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'किसान चेतना के अद्वितीय लेखक थे प्रेमचंद’ : छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन

'किसान चेतना के अद्वितीय लेखक थे प्रेमचंद’ : छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन

छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा 'किसान चेतना ओर प्रेमचंद’ विषय पर आयोजित व्याख्यान समारोह में मुख्य अतिथि व प्रमुख वक्ता ईश्वर सिंह दोस्त, भोपाल ने कहा कि प्रेमचंद किसान समस्याओं के नहीं, बल्कि किसान चेतना के अद्वितीय लेखक थे। वे सारी दुनिया को किसान की आँख से देखते थे। ऐसी किसान दृष्टि अपने सारे ऐतिहासिक बोध के साथ फिर कभी सामने नहीं आई। औपनिवेशिक व पूँजीवादी संबंधों के जाल में घिरे किसान की दशा और भविष्य को वे एक किसान की ही नजर से देख सके।

युवा लेखक व विचारक दोस्त ने कहा कि किसान चेतना को हिंदी व उर्दू में पहली बार सामने लाने वाला प्रेमचंद का प्रेमाश्रम 1920 में लिखा गया था व 1922 में छपा था। आज सौ साल बाद 2020 भी प्रेमाश्रम का साल लगता है। तब भारत के किसानों पर संकट इसलिए आया था कि अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी- पूँजीवादी बाजारों की जरूरत के लिए अंग्रेजों ने भारत के कृषि संबंधों को बदल दिया था। आज यही काम तीन किसान विधेयकों के जरिए मोदी सरकार ने शुरू किया है। 

उन्होंने कहा कि 1920 के दशक में भी किसान आंदोलन सिर्फ किसानों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की आजादी के लिए था। आज भी किसान आंदोलन भारत की आजादी व उस प्रक्रिया से निकले लोकतंत्र को बचाने के लिए है। आज भी किसान सिर्फ अपने लिए नहीं लड़ रहा है बल्कि वह देश के बेरोजगारों के लिए, देश के लोकतंत्र के लिए, देश के संविधान के लिए और देश के मेहनतकशों के लिए लड़ रहा है। अगर 1920 का दशक चंपारण सत्याग्रह, अवध आंदोलन, बारदोली आंदोलन का था तो 2020 का दशक भी किसान आंदोलन का है।

ईश्वर सिंह दोस्त ने कहा कि पश्चिम में उपन्यास विधा मध्यवर्ग की आत्मचेतना की अभिव्यक्ति थी, मगर हिंदी में उपन्यास का विकास किसान चेतना की अभिव्यक्ति के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। उस दौर में अगर गांधी ग्रामीण भारत की राजनीतिक अभिव्यक्ति थे तो प्रेमचंद सांस्कृतिक अभिव्यक्ति। आज भी किसान चेतना को समझने के लिए प्रेमचंद को पढऩा जरूरी है। 

उन्होंने कहा कि पश्चिम में किसान परास्त हो चुका है, मगर भारत और विकासशील देशों में उसका संघर्ष जारी है। इस स्थिति में आधुनिकता, समाजवाद जैसी तमाम अवधारणाओं का किसान और आदिवासी चेतना के साथ पर्याप्त संवाद होना जरूरी है। भारत में किसान नवउदारवाद के लोकतंत्र विरोधी अभियान के खिलाफ सबसे जुझारू ताकत बन सकता है, क्योंकि अर्थतंत्र और समाज तंत्र में होरी की तरह हारते किसान के पास एकमात्र उम्मीद लोकतांत्रिक राजनीति का मजबूत होना है। इसके लिए हमें राजनीतिक अर्थशास्त्र के बरक्स किसान, आदिवासी और लोक के नैतिक अर्थशास्त्र को भी गहराई से समझना होगा, जिसे प्रेमचंद ने विपरीत परिस्थितियों में भी किसानों के अपनी नैतिक आभा और मरजाद को बचाए रखने के संघर्ष के रूप में चित्रित किया है। इसी नैतिक अर्थशास्त्र का हिस्सा है प्रेमचंद की सांप्रदायिकता विरोधी प्रखर दृष्टि। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सम्मेलन के अध्यक्ष व ख्यात साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद ने भारत में साहित्य सृजन की जिस परंपरा की बुनियाद रखी थी, उसे बढ़ाया तो गया है, मगर आज के किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में इसे नई ऊँचाइयों में ले जाना होगा। 

इसके पहले छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रबंध मंत्री राजेंद्र चांडक ने सम्मेलन की गतिविधियों का एक परिचय दिया। सम्मेलन के महामंत्री डॉ. राकेश तिवारी ने विषय प्रवर्तन किया और कार्यक्रम का संचालन भी किया। कार्यक्रम में शिव शर्मा, संपादक, पत्रिका, मदनमोहन खंडेलवाल, संतोष झांझी, राहुल सिंह, असीम चन्देल, डॉ. के.बी. बंसोड़, मोईज कपासी, पथिक तारक, रमेश सोनी, जी.आर. नायक, मिन्हाज असद, डॉ. बिप्लव बंदोपाध्याय, संजय शाम, आलोक वर्मा, नंद कंसारी, अरूण काठोठे, बंधु राजेश्वर खरे, सुभाष मिश्र, कमल शर्मा, शेखर नाग, यशवंत स्वामी सहित अन्य साहित्यकार, कलाकार व संस्कृतिकर्मी मौजूद थे। अशोक शर्मा, महासमुंद ने आभार व्यक्त किया।