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जोहार ले भोजली..... - सुशील भोले

जोहार ले भोजली..... - सुशील भोले


   छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति प्रकृति और अध्यात्मिक संस्कृति की मिलीजुली संस्कृति है। इसीलिए यहां की संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्म से संबंधित अनेक पर्व और संस्कृति का दर्शन होता है।

    सावन माह के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला भोजली पर्व मूलतः बहु बेटियों का ही पर्व है। सुहागिन महिलाएँ एवं कुंआरी कन्या एक बांस की टोकनी में मिट्टी भर कर धान, जौं, उड़द बोती हैं। पहले इसे नागपंचमी के दिन अखाड़ा की मिट्टी लाकर बोया जाता था। लेकिन समय के साथ अखाड़ा की परंपरा विस्मृत होने लगी। आजकल इसे पंचमी से लेकर नवमी तिथि तक सुविधा अनुसार बोते देखा जाता है। इसे घर के अंदर छांव में रखा जाता है।इसे श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने वाले पर्व राखी के दिन या इसके दूसरे दिन राखी चढ़ाने के पश्चात विसर्जित किया जाता है।

   इसे लगाने के बाद इसमें हल्दी पानी का छिड़काव करते हैं। रोज इसकी पूजा करते हैं। भोजली गीत गाकर सेवा करते हैं। दीपक जलाते हैं। इसे ही हम भोजली का पर्व कहते हैं।

देवी गंगा

देवी गंगा लहर तुरंगा

हमरो भोजली दाई के

भीजे आठो अंगा।

माड़ी भर जोंधरी

पोरिस भर कुसियारे

जल्दी जल्दी बाढ़व भोजली

हो वौ हुसियारे।

भोजली अंकुरित होकर मिट्टी से बाहर आ जाती है। उसके बढ़ने की गति कम है। तो गीत में कहा जाता है, कि गन्ना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। सिर भर ऊंचा हो गया है। जोंधरा घुटने भर ऊंचा हो गया। भोजली जल्दी जल्दी बढ़ो और गन्ने के बराबर हो जाओ।

आई गई पूरा

बोहाई गई मालगी।

सोन सोन के कलगी।।

लिपी डारेन पोती डारेन

छोड़ी डारेन कोनहा।

सबो पहिरे लाली चुनरी,

भोजली पहिरे सोना।।

आई गई पूरा,

बोहाई गई झिटका।

हमरो भोजली देवी ला

चंदन के छिटका।।

विसर्जन के दिन किसी पवित्र जलाशय के पानी में भोजली को ठंडा करते हैं, तो उसकी मिट्टी बह जाती है और सुनहरे रंग की भोजली बच जाती है। घर के अंदर रखने के कारण यह पीले रंग का हो जाता है। इसे ही कहते हैं कि यह सोने से लदी है। उसके पत्तों पर भूरे रंग के दाने पड़ जाते हैं, उसे ही कहते हैं कि उसके ऊपर चंदन का छिटा है।

"कुटी डारेन धान

पछिन डारेन भूसा

लइके लइका हावन भोजली

झनि करिहो गुस्सा।"

   घर की बेटियां घर का काम निपटा कर आती हैं। और कहती है। कि हम लोग धान कूट रहे थे।उसे फटक कर चाँवल और भूसा अलग किये। उसके बाद तुम्हारे पास आये हैं। देर हो गई इस लिए गुस्सा मत होना। एक मानव दूसरे प्रकृति के मानव रुप से बात कर रहे हैं। भोजली सबके मन में बस जाती है। उसको बढ़ते हुए रोज देखते हैं । उसकी सुंदरता का वर्णन करते हैं-

कनिहा म कमर पट्टा

हाथे उरमाले।

जोड़ा नारियल धर के भोजली

जाबो कुदुरमाले।।

नानमुन टेपरी म बोयेन जीरा धाने।

खड़े रइहा भोजली

खवाबो बीरा पान।।

कमर में सोने का कमर पट्टा पहनी है। हाथ में रुमाल और जोड़ा नारियल लेकर भोजली कुदुरमाल मेला जायेंगे।भोजली वहां पर खड़े रहना तुम्हे बीड़ा पान भी खिलायेंगे। भोजली को कुदुरमाल ले जाने के लिये बोल रहे हैं। अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग गीत गाये जाते हैं। कह सकते हैं कि लोक गीत गढ़े जाते हैं।

आठे के चाउर

नवमी के बोवाइन।

दसमी के भोजली

दूदी पाना होइन।

दुआस के भोजली

मोती पानी चढ़िन।

तेरस के भोजली

रहसि बिंहस जाइन।

चौदस के भोजली

पूजा पाहुर पाइन।

पुन्नी के भोजली

ठंडा होये जाइन।


   इस गीत में कब कब क्या किये इसका वर्णन है। बोने का काम नागपंचमी के दूसरे दिन करते हैं पर कभी सातवें या आठवें दिन भी बोते हैं।दसवीं के दिन दो पत्ते निकलते हैं। दुआस के दिन भोजली का रुप निखर जाता है। तेरस को भोजली लहस जाती है मतलब अपने पूरे यौवन में रहती है। चौदस के दिन इस भोजली की पूजा करते हैं। पुन्नी के दिन यह पहुना भोजली अपने घर वापस जाती है। जल से और मिट्टी से निकली भोजली वापस चली जाती है। मिट्टी, मिट्टी में और उसका जल, जल में मिल जाता है। यह भोजली भी विसर्जित हो जाती है।कुछ भोजली को ले आते हैं। जाते समय का दुख भी गीत में दिखाई देता है। भोजली के पत्तों पर पानी की बूंद रह जाती है उसे उसका आँसू समझा जाता है।

"हमरो भोजली दाई के निकलत हे आँसू"

इस भोजली के अलग रंग रूप अलग-अलग राज्यों में दिखाई देता है। मध्यप्रदेश में इसे " भोजलिया" कहते हैं। कहीं पर " कजरी " कहते हैं। इसे गढ़वाल में भी मनाते हैं पर वह सावन में ही खतम हो जाता है। वहां पर इसे भाइयों के लिए बहने बोती हैं।

छत्तीसगढ़ में यह मितानी याने मित्रता का प्रतीक है। सप्ताह भर तक घर में रखने के बाद बेटियां या बहुएँ इसे सिर पर या हाथ में लेकर तालाब में विसर्जन करने जाती हैं। राखी के दूसरे दिन इसे ठंडा किया जाता है। तालाब के पार या पचरी को साफ करके रखते हैं। ठंडा करते समय इसे गांव की गलियों में घुमाया जाता है। गाँव के घरों के सामने से गुजरते हैं, तो वे लोग उसकी पूजा करते हैं। तालाब में भोजली को रख कर उसकी पूजा करते हैं। उसके बाद उसे आँखो में आँसू भरकर ठंडा करते है।

भोजली का मानवीकरण करके पूजा करना उससे बातें करना सबके मन में प्यार पैदा कर देता है। बहुत ही प्यार से मिट्टी को पानी में धोया जाता है। उसके बाद भोजली को विसर्जित करते हैं। कुछ भोजली को रख लेते हैं। टोकनी में भोजली को रख कर बड़ों को देकर प्रणाम करते हैं। छोटों को देकर प्यार देते हैं। इसके अलावा इस दिन एक दूसरे के कान में खोंच कर एक नारियल देकर मित्रता भी बदते हैं। भोजली में भोजली देकर मित्रता बदते हैं वह तीन पीढ़ी तक तो चलती है। यह रिस्ता सगे से भी बढ़कर होता है।

लोग एक दूसरे के घर आते जाते हैं रहते हैं। एक दूसरे को बहुत सम्मान देते हैं। इसमें मित्रता करने वाले एक दूसरे का नाम नहीं लेते हैं। एक दूसरे को भोजली कहते हैं। इसी प्रकार से दौनापान, जंवारा, महाप्रसाद भी बदते हैं। यह सब अलग अलग समय पर होता है पर भोजली हमारे लिये मित्रता दिवस ही है।