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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जमीनी सच्चाई ने कम की अंधभक्तों की संख्या

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जमीनी सच्चाई ने कम की अंधभक्तों की संख्या

-सुभाष मिश्र

हमारे देश में इस समय ही मोहभंग का दौर चल रहा है। कोरोना से होने वाली मौत के भयावह आंकड़ों में गिरावट के साथ ही अंधभक्तों की संख्या के आंकड़ों में भी गिरावट दिखाई दे रही है। हालांकि इस पर नजर रखने का कोई पोर्टल या एप नहीं है लेकिन अगर कोविड एप जैसा मोदीविन या केजरीविन या राहुलीन जैसा कोई एप होता तो इसका पता जरूर चल जाता। भक्तों को अपने नेताओं की अंधभक्ति और तपस्या से तो किसी प्रकार का आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। वह ज्ञान उन्हें अपने करीबियों के लिए अस्पताल खोजने और आक्सीजन, रेमडेसिविर की कमी से सत्य के साक्षात्कार के बाद मिला। बचे खुचे भक्तों को सत्य का बोध हुआ जब अस्पताल के बिल के भुगतान का समय आया। वैक्सीन की कमी ने भी अंधभक्तिका पर्दा हटाने का काम किया। अब राममंदिर के जमीन खरीदी के मामले में सत्य भले ही जो भी हो मगर ये अहसास तो हो ही गया है कि श्रद्धा से एकत्रित हुए 3200 करोड़ के चंदे के उपयोग का मालिकाना हक किसी और का है। दरअसल टेक्नालॉजी का उपयोग कर भक्तों की तादात बढ़ाने वाले उन्हें तरह-तरह के सब्जबाग दिखाने वाले नेता और उनके मीडिया मैनेजर ये भूल कर गए कि लोगों के हाथों में पकड़े मोबाइल के फेसबुक, यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर का उपयोग विपक्षी टीम भी करना जानती है। अंधभक्तोंं की संख्या में गिरावट लाने में अहम भूमिका उसी सोशल मीडिया ने निभाई जिसकी वैतरणी से इनकी नैय्या पार हुई थी और जिसके द्वारा अंधभक्तों की फौज तैयार की गई थी। आक्सीजन की कमी अकल्पनीय हो या ना हो, अंधभक्तों में गिरावट अकल्पनीय है और अभूतपूर्व भी। भक्तों का रूझान देखकर लग रहा है भविष्य में यह गिरावट ऐतिहासिक भी हो जाएगी। पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले जो लोग बड़े जोर-शोर से भाजपा में गए थे, चुनाव परिणाम आने के बाद ममता जी से कह रहे हैं गलती हो गई, वापस ले लो। भक्तिरस में डूबे जिन अंधभक्तों को लग रहा था कि मोदी है तो मुमकिन है या जो ये मानकर खुशफहमी पाले बैठे थे कि अच्छे दिन आने वाले हैं, उन्हें शाईनिंग इंडिया से भी ज्यादा निराशा हाथ लगी है। कहते हैं कि उम्र, समझ और संगत के साथ आदमी की रूचि बदलती रहती है। कोरोना संक्रमण के दौरान उपजी स्थितियां और जमीनी हकीकतों ने बहुतों का मोहभंग किया। अपने लिए जीवन भर की आक्सीजन का इंतजाम किये बैठे लोग भी आक्सीजन के लिए दम तोड़ते दिखे। जिन्हें ये गुमान था कि उनके एक फोन काल पर अस्पताल में एक बेड तो क्या पूरा अस्पताल मिल जायेगा, वो अस्पताल के गलियारों में भी अपने स्वजनों को जगह नहीं दिला पाये। कोरोना के समय हो रही मौतों ने बहुत को बहादुर शाह जफर की याद दिला दी-
कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।

भारतीय राजनीति में पारस्परिक विचार-विमर्श के द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय लेने की परिपाटी स्वाधीनता संग्राम के दौरान कांग्रेस के भीतर विकसित हुई थी। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के विचारों से असहमति और विरोध के अनेक उदाहरण उस दौर में मिलते हैं। गांधी या नेहरू जैसे महानायकों का भी अनेक मुद्दों पर विरोध होता था। लोगों ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया, मगर अवसर आने पर असहमति भी व्यक्त की। उनके भक्त या अनुयायी भी बड़ी संख्या में थे लेकिन वे अंधभक्त नहीं थे। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र न होता तो उसके भीतर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसे वैचारिक समूह न पनपते।

स्वाधीनता आंदोलन के दौर के कांग्रेस का यह लोकतांत्रिक चरित्र कमोबेश स्वतंत्र भारत में भी क़ायम रहा। उसके अधिवेशनों में या संसद के भीतर अनेक बार कांग्रेस के सदस्यों ने नेतृत्व को कटघरे में भी खड़ा किया।
सत्तर के दशक में कांग्रेस के भीतर इंदिरा गांधी की कार्यशैली में असहमति के दमन के लक्षण उभरे, जिसकी परिणति आपातकाल के रूप में हुई। सत्ता और शासक पार्टी दोनों पर एकाधिकार स्थापित कर उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को पंगु बनाने की शुरुआत की। राजनीति में भक्तिवाद का यह आरम्भ था। भक्त हमेशा नेता पर न सिर्फ अंधी आस्था रखे, बल्कि उसके अवांछित निर्णयों और कार्यों का भी समर्थन करे, यह राजनीतिक भक्तिवाद का प्रमुख लक्षण है। इसे आपातकाल में इंदिरा गांधी को भारत का पर्याय निरूपित करने की चापलूसी में देखा गया था।

इंदिरा जी 1980 में जब दुबारा सत्ता में आईं तब भक्तिवाद राजनीतिक संस्कृति के भीतर पैठ जमा चुका था। बाद में तमाम राजनीतिक दलों की कार्यशैली में इसकी दखल बढऩे लगी। व्यक्ति-केंद्रित दलों में पार्टी सुप्रीमो की हैसियत और ताक़त पर ग़ौर करें तो कहा जा सकता है कि नेतृत्व के प्रति कार्यकर्ताओं की निष्ठा की बजाय उनके आत्मसमर्पण और निजी स्वार्थपरता के चलते भक्तिवाद भारतीय राजनीति का चारित्रिक गुण बन गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा में यह पहले से था। वहां नेतृत्व पर प्रश्न उठाना वर्जित था। अब प्राय: सभी राजनीतिक दल इसी शैली में काम करते हैं। उनके कार्यकर्ता वस्तुत: भक्तमें तब्दील हो चुके हैं।
हमारी भक्ति परम्परा में भक्त या संत, गुरु और ईश्वर दोनों के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण के साथ अपना स्वत्व विसर्जित कर देने और आराध्य से एकाकार होने पर विश्वास करते थे। उनका समर्पण नि:स्वार्थ और अहैतुक था लेकिन भक्ति की राजनीतिक संस्कृति में नेता के प्रति कार्यकर्ता का समर्पण मात्र स्वार्थपूर्ति के उद्देश्य से प्रेरित हुआ करता है। यह प्राय: सभी दलों में दिखाई देता है।

पिछले कुछ वर्षों की उल्लेखनीय घटना यह है कि भक्तिवाद राजनीति से बाहर निकलकर समाज में भी पसर गया है। यह अभूतपूर्व है। उसके लिये संचार-माध्यमों का इस्तेमाल कर 2013 में बड़े स्तर पर छवि निर्माण का उद्यम चलाया गया। फलस्वरूप नेतृत्व की जो विराट छबि निर्मित हुई, उसके आगे पार्टी कार्यकर्ताओं को तो नतमस्तक होना ही था। अंधाधुंध प्रचार के ज़रिए आम जनता में भी भक्तिभाव उत्पन्न किया गया। ज़ाहिर है, इसके पीछे मीडिया की बड़ी भूमिका थी। देखते-देखते भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा भक्ति से सराबोर हो गया। दरअसल मीडिया ने एक नया मसीहा खड़ा कर लिया था।

2014 के देश में हुए लोकसभा चुनाव के बाद से नरेंद्र मोदी जिस युवा उत्साह की लहर पर सवार हुए थे, वह कम होता दिख रहा है। अधिकांश युवाओं को लग रहा है कि अर्थव्यवस्था गलत दिशा में जा रही है। मोदी समर्थक समझे जाने वाले कुछ पढ़े-लिखे युवा अब खुले तौर पर अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन और ध्रुवीकरण के मुद्दों पर लगातार जोर देने पर अपनी निराशा व्यक्त करते हैं।
सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, अकेले अप्रैल के महीने में 20 से 30 वर्ष की आयु के 2.7 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी खो दी। आज का अधिकांश युवा भारत अनिश्चितता में डूबा हुआ है।

भक्तिरस से विमुक्त होता युवा अब यह मानने को तैयार नहीं है कि पिछले 70 सालों में कुछ नहीं हुआ। उसे मालूम है कि जब देश आजाद हुआ था तब हमारे पास बुनियादी ढांचे के लिए संसाधन भी नहीं थे और पूंजी भी नहीं थी। अब उसे उस तरह से हिंदू धर्म खतरे में नहीं दिखता जैसा प्रचारित किया गया था। उसे छद्म राष्ट्रवाद भी पसंद नहीं आता। उसे मंदिर, मस्जिद, गाय, लव जिहाद जैसे मुद्दे भी अब प्रासंगिक नहीं लगते। उसने गोदी मीडिया पर दिखाये जाने वाले झूठ को सच बताने के खेल को भी समझना शुरू कर दिया है। ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार को देखकर वह ना खाऊंगा ना खाने दूंगा, का सच भी समझ गया है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और कोरोना महामारी ने उसे भक्त की बजाय एक सजग नागरिक के रूप में सोचने को विवश किया है।