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ममता और राम

ममता और राम

ध्रुव शुक्ल

रामायण में रचा गया राम-नाम गंगासागर के किनारे किसी को चिढ़ाने के लिए नहीं, सबको अपनाने के लिए रचा गया है। जीवन एक असाध्य धनुष है। राम का पूरा जीवन इस धनुष को साधने की कला सिखाता है।

रामचरित में जीवन-धनु साधते राम को सब अपनी-अपनी ममता से देखते हैं--  जनक की भरी सभा में राम किसी को वीर रस, किसी को श्रृंगार, किसी को रौद्र, किसी को विराट कालरूप, किसी को परमार्थ तत्व, किसी को अपने प्रियजन और किसी को अपनी ही संतान जैसे लगते हैं। सब अपने स्वभाव के अनुरूप राम पर अपनी ममता उँडेलकर उन्हें अपने रंग में रँगते हैं।

बाल्मीकि और तुलसीदास ने  मनुजरूप राम में उस स्वराज्य को बसा हुआ देखा है जिसमें कोई किसी से बैर नहीं करता और सब अपने मन को परखकर विषमता के भाव से मुक्त बने रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो रामरत हैं उसका सबूत यह होगा कि उनके काम-क्रोध और अहंकार मिटने लगते हैं और वे निजप्रभुमय जगत की प्रतीति में खोये रहते हैं , उन्हें किसी से कोई विरोध मोल नहीं लेना पड़ता ।

राम कथाओं में मनुष्य के शरीर को ही अयोध्या और भवसागर पार करने की नाव माना गया है। सबको राम की तरह एक-दूसरे का स्वार्थरहित सखा होकर खुद ही पार उतरना पड़ता है। सबको यही चिंता होना चाहिए कि हमारी देह की यह नाव अगर पत्थर दिल होकर भारी होती गयी तो हम भी डूबेंगे और अपने हृदय के गर्भगृह में बसे राम और अयोध्या को भी डुबायेंगे।