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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सबके लिए स्वास्थ्य कैसे संभव होगा?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -सबके लिए स्वास्थ्य कैसे संभव होगा?

-सुभाष मिश्र
देश में कम होते कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन खुलने के साथ ही जगह-जगह लोगों की भीड़भाड़ बढऩेे लगती है और मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह भी कोई नहीं कर रहा है। देश के पर्यटक स्थलों पर जिस तरह की भीड़भाड़ दिखाई दे रही है वह नजारा चौंकाने वाला है। स्वास्थ्य मंत्रालय चेतावनी जारी कर कह रहा है कि यदि लोगों ने कोरोना प्रोटोकाल को नहीं माना तो फिर से लॉकडाउन में दी गई ढील बंद करनी पड़ेगी। अभी कोरोना का वायरस हमारे बीच से गया नहीं है उससे हमारी लड़ाई जारी है। इस समय देश में कोरोना के आज 34123 मरीज पाये गये हैं। वहीं दूसरी ओर तीसरी लहर आने की आशंका से भी लोग भयभीत हैं। सरकारें अपने-अपने स्तर पर तैयारी भी कर रही है। बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन, बच्चों के लिए विशेष तरह की विशेषज्ञ सेवा वाले चिकित्सक, आईसीयू वार्ड आदि के साथ ही ऑक्सीजन वाले बेड, वेंटीलेटर तथा प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की जरुरत होगी। कोरोना संक्रमण के हमारे अनुभव बताते हैं कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बड़े पैमाने पर कमी है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में हमारी स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत ही लचर है। सरकारी क्षेत्र के डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में जाना नहीं चाहते। जब भी किसी ग्रामीण या अर्धशहरीय क्षेत्र में कहीं विशेषज्ञ सेवाओं के डॉक्टरों की पदस्थापना की जाती है, वे वहां किसी भी तरह शहरी क्षेत्र में अपना अटैचमेंट करा लेते हैं। सरकारी अस्पतालों में पदस्थ डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं और सरकारी अस्पताल का उपयोग क्लिनिक में मरीज भेजने के लिए करते हैं। ऐसी सारी चुनौतियों के बीच सरकार निजी क्षेत्र को ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रोत्साहित कर सस्ती दर पर जमीन आदि देकर अस्पताल बनाने प्रेरित करना चाहती है। प्रायवेट सेक्टर ग्रामीण इलाकों को कैचमेंट एरिया की तरह मरीजों के लिए प्रारंभिक चिकित्सा सुविधा देकर गंभीर उपचार के लिए अपने शहरी क्षेत्र के बड़े अस्पतालों में भेजेंगे। सरकार को लगता है कि इससे ग्रामीणों को प्रारंभिक इलाज मिल जाएगा और निजी अस्पतालों को लगता है कि उन्हें ग्रामीण क्षेत्र में मरीज मिल जाएंगे।

हमारे देश में यदि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है तो यह काम सरकार के स्तर पर ही संभव होगा। प्रायवेट सेक्टर वहीं जायेगा जहां उसे अधिक मुनाफे की उम्मीद होगी। प्रधानमंत्री जब प्रायवेट पब्लिक पार्टनरशिप के जरिए हेल्थ सिस्टम विकसित करने की बात करते हैं तो मौजूदा कोविड संक्रमण में उपजी स्थितियां और कुछ निजी अस्पतालों की मनमानी, अनाप-शनाप बिलिंग को भी याद कर लेना चाहिए। आपदा को अवसर समझने वालों ने एक बार फिर यह सिद्घ कर दिया है कि जो भी बड़ी कारपोरेट पूंजी वाले लोग हेल्थ सर्विसेज में आयेंगे, तो उनका उद्देश्य अधिक मुनाफा कमाना ही होगा। सरकारी तंत्र में बहुतेरे चिकित्सक सरकारी कामकाज, प्रशासनिक अधिकारी के रुप में ज्यादा काम करते हैं, बजाय एक चिकित्सक के। तीसरी लहर की प्रतीक्षा में बैठी हमारी सरकारों को आने वाली किसी भी विपदा से बचने के लिए मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उसकी मौजूदा सीटों की संख्या भी बढ़ानी होगी। विशेषज्ञ डाक्टरों के लिए पीजी सीट बढ़ाकर पैरामेडिकल स्टाफ के प्रशिक्षण पर समुचित ध्यान देना होगा। डॉक्टरों को प्रशासनिक कामों से अलग करना होगा।

छत्तीसगढ़ सरकार चिकित्सा सेवा को लघु उद्योग का दर्जा देने पर विचार कर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा बढ़ाना चाहती है। इसके पूर्व भी शहरी क्षेत्र के 13 अस्पतालों को प्रायवेट सेक्टर को देने की कोशिश हुई। जिसका विरोध भी हुआ और प्रायवेट क्षेत्र आगे भी नहीं आया। एक ओर सरकार सबके लिए स्वास्थ्य का नारा बुलंद करती है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए प्रायवेट क्षेत्र को आमंत्रित करती है। सरकार में बैठे लोगों को लग रहा है कि प्रायवेट क्षेत्र के लोग आकर सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं, सहूलियत और अनुदान आदि के कारण ग्रामीण क्षेत्र में मेडिकल सुविधा बढ़ायेंगे। इस संबंध में हाल ही में सरकार के जनसंपर्क विभाग की ओर  से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध हो सके, इसके लिए सभी शासकीय अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ ही स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा के निर्माण में निजी क्षेत्र का सहयोग भी लिया जाएगा। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल निर्माण के लिए निजी क्षेत्रों को राज्य सरकार द्वारा अनुदान भी दिया जाएगा। यह अनुदान राज्य सरकार द्वारा सेवा क्षेत्र के उद्योगों को दिए जा रहे अनुदान के तहत होगा।

इस समाचार के जारी होने के बाद छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने मीडिया के जरिए कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुदान प्राप्त निजी अस्पताल मरीजों से चिकित्सा शुल्क लेते हैं तब यह नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा की अवधारणा के खिलाफ है। सिंहदेव ने कहा कि वह शुरू से ही सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा योजना के पक्ष में रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणा-पत्र में स्वास्थ्य का अधिकार योजना का जिक्र किया था।  
यदि हम देश के परिपे्रक्ष्य में देखें तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 ने 2025 तक स्वास्थ्य में सरकारी खर्च के सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचने का लक्ष्य रखा था। इस तरह के लक्ष्य को हासिल करने में हमारा देश सक्षम नहीं है या फिर  2020 में वैश्विक कोविड-19 महामारी ने भारत सरकार को अपने स्वयं के 2025 लक्ष्य से अधिक खर्च करने के लिए मजबूर किया।

कोविड के चलते भारत की अर्थव्यवस्था लडख़ड़ाई हुई है।  इसका मतलब यह होगा कि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए निरंतर, अतिरिक्त धन के लिए नए स्रोतों का दोहन करने की आवश्यकता होगी। पंद्रहवें वित्त आयोग ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए 2020 और 2025 के बीच स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए 5.38 लाख करोड़ की आवश्यकता का अनुमान लगाया था।

एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगर भारत को समान स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना है तो 2030 तक 2.07 मिलियन डॉक्टरों की जरूरत है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ग्रामीण कमियों को भरने के उद्देश्य से, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में चिकित्सा सीटों का विस्तार कर रही है। नवीनतम उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, एमबीबीएस सीटों की संख्या में 48 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जो 2014-15 में 54,348 से बढ़कर 2019-20 में 80,312 हो गई है। 2014 और 2019 के बीच की अवधि के दौरान सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि पिछले पांच वर्षों में सरकारी और निजी सहित मेडिकल कॉलेजों की कुल संख्या में 33 प्रतिशत की काफी कम वृद्धि हुई है। वर्ष, 2014-15 में 404 से 2019 में 539 तक।  
स्वास्थ्य सुविधाओं में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग(एनएमसी) ने मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए न्यूनतम पांच एकड़ भूमि की आवश्यकता को समाप्त करने का विचार सामने रखा है। इसके अलावा आयोग ने कॉलेज में सीटों की संख्या के अनुपात के रूप में आवश्यक न्यूनतम बिस्तरों की संख्या को कम करने का प्रस्ताव किया है। इसके अलावा नए नियमों में व्याख्यान थिएटर, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, संलग्न मेडिकल कॉलेज की न्यूनतम बिस्तर की आवश्यकता और संकाय कार्यालयों के स्थान और छात्रों के आवास के लिए आवश्यकताओं को भी निर्धारित किया गया है।  हमारे देश में डॉक्टर-से-रोगी अनुपात बेहद कम है, जो प्रति 1,000 लोगों पर केवल 0.7 डॉक्टर है। इसकी तुलना विस्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रति 1,000 लोगों पर 2.5 डॉक्टरों के औसत से की जाती है। भारत में आधुनिक चिकित्सा की विशेषता में 1154686 पंजीकृत डॉक्टर हैं। वर्तमान में एकल सरकारी एलोपैथिक चिकित्सक 10926 व्यक्तियों की आवश्यकता को पूराकरते हैं। वर्तमान में भारत की कुल जनसंख्या का 60 प्रतिशत ग्रामीण भारत में रहता है। ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए सरकार ने 25743 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 158417 उपकेंद्र और 5624 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए हैं। वर्तमान में भारत में सरकारी अस्पतालों में 713986 बिस्तर उपलब्ध हैं जो प्रति 1000 जनसंख्या पर 0.55 बिस्तर हैं।  सरकार ने छह साल में इस योजना पर 64,180 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है। योजना के तहत 17,000 से अधिक ग्रामीणऔर 11,000 शहरी स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों को सहायता प्रदान की जाएगी। इसके अलावा सभी जिलों में एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी और 11 राज्यों में3,382 ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयां स्थापित की जाएंगी। 602 जिलों और 12 केंद्रीय संस्थानों में क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक बनाए जाएंगे। देखने सुनने में यह योजना बहुत  लोकलुभावन लगती है किन्तु कोरोना काल का अनुभव इससे बिलकुल अलग है। सवाल यही है कि क्या सबके लिए स्वास्थ्य बिना निजी सहभागिता के संभव नहीं हो पायेगा। कहीं स्वास्थ्य भी शिक्षा की तरह महंगा ना हो जाए।