breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-विवाह विज्ञान के बदलते समीकरण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-विवाह विज्ञान के बदलते समीकरण

सुभाष मिश्र
स्त्री-पुरुष के आपसी घनिष्ठ रिश्तों, दाम्पत्य में बंधने के लिए अब पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखना, एक दूसरे के परिवार को पहले से जानना या रिश्तेदारी या जात समाज का होना अब जरूरी नहीं है। कामकाज के लिए घर से निकले युवक-युवती को मनचाहा साथी चाहिए भले ही आपस में बहुत ज्यादा जान पहचान न हो। अब चट मंगनी पट ब्याह से आगे का मामला हो गया है। इस समय का सूत्रवाक्य है पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो। वर्चुअल होती दुनिया में बहुत से रिश्ते सोशल मीडिया साइट्स, मैरिज ब्यूरो के जरिए तय हो रहे हैं। बहुत बार एक दूसरे की जरूरत साथ में काम करना आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा जैसे बहुत से कारण है जिसमें स्त्री पुरुष बिना विवाह के लंबे समय तक लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं। विवाह के लिए अब रिश्तेदारों, घर के बुर्जुगों, पंडित, नाई की जरूरत नहीं है जितना कि मेट्रोमोनियल साइड या सोशल प्लेटफार्म की।  मेट्रोमोनियल साइड या सोशल प्लेटफार्म के जरिए तय होने वाली शादी या लिव-इन-रिलेशनशिप के मामले हल्ला तब मचता है जब कोई पक्ष एक दूसरे से किए गए वादों और अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। लिव-इन-रिलेशनशिप के मामले में विवाह का वादा कर जो विवाह नहीं करता जिससे बाद में यह रिश्ता नहीं बनता ऐसे मामलों में लड़की की ओर से दैहिक शोषण  का मामला दर्ज कराया जाता है। आये दिन हमें ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। आर्थिक रूप से आजाद स्त्री अब शादीशुदा जिंदगी में पति या ससुराल की एकतरफा दादागिरी बर्दाश्त नहीं करना चाहती। देश में बढ़ते तलाक के प्रकरण इसकी मिसाल है। सबको अपना-अपना स्पैस, निजता चाहिए।

आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में नए रिश्ते खोजना बेहद मुश्किल होते जा रहा है। मध्यमवर्गीय समाज में जहां पहले ये काम आपसी रिश्तेदारी में ही कर लिया जाता था, लेकिन अब इनकी जगह मैरिज ब्यूरो ने ले ली है लेकिन ये प्लेटफॉर्म जितना सहज नजर आते हैं उतने होते नहीं, क्योंकि इसमें आपकी गोपनीयता भंग होने की पूरी गुंजाइश होती है। वहीं कोई अपनी पहचान बदलकर भी लोगों को धोखा दे सकता है। आये दिन इस तरह के कई मामले सामने आ रहे हैं। जब लुभावने रिश्ते के लालच में लोग फंस जाते हैं।
 
छत्तीसगढ़ में भी कई केस मैरिज ब्यूरो से धोखाधड़ी के सामने आ चुके हैं। हाल ही में बेमेतरा की एक युवती के साथ इसी तरह झांसे में शादी और फिर इंदौर में उसके साथ बर्बरता का बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। इसी तरह बिलासपुर में रिटायर्ड कर्मचारी-अधिकारियों को पुनर्विवाह कराने के नाम पर चूना लगाने वाले गिरोह का भंडाफोड़ कुछ दिनों पहले हुआ था। इसी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर विदेश में रहने वाले लोग गलत तरीके से विवाह कर लेते हैं और बाद में लड़कियों की जिंदगी नरक बन जाती है। समाज में आपसी रिश्तेदारी से उठता भरोसा और संबंधों में आई दूरी का सबसे दुखद पहलू ये भी है कि लोग अब अपने बच्चों के रिश्ते के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो रहे हैं और बिलकुल अंधेरे में तीर चलाने की तरह बनने वाले ये रिश्ते कई बार जीवन भर का घाव बन जाते हैं।  

सुप्रसिद्ध लेखक आचार्य चतुरसेन शास्त्री अपनी किताब दाम्पत्य विज्ञान में कहते हैं कि 'विवाह एक विज्ञान है वैवाहिक जीवन में हम विचारहीन तरीके पर नहीं चल सकते। स्त्री-पुरुष के बीच जो एक वैज्ञानिक सीमा है उसे जाने या माने बिना हम प्रेममूलक विवाह में भी सुखी नहीं हो सकते।
स्त्री-पुरूष का जीवन मिलकर ही पूर्णाग होता है। स्त्री के बिना पुरूष और पुरुष के बिना स्त्री अपनी मर्यादा को प्राप्त नहीं कर सकती परन्तु एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का विवाहित जीवन अधिक महत्वपूर्ण है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री कहते हैं कि 'स्त्री और पुरुष के बीच में अकस्मात आकर्षण द्वारा उत्पन्न प्रेम संयम से परे की वस्तु होती है। संयम से उसका गठबंधन नहीं होता, वासना से होता है।

स्त्री-पुरुष  एवं पति-पत्नी का साहचर्य तभी पूरा हो सकता है जब दोनों का पूर्ण आत्मार्पण होता है। चाहे टीवी में आने वाले मैरिज के विज्ञापन हो या समाचार पत्रों या फिर दीवारों पर सभी जगह रिश्तों की भरमार है। अलग-अलग मैरिज ब्यूरो रिश्ते करने वाले उसी तरह छाए हुए हैं जैसे कि बहुत सारी कालोनी बनाने वाले या सामान बेचने वाले जैसे जिसकी हैसियत है। मैरिज ब्यूरो में वैसे-वैसे प्रावधान कर रखे हैं। अक्सर मैरिज ब्यूरो के नाम से धोखाधड़ी करने वाले पहली बार शादी करने वालों के साथ ही विधवा पुनर्विवाह, तलाकशुदा लोगों की शादी आदि के नाम पर जमकर रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं। खासतौर पर इसी वर्ग के लोगों के साथ ही धोखाधड़ी भी ज्यादा हो रही है। इसलिए मैरिज ब्यूरो, मैट्रिमोनियल साइट से रिश्ते का चुनाव करते हुए कुछ सावधानी बरतनी चाहिए।

मैरिज करने वालों को विश्वसनीय मैट्रिमोनियल साइट का पता करना चाहिए जब वे शादी के लिए रिश्ते तलाश रहे हो तो किसी भी वेबसाइट पर प्रोफाइल बनाने से पहले उसकी विश्वसनीयता के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए। शादी के प्रस्ताव के लिए व्यक्ति की प्रोफाइल फोटो बहुत सारे संकेत दे सकती है। वेबसाइट पर उस शख्स की प्रोफ़ाइल फोटो न हो तो ऐसे में अच्छा होगा कि ऐसे व्यक्ति से तुरंत दूरी बना लें नकली अकाउंट बनाने वाले लगातार अपनी प्रोफाइल में कुछ न कुछ बदलाव करते रहते हैं। यदि एक व्यक्ति अपने डेटा यानी जाति, शौक, व्यवसाय और प्रोफाइल पिक्चर को बहुत बार बदल रहा है तो संभावना है कि वह कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा है।

संभावित पार्टनर से जब मिलना हो तो पब्लिक प्लेसेस को ही चुनें क्योंकि मिलने वाले शख्स को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते। यदि अगर आपका संभावित पार्टनर लगातार पैसों की मांग कर रहा है तो सतर्क हो जाइए क्योंकि अक्सर इस तरह का पैतरा अपनाकर चूना लगाते हैं। किसी भी मैट्रिमोनियल साइट पर खुद को रजिस्टर करते वक्त ऐसी कोई ई-मेल आईडी देने से बचें जो आपके बैंक अकाउंट से संबंधित हो। कोई प्रोफाइल आपको पसंद आ गया तो आप शादी से पहले उसकी अच्छे से वैरिफिकेशन करवाएं। ऐसी कई वैरिफिकेशन एजेंसी है जो कम शुल्क में भी लोगों के पूरे प्रोफाइल का पता लगाती है। आज इंटरनेट की पहुंच गांव-गांव तक है ऐसे में जालसाज ग्रामीण इलाकों में भी इन साइट्स के माध्यम से अपनी धूर्तता के बीज बो रहे हैं इसलिए बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।  

अन्य सामाजिक बदलावों के साथ ही विवाह संस्था भी परिवर्तनों से गुजर रही है। आर्थिक विकास, तकनीक के आगमन भौतिक मूल्यों के प्रति गहरे लगाव, धराशायी होते धार्मिक, सांस्कृतिक मूल्यों में विवाह संस्था में वैवाहिक संबंधों में, वैवाहिक संबंधों की परिभाषा में बड़े परिवर्तन किए हैं। नई पीढ़ी इन परिविर्तनों का खुलकर समर्थन और वकालत कर रही है।

इस उपभोक्तावादी युग में जब वस्तुओं का महत्व यूज एंड थ्रो हो गया है तो इंसानी रिश्ते भी इससे अछूते नहीं है। एक समय तक समाज वर्जनाओं से बंधा हुआ था। परंपराओं, संस्कारों, मान्यताओं और घर के बुर्जुगों का दबाव नई पीढ़ी को उच्छृंखल होने से रोकता था। घर परिवार में अदब और लिहाज हुआ करता था लेकिन संयुक्त परिवारों के टूटने से बच्चे न तो परिवार की साझा संस्कृति सीख रहे हैं और न ही अपने बड़ों के लिए किसी तरह का लिहाज रहा है।

ये पीढ़ी हमसे मैं पर आ गई है। यही नहीं बोल्ड होनी नैतिकता, मूल्यों, अभिव्यक्ति के नाम पर ध्वंस करती हमारी फिल्में, हमारे धारावाहिकों ने भी समाज के सामूहिक संस्कार में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है। वो तमाम ज्ञान और बातें जो अब तक नैतिक वर्जना के दरवाजों से ढंकी हुई थी इंटरनेट ने उन्हें ध्वस्त कर दिया है। इंटरनेट ने संस्कृतियों को ग्लोबल कर दिया है। जाहिर सी बात है इंटरनेट का ज्ञान और खुलापन भी हमारी मानसिकता को बदलने में एक बड़ा कारक है।

वो तमाम सामाजिक लोकाचार आदतें जो किसी देश में स्वीकार्य और किसी में अस्वीकार्य है, खुले रूप में न सही बंद कमरों में एक बहुसंख्यक आबादी को स्वीकार्य है। इसमें परिवर्तन के मूल्यों की जड़ता को तोडऩे का रोमांच भी है। सेक्स जैसे विषय लिव-इन रिलेशनशिप पर चर्चा अब कोई सोशल टैबू नहीं रहा। किसी जमाने में प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह पर नाक-भौ सिकोडऩे वाला वो समाज जिसमें ऐसे प्रेमी युगल स्वयं के अस्वीकार्य के चलते खुद को असुरक्षित महसूस करते थे अब उनके बाद की पीढ़ी इस सामाजिक स्वीकार्य से बेपरवाह और निडर होकर बिना विवाह किये लिव-इन-रिलेशनशिप में जी रहे हैं। बिना विवाह के लोग यौन जीवन का आनंद ले रहे हैं इसके लिए अब विवाहित होने के कोई मायने नहीं रह गये हैं। बर्थ कंट्रोल यानि स्त्री गर्भ ठहर जाने के भय से आजाद हो चुकी है। दुनिया भर की दवाइयां बाजार में उपलब्ध है। इसने भी स्त्री को दासी भाव से मुक्त किया है। वो आर्थिक रूप से स्वावलंबी  और मजबूत है। पुरूष को उसका साथ चाहिए तो उसे स्त्री की शर्त माननी होगी। आर्थिक आजादी ने स्त्री के हाथ को ऊंचा कर दिया है।

पुरुष का भी यही हाल है। जैसे बच्चा किसी खिलौने से ऊब जाता है ये पीढ़ी अपने रिश्तों से और यौन व्यवहार की एकरसता से जल्द ऊब जाती है। उसे थ्रिल चाहिए, परिवर्तन चाहिए। इसीलिए आप पार्टनर जल्द बदलते हैं। इसमें पुरुष के साथ स्त्री की भी सहमति बन रही है। इस व्यवहार को सामाजिक खुलेपन की उदारता के नवाचार के रूप में देखा जा रहा है। अपने आदिम व्यवहार में पालीगैमी रहने वाला इंसान फिर से इसी व्यवहार को अपना रहा है। यौन व्यवहार केवल संतान उत्पत्ति तक सीमित नहीं है अब वो एक चरम भौतिक सुख का दर्शन है जिसमें घर के दायरे टूट रहे हैं और एक से अनेक और अनेक का एक से संबंध हो रहा है। इसे समाज का एक आधुनिक तबका स्वीकार चुका है और उसे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती।

प्रसंगवश यह शेर-
अजब है ये सलीका, तेरी नुमाईश-पसंदी का
अब आबरु के दीदार को, कोई मशक्कत ना रही।