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ध्रुव शुक्ल की कविताः चीटियों को देखते हुए

ध्रुव शुक्ल की कविताः चीटियों को देखते हुए


चली आ रही है धरती पर

निर्भय कविता

कविता के पीछे कविता

साथ छोड़ती नहीं किसी का


धरती के भीतर रखकर 

शब्दों के अण्डे

बार-बार आती है बाहर

चला आ रहा कविता के पीछे

शब्दों का जूलूस

धरती के भीतर से


किसी कुतरे फल को देख

कुछ देर उसी पर बैठ

अपना अर्थ खोजते शब्द

अचानक फिर चलने लगते

अन्न-कणों को सिर पर रख


माटी को भुरभुरी बनाकर

गोलबंद हो बैठे रहते शब्द

बड़ी देर तक गुनताड़े में


धरती के भीतर जा कर बार-बार

कुछ पूछ-पूछकर बाहर आते

और कभी सबके सब

धरती में छिप जाते

कभी अचानक एक साथ

फिर बाहर आ आते


चला आ रहा शब्दों का जुलूस

अन्त नहीं है जिसका