कोरोना वायरस: सोशल नहीं फिजिकल डिस्टेंसिंग की जरूरत है

कोरोना वायरस: सोशल नहीं फिजिकल डिस्टेंसिंग की जरूरत है

अंजलि मिश्रा

दुनिया भर में कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच सोशल डिस्टेंसिंग शब्द खासा लोकप्रिय हो रहा है. कोरोना संकट के संदर्भ में सोशल डिस्टेंसिंग का अर्थ है आपस में मिलने-जुलने या सामाजिक आयोजनों का हिस्सा बनने से बचना. कुछ समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद, महामारी से बचने के उपाय के तौर लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग अपनाने के लिए कहा गया था. इसके मद्देनजर कई देशों में लॉकडाउन लागू कर दिया गया और सामाजिक आयोजनों पर पाबंदी भी लगा दी गई. हालांकि ये पाबंदियां और सावधानियां आगे भी होंगी लेकिन अब इन्हें ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की बजाय ‘फिजिकल डिस्टेंसिंग’ कहने के प्रयास किये जा रहे हैं.

बीते हफ्ते डब्ल्यूएचओ ने भी अपनी प्रेस रिलीज में सोशल डिस्टेंसिंग की जगह फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द इस्तेमाल करने की बात कही है. रिलीज में डब्ल्यूएचओ की महामारी विशेषज्ञ मारिया वान करखोव के हवाले से कहा गया है कि ‘सोशल कनेक्शन के लिए जरूरी नहीं है कि लोग एक ही जगह पर हों, वे तकनीक के जरिए भी जुड़े रह सकते हैं. इसीलिए हमने इस शब्द में बदलाव किया है ताकि लोग यह समझें कि उन्हें एक-दूसरे से संपर्क तोड़ने की नहीं बल्कि केवल शारीरिक तौर पर दूर रहने की जरूरत है.’

कई समाज विज्ञानी और भाषा विशेषज्ञ शुरूआत से ही कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए एक-दूसरे से दूर रहने को सोशल डिस्टेंसिंग कहने का विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि इस शब्द से लोगों में यह संदेश जाएगा कि उन्हें अपने आसपास के लोगों से बातचीत ही नहीं करनी है या उनसे किसी तरह का कोई संपर्क ही नहीं रखना है. कोरोना वायरस की भयावहता और उसके फैलने के तरीकों के चलते लोगों में इस तरह का भ्रम पैदा हो जाना स्वाभाविक ही था. मसलन, इस समय लोग बातचीत करने से इसलिए बच रहे हैं ताकि कहीं बोलते हुए सामने वाले व्यक्ति के मुंह से निकलने वाली सलाइवा ड्रॉप्लेट्स (बूंदे) उन पर न गिर जाए. ऐसा संक्रमण से बचने के लिए किया जा रहा है, न कि दूसरों से संपर्क ही तोड़ देने के लिए. इसी बात को रेखांकित करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने अपनी टर्मिनॉलजी में सुधार किया है. यानी लोगों को बातचीत करनी बंद नहीं करनी है, बस ऐसा छह फीट दूर होकर या फिर ऑनलाइन माध्यमों के जरिए करना है.

अमेरिका की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस और पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर डेनियल अल्ड्रिच शुरू से ही ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ शब्द के इस्तेमाल पर ऐतराज जताते रहे हैं. प्रोफेसर अल्ड्रिच के मुताबिक इस महामारी में सर्वाइव करना है तो लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के बजाय अपने सामाजिक संबंध मजबूत रखने होंगे. इसके उपायों के तौर पर वे मोबाइल पर एक संदेश भेजने या पड़ोसी के लिए ग्रॉसरी लाने जैसी बेहद छोटी-छोटी कोशिशों को भी कारगर मानते हैं.

प्रोफेसर अल्ड्रिच ने कुछ समय पहले युद्ध, आपदा और महामारियों से उबरने में सामाजिक संबंधों की भूमिका पर एक शोधपत्र जारी किया था. इसमें उन्होंने जापान में आई सूनामी और अमेरिका के विध्वंसक हरिकेन कटरीना जैसी आपदाओं का उदाहरण देते हुए बताया है कि आपातकाल में उन लोगों के बचने की संभावना ज्यादा होती है जो सामाजिक तौर पर सक्रिय होते हैं. इस पत्र में कहा गया है कि बचने वालों में से एक बड़े तबके का कहना था कि वे इसलिए बचे क्योंकि किसी ने सही वक्त पर आकर उनके दरवाजे पर दस्तक दी या फिर समय रहते उन्हें फोन कर चेता दिया. यानी कि इस तरह के लोगों को जल्दी और आसानी से मदद मिल सकती है.

डेनियल अल्ड्रिच का मानना है कि कोरोना त्रासदी के दौरान और उसके बाद आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए लोगों को एक-दूसरे की जरूरत पड़ेगी. इसके लिए अपने पड़ोसी, दोस्तों या आसपास के लोगों से अच्छे संबंध रखना बेहतर तरीका हो सकता है. अल्ड्रिच के अलावा भी कई जानकार सोशल डिस्टेंसिंग को सटीक शब्द न मानते हुए, यह इशारा करते है कि इससे लोगों में ‘एकला चलो रे’ सरीखा गलत संदेश जाता है और यह आगे चलकर सामाजिक ढांचे के धराशायी होने की वजह बन सकता है.

लेकिन कुछ विशेषज्ञ इससे सहमत होने के बावजूद, इस समय टर्मिनॉलजी बदले जाने पर आपत्ति जताते हैं. वाशिंगटन पोस्ट से बात करते हुए कोलरैडो यूनिवर्सिटी में समाज विज्ञान की प्रोफेसर लॉरी पीक का कहना था कि ‘सोशल डिस्टेंसिंग शब्द अपनी जड़ें जमा चुका है. लोग इसे अपना रहे हैं और संस्थाएं इसे अपनी पॉलिसी का हिस्सा बना चुकी हैं. कोरोना संकट जीवन-मरण का प्रश्न है. इस समय इस शब्द को बदलना भ्रम और संकट पैदा करने वाला बन सकता है.’

लेकिन इसी रिपोर्ट में अखबार ने एक अन्य विशेषज्ञ रॉबर्ट ओलशेंस्की के हवाले से लिखा है कि ‘सोशल डिस्टेंसिंग शब्द विरोधाभासी है. इससे लगता है कि हमें एक-दूसरे से अलग हो जाना है. लेकिन ऑनलाइन मंचों को देखें तो पता चलेगा कि लोग सिर्फ शारीरिक तौर पर दूर रहना चाहते हैं यानी एक-दूसरे से कटकर नहीं.’