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II सब 'नाम' का खेल है II पत्रकार अनिल द्विवेदी का कॉलम छत्तीस-घाट' पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलने के नफा-नुकसान गिना रहे हैं!

II सब 'नाम' का खेल है II  पत्रकार अनिल द्विवेदी का कॉलम छत्तीस-घाट' पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलने के नफा-नुकसान गिना रहे हैं!

अनिल द्विवेदी

नागहाँ भूपेश बघेल केबिनेट ने कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलने का फैसला किया है. महीनों पहले पत्रकारों के एक दल ने यह मांग उठाई तो पहले उच्च शिक्षा मंत्री ने इस पर अपनी सहमति दी और अब सरकार ने फैसला कर लिया है कि इस विश्वविद्यालय का नया नाम स्व.चंदूलाल चंद्राकर होगा. न्यायवादी सरकार ने कामधेनु विश्वविद्यालय का नामकरण स्व.वासुदेव चंद्राकर जी के नाम पर करने का निर्णय लिया, इसका तहेदिल से स्वागत है.

अपने महापुरूषों की स्मृति को अक्षुण्ण बनाने या उनके योगदान को संजोए रखने के लिए संस्थानों के नामकरण किए जाते रहे हैं. कन्फ्यूशियस ने क्या कहा था! यही कि, ‘मुझे इस बात की फिक्र नहीं कि मैं मशहूर नहीं हूं, बल्कि मैं ईमानदारी से विख्यात होने के योग्य बनना चाहता हूं’ गांधी-नेहरू हों, स्वामी विवेकानंद, स्व.अब्दुल कलाम या फिर अन्य महापुरूष, इनके नाम पर यदि देश में सैकड़ों संस्थान चल रहे हैं तो इसके पीछे उनके कृतित्व हैं. कितनी ही सरकारें आई-गईं पर नाम बदलने का दुस्साहस कोई ना कर सका. इसके पीछे शायद देश के तगड़े विरोध का डर भी रहा होगा!

कबीर ने नाम में भ्रमित व्यक्ति के लिए एक बहुत अच्छी उपमा दी है : जैसे स्वान कांच मंदिर में भर्मित भूकी मरयो. तर्क दिया जा रहा है कि स्व.कुशाभाउ ठाकरे का पत्रकारिता में क्या योगदान, जो उनके नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय चलने दिया जाए. तो अब से क्या यह लकीर खींच दी जाए कि किसी भी विश्वविद्यालय का नामकरण विशेषज्ञ.हस्ती के नाम पर ही हो. सुरता कराथंव के ठाकरे साहब अपना घर—परिवार छोड़कर प्रचारक बने और देश—समाज की ताउम्र सेवा करते रहे. वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. उन्होंने पत्रकारिता नही की होगी परंतु स्वदेश' जैसे अखबार को पाला—पोसा और संरक्षण भी दिया.

कल मैं पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विदयार्थियों के फेसबुक-कमेंटस देख रहा था. अमूमन सभी का मानना है कि यह गलत फैसला है. वे पूछ रहे हैं कि उन हजारों विदयार्थियों का क्या होगा जो इस विश्वविद्यालय की मार्कशीट लेकर घूम रहे हैं! करोड़ों रूपये विश्वविद्यालय की ब्रांडिंग में लग गए, क्या वह पानी में नही बह जाएंगे. सरकार के सलाहकार चाहें तो सोशल मीडिया पर जाकर आम जनता की रॉय जान सकते है. मार्के की बात यह है कि मेहमान—प्रवक्ता के तौर पर मैंने इस गुरूकुल में कुछ साल दिए हैं. वहां काफी कुछ बदलने या नया करने की जरूरत है. विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती बड़ी जरूरत है जो सरकारी फाइलों से लेकर न्यायालय तक में लंबित पड़ी है. करोड़ों रूपये गुरूकुल की ब्रांडिंग में फूंक दिए गए लेकिन शैक्षणिक स्तर नही सुधर सका. संस्थान को जीवित रखना है इसलिए जैसे—तैसे विदयार्थी पास कर दिए जाते हैं!

देश को गलत फैसले डुबाते हैं और राजा को उसके सलाहकार. उन्हें ऐसी कोई सलाह नही देना चाहिए या सरकार को अमल करना चाहिए जिससे उसकी भद्द पिटे. फिर इस पर भी विचार कीजिए कि नाम बदलना कितना स्वीकार्य और अनुकरणीय होगा. प्रदेश के नगर निगमों ने पीढ़ी—दर—पीढ़ी चले आ रहे अपने शहर के वार्डों, मोहल्लों और गलियों के नाम स्वर्गीय प्रखर आत्माओं के नाम पर रखे हैं पर जनमानस ने उन्हें कितना स्वीकार्य किया है! अपने वार्ड का पूरा नाम तक नही बता सकते हैं!

आमजन भी पूछ रहे हैं कि संस्थान नाम बदलने से किसी का क्या बन-बिगड़ जाएगा. आज यदि स्व.चंद्राकर होते तो वे कदापि ऐसा ना होने देते. हां, विश्वविद्यालय का नाम किसी छत्तीसगढ़िया के नाम पर हो, इसके लिए जरूर खून-पसीना बहा देते. याद कीजिए जब नई भूपेश बघेल सरकार ने शपथ ली थी. तब अटल नगर का नाम बदलने की मांग हवा में थी लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा दिल दिखाते हुए उसे यथावत रहने दिया. जनता और विपक्ष दोनों इस फैसले के कायल हो गए थे. इसलिए सरकार को समाजेंद्रिय का सम्मान करना चाहिए.

एक पत्रकार होने के नाते स्व. चंदूलाल चंद्राकर जी पर हमें गर्व है. वे हमारा स्वाभिमानी स्वर रहे. देश के पत्रकारिता नक्षत्र में वे ध्रुवतारा की तरह चमकते रहेंगे. पिछली सरकार ने उनके नाम पर एक पत्रकारिता पुरस्कार चालू किया था, एक प्राइवेट अस्पताल भी उनके नाम पर है लेकिन यह हाथी के मुंह में तिनका जैसा ही रहा. भाजपा सरकार चाहती तो चंदूलालजी के नाम पर किसी शोधपीठ, ग्रंथ अकादमी या विश्वविद्यालय का नामकरण कर सकती थी लेकिन दुचित्तापन दिखाते हुए वह चूक गई!

हिसाब यह भी मांगा जा सकता है कि 60 साल तक देश में किसकी सरकार रही. कौन केंद्रीय मंत्री रहा, कितने ही सांसद और राज्यसभा सांसद रहे परंतु स्व.चंदूलाल जी के साथ न्याय नही कर सके. अफसोस और आश्चर्य कि तब किसी को याद नही आया कि स्व.चंद्राकर जी के नाम पर देश या राज्य में कोई संस्थान का नामकरण कर दिया जाए. माना कि भूपेश बघेल सरकार अब न्याय करना चाहती है लेकिन यह साधुमार्गी तरीके से ही हो सकता है!

सरकार में रहने का स्थायी पटटा किसी के पास नही होता. सरकारें आएंगी-जाएंगी, बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन जब तक जनहित के खिलाफ कोई फैसला ना हो, पूर्ववर्ती सरकार के निर्णयों का सम्मान होना चाहिए अन्यथा यह भी जनादेश का अपमान ही माना जाएगा. इस नियम में भाजपा भी बंधी रहे और कांग्रेस भी. कहते हैं हर आदमी का अपना संघर्ष और कहानी होती है, पर इतिहास उठाकर देखिए, आपको पीड़ाएं एक-दूसरे से गले मिलती नजर आएंगी.

समय और लोग उन पत्रकारों को भी दर्ज कर रहे हैं जो सत्ता की रेवड़ी पाने का लालच पाले राजनीति में पड़ गए! उन्होंने ही इस अभियान को शुरू किया था और अभी भी नाम बदलने पर अड़े हुए हैं. नामकरण की राजनीति की आंच में ये खुद कब झुलस जाएंगे, पता नही चलेगा. पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलना एक गलत परंपरा की शुरूआत होगी. किसी भी सरकार को असहयोग के मरूस्थल खड़े नही करना चाहिए, यही लोकतंत्र का सबक है.

( लेखक दैनिक आज की जनधारा के संपादक हैं )