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बसपन का प्यार वाया वैश्विक मीनाबाजार - डॉ. राजाराम त्रिपाठी

बसपन का प्यार वाया वैश्विक मीनाबाजार - डॉ. राजाराम त्रिपाठी


पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के सुकमा जिले के एक गांव की छोटे से आदिवासी बच्चे सहदेव का गाना "बसपन का प्यार" सोशल मीडिया में अविश्वसनीय तेजी से प्रचलित हुआ, सोशल मीडिया की भाषा में कहें तो वायरल हुआ,जिसे सात घंटे में सत्तर लाख व्यूज मिले । सर्वप्रथम तो संतोष कुमार मंडावी तथा बस्तर मीडिया के उन सभी साथियों को साधुवाद जिन्होंने बस्तर की मासूम आवाज की खनक को विश्वफलक पर ला दिया। 

इस घटना ने मुझे अतीत की लगभग ऐसी ही दो घटनाओं की याद दिला दी। हालांकि इन घटनाओं के संदर्भ और निहितार्थ बिल्कुल अलग-अलग हैं।

              पहला वाक्य बस्तर के ही शेरों के साथ खेलने और मित्रता के लिए विश्वप्रसिद्ध वंडरब्याय चेंदरू का है, जिन्होंने अपने इस नैसर्गिक प्रतिभा के बूते कई देशों की यात्रा की, सिल्वर स्क्रीन पर भी चमके, अपार लोकप्रियता हासिल की और बस्तर को विश्व फलक पर एक पहचान दिलाई। और कुछ वर्षों बाद ही चेंदरू के लिए दुनिया एकदम बदल गई, बस्तर नारायणपुर के गढ़बेंगाल गांव के जिस झोपड़े से चले थे, वापस उसी झोपड़े में पनाह मिली। पास रह गया तो बस बीते चमकदार दिनों का साक्षी और निशानी ,एक मटमैला सा फोटो एल्बम जिसे बड़ी ही हसरत भरी नजरों से देखते हुए, बड़ी ही कोमलता से पन्ने पलटते हुए दिखाते थे, और एल्बम दिखाते दिखाते अपने अतीत की दुनिया में कुछ पलों के लिए मानो खो जाते थे।। दुर्भाग्य से मैं चेंदरू के गुमनाम, गरीब,बेबस लंबे बुढ़ापे का चश्मदीद गवाह रहा हूं। अब आप चाहे जो भी कहें, पर यह चमक-दमक और ग्लैमर सितारों की ये दुनिया ऐसी ही है,कौन जाने कब किसे यह सिर पर बिठाले और नाचती फिरे,,और कब उसे निर्ममता से जमीन पर पटक दे,और फिर दोबारा उसे कभी मुड़कर भी ना देखें।  

            दूसरी वाकया मुझे क़रीब दस साल पहले विख्यात अभिनेता रजनीकांत के दामाद वेंकेटश प्रभु कस्तूरी राज उर्फ अभिनेता धनुष के एक गाने 'कोलावरी कोलावरी डे' की रातों-रात परवान चढ़ी लोकप्रियता के कुशल प्रबंधन की याद आती है, गीत संगीत को चिढ़ाता हुए वह गाना ? क्यों और कैसे देश में ही विश्वविख्यात हो गया यह आज भी शोध का विषय है। खैर यह तो शायद बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि 

यह विकट अभिनेता धनुषजी यूं तो केवल दसवीं पास हैं, किंतु जन्मजात प्रतिभा के दम पर इस महान गीत के बोल उन्होंने महज 6 मिनट में लिखे थे,और गाना केवल 35 मिनट में शूट भी हो गया था। बहरहाल उनकी उन्नति का ग्राफ अभी भी 45 डिग्री पर ऊर्ध्वगामी है, ऐसी वफादार किस्मत हर एक को हर मोड़ मिले,बाकी जिन्हें यह नसीब नहीं उन सभी के लिए तो बस शुभकामनाएं ही आरक्षित हैं। 

    'बसपन का प्यार' के गायक खालिस बस्तरिया बालक का बिना सुर-ताल, और वाद्ययंत्रों की बैशाखियों के यह छोटा सा अनगढ़ सा गीत, हमारे बस्तर में आए दिन हो रहे खून खराबे, गोला-बारी की बेशुमार बारूदी बदसूरत खबरों के बीच एक सुखद ठंडी हवा के बयार की तरह प्रतीत हुआ। बस्तरिया होने के कारण मुझे खुशी भी हुई और गर्व भी। 

  हाल फिलहाल एक और खबर आई कि, एक नामचीन गायक ने इस नन्हे गायक से फोन पर बात की, उसे महानगर बुलाया और आज के दौर के सारे लटके झटके और ग्लैमर के तड़के और बस्तरिया लडके के साथ का एक वीडियो एल्बम भी ताबड़तोड़ बना डाला है, और यह की यह एल्बम भी दिन दूनी रात चौगुनी लोकप्रियता की पायदान दर पायदान चढ रहा है, दौड़ रहा है। यह सब अब लगातार सोशल मीडिया के लाइक,शेयर,व्यूज, सबस्क्राइब और टीआरपी के बाजार में सुनामी की तरह छाये जा रहा है। हर छोटे, बड़े, मझोले टीवी चैनल न्यूज़ पोर्टल के कारिंदे उस बच्चे का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू लेने के लिए दौड़ लगा रहे हैं, और इस दौड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। क्योंकि सवाल टीआरपी का है, सवाल लाइक, व्यूज़ और अपने दर्शक संख्या बढ़ाने का है । कुल मिलाकर यह सारा खेल अंततः पैसे बनाने का है, हो सकता है इससे उस बच्चे के परिवार को भी कुछ पैसे मिल जाए और उनका जीवन स्तर कुछ ऊपर उठ जाए, और यह बेशक बहुत ही अच्छी बात है, पर निश्चित रूप से इस सफलता ने बस्तर की प्रसिद्ध और विलुप्तप्राय बोलने वाली मैना की तरह नैसर्गिक रूप से स्वच्छंद भाव में गाने गुनगुनाने वाले उस बच्चे की मासूमियत और बचपन को तो गंभीर संकट में डाल ही दिया है। बस्तर के और देश के दूसरे बच्चे इस घटना को किस रूप में लेंगे और उन पर इसका क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा यह भी सोच विचार का एक अलग मुद्दा हो सकता है।

     यूं तो देश के अलग-अलग हिस्से के लोग हिंदी को अपनी स्थानीय भाषा बोली के प्रभाव से अलग अंदाज में बोलते ही हैं। मैथिली में हिंदी का सामान्य वाक्य भी गेय हो जाता है। बस्तर की हिंदी मैं भी शक्कर के 'श' की जगह बिना झिझक सरौते का 'स' ले लेता है, धुर गोंडी क्षेत्र में कई बार शर्मा साहब 'चर्मा छाब' हो जाते हैं,और खाना बेवजह काना हो जाता है, पर इससे भाव संप्रेषण में रत्ती भर फर्क नहीं आता। यह बच्चा अपने पूरे बचपने के साथ जब बचपन को बसपन गाता है, तो वही आनंद मिलता है जो छोटे बच्चों की निश्छल तोतली बातों को सुनने में मिलता है। पर इस पूरे प्रकरण को देखने पर कई बार ऐसा लगता है, मानो यह सोशल मीडिया अपने बाजारूपन के निहित स्वार्थ साधने के लिए, इस निश्चल बच्चे के बेलौस गाने का, उसके भोले बचपन का तथा बस्तर की मूल आदिवासियत का मखौल उड़ा रहा है। वैसे भी बस्तर की आदिवासियत को तथा बस्तर को एक प्रोडक्ट की तरह बेचने वालों की कमी नहीं है,बल्कि इसमें दिनोंदिन इजाफा ही हुआ है। आजादी के पहले राजा महाराजाओं, सामंतों के स्वागत सत्कार में और आजादी के 70 साल बाद आज हमारे लोकतंत्र से व्युत्पन्न आज के दौर के राजा अर्थात नेताजी मंत्री जी आदि के स्वागत सत्कार में हमारे आदिवासी भाईयों को थोड़े से पैसे का लालच दिखाकर, फुसलाकर उन्हें उनके गांवों से भेड़ बकरियों की तरह वाहनों में ठूंसकर नगर महानगर ले जाकर उनके खूबसूरत परंपरागत सींग वाले मुकुट पहनाकर, बड़े-बड़े ढोल, मांदरी के ,साथ स्वागत नृत्य हेतु कौतुक की तरह पेश किया जाता है। कभी कभार लोकतंत्र के ये राजा, हमारे महान नेता महाप्रभु आदिवासियों के साथ उनके मुकुट अपने सिर पर रखकर दो चार कदम आड़ा तिरछा थिरक कर संपूर्ण आदिवासी समुदाय को मानो कृतार्थ कर देते हैं। क्या यह सचमुच आदिवासी कला और संस्कृति का सम्मान है। माफ करिए, आप भले ही मुझसे असहमत हो सकते हैं, किंतु मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। दरअसल यह हमारे आदि पुरखों, हमारे महान आदिवासी संस्कृति तथा उनकी कला का सम्मान बिल्कुल नहीं है, बल्कि आज अपने आप को सभ्य तथा विकसित कहलाने वाले समाज का यह एक भौंडे प्रहसन का थोथा प्रदर्शन है। जरा गौर कीजियेगा, संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2005-2015 का दशक आदिवासियों की गरिमा स्थापना पर ठोस कार्य हेतु संकल्पित किया था। जरा विचार करें क्या हमारे उपरोक्त कृत्यों से सचमुच आदिवासियों की गरिमा में वृद्धि हो रही है?


संयुक्त राष्ट्र ने ही, 22 मार्च 2021 को घोषणा की है कि 2022 से 2032 को "आदिवासी दशक" के रूप में मनाया जाएगा, जो सैंतीस करोड़ आदिवासियों की तेजी से विलुप्त हो रही लगभग 7000 जनजातीय भाषाओं के संरक्षण व संवर्द्धन पर केंद्रित होगा। क्या सचमुच हम लोग इस दिशा में कुछ ठोस प्रयास कर रहे हैं, जवाब बेहद आसान है, और उससे हम आप भली-भांति परिचित भी हैं।

   अंत में एक बार फिर इस बेहद प्यारे नन्हे गायक बच्चे के बारे में चर्चा करना चाहूंगा। मैंने एक साक्षात्कार में देखा जब एक स्वनामधन्य एंकर इस दस साल के मासूम बच्चे से उसके बचपन के प्यार और प्यार के मायने खोद खोद कर पूछ रहे थे, और बेचारा बचपन निरुत्तर था। मुझे झटका लगा जब सुना कि बच्चा बता रहा था, कि अब वह बहुत बिजी हो गया है। उसे अब रोज सुकमा शहर जाना पड़ता है, और यह सब से बड़ा अच्छा लगता है। खैर मीडिया को तो सनसनी चाहिए, टीआरपी चाहिए, पैसा चाहिए अरे इसके लिए किसी बच्चे का बचपन ही तराजू पर क्यों ना चढ़ाना पड़े। बच्चे को समुचित शिक्षा दीक्षा देने उसकी कला को निखारने तरासने अगर यह संस्थाएं आगे आती हैं तो उसका स्वागत होना ही चाहिए पर यह सब कुछ किसी भी हालत में, उसके बचपन के मासूमियत और उसकी मूल आदिवासियत की कीमत पर कदापि नहीं होना चाहिए।

ध्यान रहे बस्तर ना तो कौतुक है और ना ही म्यूजियम है। ना तो बस्तर मीना बाजार है और ना ही सहदेव मीना बाजार मैं टिकट लेकर दिखाया जाने वाला "कटे सिर वाली बोलती हुई लड़की" का कौतुक है। बस्तर तमाम लूट के हादसे झेलने के बावजूद अपने बचे-खुचे अद्वितीय नैसर्गिक सौंदर्य तथा अनूठी खूबियों के साथ गरिमामय ,गर्वीले स्वाभिमानी आदिवासियों का प्राकृतिक रहवास है। इसे वैश्विक मीनाबाजार का शोकेस बनने से हर हाल में रोकना होगा और यह हम सबकी जिम्मेदारी है। बस्तर के जनप्रतिनिधियों तथा बस्तर की जागरूक जुझारू मीडिया को भी इसके लिए अपना और अधिक सक्रिय, जिम्मेदार सकारात्मक रूप दिखाना होगा।