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छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी बने नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड के सदस्य

छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी बने नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड के सदस्य


आयुष मंत्रालय के राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड का हुआ पुनर्गठन

छत्तीसगढ़ से पहली बार किसी को मिला है, यह अवसर

डॉ. राजाराम त्रिपाठी का "उच्च लाभदायक बहुस्तरीय जैविक हर्बल कृषि"  का कोंडागांव मॉडल देश विदेश में तेजी से हो रहा है लोकप्रिय

नई दिल्ली, 20 नवंबर। भारत सरकार के आय़ुष मंत्रालय के तहत औषधीय पौधों की खेती व उसके संरक्षण व प्रोत्साहन के लिए महत्वपूर्ण निकाय मेडिसिनल प्लांट बोर्ड ने अपनी नई समिति का गठन किया है. यह समिति औषधीय खेती को संरक्षित-प्रोत्साहित करती है औऱ इसका कार्यकाल अगले दो वर्षों तक होगा. 25 सदस्यी समिति में छत्तीसगढ़ के औषधीय पौधों की खेती करने वाले प्रगतीशील किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी को बतौर सदस्य नियुक्त किया गया है. 

समिति में विभिन्न सरकारी संभागों के अधिकारियों के साथ-साथ औषधीय पौधों के विशेषज्ञों को मनोनीत किया गया है. कृषि मंत्रालय व आयुष मंत्रालय द्वारा डॉ त्रिपाठी के नाम की अनुशंसा की गई थी. विदित हो कि डॉ त्रिपाठी ने औषधीय व जैविक खेती को लेकर एक लाभकारी मॉडल किया है, जिसकी देशभर में स्वीकृति प्राप्त है. इन्होंने बीते ढाई दशक में जैविक और औषधीय खेती के क्षेत्र में कई नवोन्मेष किया है और इनके नवोन्मेष से प्रेरित हो कर हजारों की संख्या में किसानों ने इनकी खेती के मॉडल को अपनाया है और लाभकारी खेती कर रहे हैं. डॉ त्रिपाठी ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्थानीय आदिवासियों को समावेशित कर एथिनो-मेडिको पार्क की स्थापना की है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित की गई विलुप्त होती जड़ी-बुटियों का संरक्षण-संवर्धन किया जाता है. तकीबन पांच लाख से अधिक पौधे इस पार्क में है. यह देश का इकलौता हर्बल पार्क इतना बड़ा पार्क है. डॉ त्रिपाठी ने जड़ी-बुटियों व जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए उनके उत्पाद के विपणन में आ रही परेशानियों को देखते हुए ढाई दशक पहले चैम्प नामक एक संगठन की स्थापना की, जिससे किसानों को उचित बाजार उपलब्ध हो सके. वर्ष 2005 में भारत सरकार ने भी इस संगठन को मान्यता दे दी और आज 40 हजार से अधिक किसान इस संगठन से जुड़ कर अपने उत्पाद का सफलता पूर्वक विपणऩ कर रहे हैं.   


इस संबंध में डॉ त्रिपाठी ने कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति हर्बल फार्मिंग के लिए विश्व में सर्वाधिक अनुकूल हैं. यहां 16 क्लाइमेट जोन है, जो इसे पूरे विश्व में विशेष बनाते हैं. उन्होंने कहा कि ग्लोबल हर्बल मार्केट में आज की तारीख में चीन का दबदबा है और भारत की हिस्सेदारी महज 16 फीसदी है. जब कि चीन के मुकाबले भारत जड़ी-बुटियों की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त जलवायु वाला देश है. बस जरुरत है कारगर नीति और उन नीतियों के सफलतापूर्वक कार्यान्वयन की. उन्होंने कहा कि मेडिसिनल प्लांट बोर्ड के सदस्य मनोनीत होने के बाद उनका प्रयास होगा कि जड़ी-बुटियों की खेती के लिए छोटे-छोटे किसानों को प्रोत्साहित किया जाए और कलस्ट बना कर इन्हें हर्बल फार्मिंग की ट्रेनिंग दी जाए. अगर इस दिशा में में सफलता मिलती है तो अगले कुछ वर्षों में ही भारत दुनिया का हर्बल हब बन कर उभरेगा और किसानों की आर्थिक स्थिति में गुणात्मक सुधार आएगा.

उल्लेखनीय है कि बीते दिनों जब केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के महा आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी तब देश में जड़ी-बुटियों की खेती के प्रोत्साहन के लिए 4 हजार करोड़ रुपये के कोष का आवंटन भी किया है, इसके तहत 25 लाख हक्टेयर भूमि में जड़ी-बुटियों की खेती की योजना है. डॉ त्रिपाठी ने कहा कि सरकार ने वक्त की नजाकत को बारिकी से समझा है और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने का निर्णय किया है. आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत देश को जड़ी-बुटियो के उत्पादन और विपणन में आत्मनिर्भर बनाया जाएगा. 

डॉ त्रिपाठी को मेडिसिनल प्लांट बोर्ड का सदस्य नियुक्त किये जाने पर चैम्प, मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के निदेशक अनुराग त्रिपाठी, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) के मीडिया समन्वय श्रीराजेश, भारीत साग-सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष श्याम गाड़वे, लीची उत्पाद संघ के बच्चा सिंह, एफपीओ महासंघ के अध्यक्ष पुनीत थींड, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना प्रगतीशील किसान संघ के अध्यक्ष जयपाल रेड्डी, बिहार औषधीय व सुगंधी पौधा उत्पादक संघ के अध्यक्ष एसएन शर्मा,  उत्तर प्रदेश औषधीय व सुगंधी पौधा उत्पादक संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर मिश्रा, धन्वतंरी पुरस्कार प्राप्त व औषधीय प्रगतीशील किसान रंग बहादुर सिंह, प्रगतीशील किसान विंध्यवासिनी सिंह, राधेश्याम मिश्रा, एडवोकेट अतुल अवस्थी, रिषु बाजपेयी, संपदा की जसमति नेताम ने हर्ष व्यक्त करते हुए बधाई दी है.  

डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि भारत में जड़ी-बुटियो की आपूर्ति वनों से सर्वाधिक होता है और इससे जंगलों से जड़ी-बुटियों की बहुत सारी प्रजातियां विलुप्त होने के कागार तक पहुंच गई है. इस लिए आवश्यक है कि ऐसी नीति हो जिससे जंगलों का विनाशविहिन दोहन किया जा सके. जिससे वनो की मौलिकता और उनका अस्तीत्व बना रहे तथा वहां से जड़ी-बुटियों का उत्पादन सतत होता रहे. इसके साथ ही बड़े पैमाने पर किसानों को हर्बल फार्मिंग का प्रशिक्षण देकर उन्हें जड़ी-बुटियों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाए तथा सब्सिडी की व्यवस्था की जाए. इससे किसानों की आय दोगुनी करने में जहां मदद मिलेगी वहीं उत्पादित जड़ी-बुटियों के प्रसंस्करण ईकाई स्थापित कर भारी पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित किये जा सकेंगे. इस प्रकार आने वाले कुछ वर्षों में भारत दुनिया का हर्बल हब बन कर उभरेगा.