breaking news New

विनम्र श्रद्धांजलि - प्रभु जोशी: एक देवदार का जाना - सुभाष मिश्र

विनम्र श्रद्धांजलि - प्रभु जोशी: एक देवदार का जाना - सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र
आप चाहे वाटर कलर पेंटिंग की बात करें, आप चाहे कहानी की बात करें, संपादन की बात करें, समसामयिक मुद्दे पर गंभीर टिप्पणी, आलेख की बात करें, भाषा की समझ, पॉंडित्य की बात करें या फिर प्रसारण माध्यम को जन्मोन्मुखी बनाने की बात करें या गजानन माधव मुक्तिबोध की दुऊह समझी जाने वाली अंधेरे में कविता के ध्वनि प्रसारण की बात करें, आपको एक नाम याद रहेगा वह नाम है, प्रभु जोशी। वे अपनी जलरंग चित्रकारी के रंगो और जल की तरह ही तरल थे। अपनी भाषा और समझ में वे बहुत ही सधन भी थे।

कोरोना की इस महामारी ने हमारे बीच से कला साहित्य, सिनेमा और समाज जीवन उस देवदार को हमसे छिन लिया जो पुरानी और नई पीढ़ी के बीच एक सेतु की तरह थे। आकाशवाणी की नौकरी में रहते हुए आकाशवाणी को प्रतिभाओ की कब्रगाह कहने वाले प्रभुजोशी को भले ही तबादले पर जरूर बस्तर ही क्यों ना जाना पड़ा हो, उनके तेवर कभी कम नहीं हुए। अभी हमारे देश के हालिया घटनाक्रम पर उनकी टिप्पणियां बहुत कुछ उनके तेवर और समझ को बयॉं करती है।
मूल्यहीन समय के इस कालखण्ड में धूर्तता
राजनीति की एक शाश्वत जिजीविषा है।

कट्टरवाद की राजनीति के भक्त सम्प्रदाय ने अपशब्दों में,
भारतीय समाज को आत्मनिर्भरता के सर्वाधिक ऊंचे सूचकांक पर
पहुंचा दिया है।

यहां न जन है, न तंत्र है, करोड़ों के खिलाफ बस एक का षडयंत्र है
—-
कट्टरवाद की राजनीति के भक्त-संप्रदाय ने, भारतीय समाज
को अपशब्दों में असंदिग्ध रूप से आत्मनिर्भर बना दिया है।

सत्ता के पंचांग में, कोरोना काल मोदी-सरकार के लिए
सर्वार्थ सिद्धि योग है...
कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही
विश्व-व्यापार और भारतीय कृषि के
बीच सेतु-निर्माण के नल-नील ही है।

कहते हैं कि मृत्यु एक शाश्वत सत्य है लेकिन यह शाश्वत सत्य पिछले कुछ समय से निरंतर देखने में आ रहा है। उस सत्य से निरंतर सबका पाला पड़ रहा है। सुबह होते ही एक शाश्वत सत्य से आमना-सामना होता है। कोई न कोई एक घटना सुनने को मिलती है। आज ऐसी ही ह्रदय विदारक घटना मृत्यु का शाश्वत सत्य लेकर प्रभु जोशी की मृत्यु के रूप में सामने आई है।

प्रभु जोशी ने 70 के दशक में कहानियां लिखना शुरू किया था और बहुत प्रभावी कहानियां लिखीं थीं। लेकिन सारिका के बंद होने और समांतर आंदोलन खत्म हो जाने पर वह अपनी मुख्य रुचि, अपने पुराने प्रेम पेंटिंग की तरफ मुड़ गए। वे जितने अच्छे कहानीकार थे, उतने ही अच्छे चित्रकार भी थे। जल रंग में मध्यम आकार की पेंटिंग बनाकर वह अपनी एक पृथक पहचान बना रहे थे। इंदौर जैसे छोटे शहर में रहने का एक नुकसान यह उठाना पड़ा कि बड़ी प्रतिभा होने के बावजूद उन्हें पेंटिंग में अपेक्षित नहीं मिला। फिर भी उन्होंने पेंटिंग का साथ नहीं छोड़ा और लगातार जलरंग में प्रयोग करते रहे। वे की प्रतिभा के धनी थे। अखबारों में विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहें और उनके लिखे हुए को काफी सराहना भी मिली। वे चित्रकला की जितनी अच्छी व्याख्या कर लेते थे, जितना अच्छा तार्किक ढंग से बोल देते थे, उनके समकालीन चित्रकारों में ऐसी प्रतिभा कम ही लोगों के पास थी। पढऩे का उन्हें काफी शौक था और उन्होंने देशी-विदेशी साहित्य काफी पढ़ रखा था और जब तक इस पढ़ें हुए का लेखन के समय या बोलते समय इस्तेमाल भी बखूबी करते थे। बहुत खूबसूरत कोटेशन बोलते थे। लेकिन अफसोस इस बात का है कि कहानी लेखन उनसे छूटा तो फिर वह दोबारा कहानी की तरफ पलट नहीं जा पाए और इस बात का अफसोस खुद उन्हें भी था। लेकिन हर बड़ी प्रतिभा की तरह वह भी लेखन और चित्रकला के बीच संतुलन नहीं साध पाए और एक दुविधा के बीच रहे। यह दुविधा समय ने उनके लिए पैदा की थी। हर समय में हर प्रतिभाओं को ऐसी दुविधा से गुजरना पड़ता है। वे मायूस होते थे लेकिन टूटे नहीं थे। लगातार चित्रकला में लगे रहे, जुटे रहे। उनके पास प्रतिभा  थी, लगन थी लेकिन जाने क्या बात थी कि समय का टोटा हमेशा उनको रहा। और इस बात को लेकर वह हमेशा दुखी रहते थे कि उनके पास समय की कमी है। समय उन्हें मोहलत नहीं दे रहा था और काम बहुत बिखरा पड़ा था, जो अब बिखरा ही रह गया। जैसी चुस्त-दुरुस्त भाषा उनके पास लेखन में थी वैसे ही सफाई चित्रकला में भी उनके पास थी। लेखन में भाषा से और चित्रकला में रंगों से खेलना वे जानते थे। रंग की भाषा पर भी उनकी पकड़ थी। अधिकांश प्रतिभाओं की तरह कला की दुनिया में उनके साथ भी यह  अदेशंा छल रहा था कि उनकी प्रतिभा के अनुकूल या अपेक्षित उन्हें वह नहीं मिला जिसके कि वह हकदार थे। इस बात का उन्हें कभी-कभी दुख भी रहता था। लेकिन वह अपना दुख कम ही प्रकट करते थे। नौकरी से रिटायर होने के बाद अब उन्हें अपने रंगकर्म से संतुष्टि मिल रही थी और वह खुश भी थे। लेकिन कहा जाता है कि काल से प्रतिभा की खुशी कभी देखी नहीं जाती है। वे एकाएक जाने किस बड़े कैनवास के पीछे अदृश्य हो गए हैं।

कोरोना हमें रोज-रोज डरा रहा है। हमारे बहुत से आत्मीयजन हमसे बिछुड़ रहे हैं, प्रभु जोशी उन्हीं में से एक थे। वे भी घर और अस्पताल के बीच कोरोना के कारण चल बसे। उनकी मृत्यु की सूचना ने समूचे कला साहित्य जगत को झकझोर कर रख दिया। गीतकार गुलजार से लेकर फिल्मकार प्रीतिश नंदी, डॉ अंजनी चौहान, ज्ञान चतुवैदी जैसे उनके मित्र संसार पूरे देश-दुनिया में फैला हुआ था। प्रभु जोशी दर असल एक वैश्विक व्यक्ति थे। यदि आकाशवाणी की लालफीता शाही के चक्कर में वे नहीं उलझे होते तो वे आकाशवाणी के महानिर्देशक होते। प्रभु जोशी के व्यक्तित्व की सहजता थी की वे बहुत जानकार, ज्ञानी होते हुए भी कभी भी अपने पांडित्य का प्रदर्शन अपने से छोटे लोगों के बीच नहीं करते। उनकी बातें जिनती सहज होती, उतनी ही विराट। इंदौर, जाने पर उनका आत्मीय निमंत्रण भला कौन भूल सकता है। अनिता भाई और प्रभु दा (जोशी) का जिसने भी आतिथ्य पाया है, वह उनका मुरीद हो गया। अपनी इंदौर पदस्थापना के दौरान 1987 में प्रभु जोशी से मित्र रवींद्र शाह के जरिए जो जान-पहचान, पारिवारिक रिश्ते बने वे हमेशा कायम रहे। उनकी रायपुर यात्रा हमसे मिले बिना अधूरी रहती। अपनी किताब पितृ ऋण की ही तरह वे कोई ना कोई पुराना ऋण अपनी संगत से चुका ही देते। वे बहुत अच्छी मिमिक्री भी करते थे।

मधुमेह यानी शुगर से पीडि़त होने के बावजूद घंटो कैनवास पर वाटर कलर पेंटिंग बनाना, समय निलाकर पढऩा, लिखना, मित्रों, स्नेही जनों को याद करना प्रभुदा की दिनचर्या का हिस्सा था। प्रभु जोशी जैसे बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति होना बहुत ही विरला होता है। भाषा के वे ऐसे जानकार थे, कि उन्हें बहुत बार इस बात से विरकित होती भी थी मीडिया भाषा के साथ बहुत ही अभद्र व्यवहार कर रहा है। इस विषय को लेकर उन्होंने बहुत ही गंभीर सवाल भी उठाएं।

बकौल प्रभु जोशी -
ये एक हतभाग्य समय है, जिसमें जनतंत्र में आलोचना को एक किस्म के लम्पटई के लालित्य नेलकवाग्स्त कर दिया है। सत्ता की राजनीति के समर्थक अपने, भाषा के मौलिक कमीनेपन पर आत्ममुग्ध हैं। वे किराए के इन्फो-वॉरियर्स है। धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे में कुत्सित का कब्जा हो चुका है।