

ऐसा नहीं है की निजी स्त्रोतो ने इस संक्रमण के समय सहयोग का हाथ न बढ़ाया हो। मेडिकल ऑक्सीजन के महत्वपूर्ण संस्करणों की आपूर्ति करने में सज्जन जिंदल के नेतृत्व वाली जेएसडब्ल्यू स्टील, मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज, नवीन जिंदल के नेतृत्ववाली जिंदल पावर और स्टील, लक्ष्मी मित्तल ने आर्सेलर मित्तल निप्पन स्टील का नेतृत्व किया।  छत्तीसगढ़ से जिंदल स्टील एंड पावर 500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति कर जरूरतमंद अस्पतालों को भेज रहा है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशनलिमिटेड (बीपीसीएल) जैसी कुछ राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों ने भी मेडिकल रिफाइनरियों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अपनी रिफाइनरियों में उत्पादित ऑक्सीजन को बदलना शुरू कर दिया है। देश में आई इस विपदा के समय लोग भलीभांति निजी और सार्वजनिक, सरकारी क्षेत्र के अंतर, काम के तरीके और आपदा में अवसर कैसे तलाशा जाता है, देख रहे हैं।
ऐसे समय कवि मित्र ध्रुव शुक्ल की कविता प्रसंगवश याद आ रही है ।
ओ मेरी सरकार!
हम जि़न्दगी की चाह करें
आप क्यों जि़न्दगी तबाह करें
जान जाये तो कहाँ जायें हम
कहाँ अपनी राह करें
ओ मेरी सरकार!
आपकी क़ातिल अदाओं में
हम कहाँ जि़न्दगी की थाह करें
आह भरते हैं तो लगता है आपको
जैसे हम ही कोई गुनाह करें
ओ मेरी सरकार!
जो आह-आह करे
वो कैसे वाह-वाह करे।