कोरोना संकट: जंग की ललकार की नहीं, दोस्ती की पुकार की घड़ी

कोरोना संकट: जंग की ललकार की नहीं, दोस्ती की पुकार की घड़ी

अपूर्वानंद

प्रधानमंत्री कमांडर हैं और जनता उनकी सिपाही. सिपाही की जगह सैनिक अधिक गरिमामय प्रतीत होता है, इसलिए उसी शब्द का इस्तेमाल करें. यह मैं नहीं, आज की सरकार का कोई मंत्री नहीं, विपक्षी दल के एक नेता, पिछली सरकार में गृह मंत्री रह चुके पी. चिदंबरम ने देश की तालाबंदी के शुरुआती दिनों में कहा.

चिदंबरम को इस सरकार ने जेल में रखा है. क़ानून जानने वालों का का कहना था कि वह बिल्कुल ग़लत था. यह इसलिए लिखा कि चिदंबरम इस सरकार के पीछे लोगों को सैनिक की तरह लामबंद होने को कहें, अपने साथ हुए अन्याय को भूलकर, इसका अर्थ हुआ कि हालात सचमुच संगीन हैं. जंग का आलम है. देश, राष्ट्र पर संकट है. इस स्थिति में आपसी रंजिशें भूलकर दुश्मन को शिकस्त देने में मिलकर ताकत झोंक देनी है. कमांडर और फ़ौजी, ये शब्द सैन्य भाषा के हैं. इसके साथ जो शब्द साथ ही लगा आता है, वह है युद्ध.

प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए जब देश की तीन हफ़्ते की तालाबंदी का ऐलान किया तो स्थित की गंभीरता समझने के लिए कहा, महाभारत 18 दिन में जीता गया था, इस बार उससे तीन दिन ज़्यादा लगेंगे. महाभारत हो सके, इसके लिए कृष्ण ने अर्जुन जा जो प्रबोधन किया था, जिसे गीता कहा गया, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जनता को उसका पाठ करने का उपदेश दिया. शासक दल के एक प्रवक्ता ने, जिन्हें नेता भी कहा जाने लगा है, अख़बार में प्रधानमंत्री की प्रशस्ति करते हुए जो लिखा उसका सार यह था कि इस महायुद्ध में उन्होंने जिस कामयाबी से जनता को लामबंद किया है, उसकी तारीफ के लिए भाषा के पास शब्द नहीं हैं.

पिछली सरकार के एक अन्य मंत्री कपिल सिब्बल ने लिखा कि कोरोना के खिलाफ युद्ध को सिर्फ डॉक्टरों पर नहीं छोड़ा का सकता. चिदंबरम से आगे बढ़कर उन्होंने कहा कि जनरल को मुश्किल फैसले करने होंगे क्योंकि यह जंग सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं लड़ी जानी है. आगे उन्होंने इस संग्राम में लगे सभी योद्धाओं सलाम किया. वे डॉक्टर हैं, पुलिसकर्मी हैं और ख़बरनवीस हैं. युद्ध, संग्राम, जंग… ऐसा नहीं कि भारत में ही कोरोना वायरस के संक्रमण को अवरुद्ध करने की प्रक्रिया को परिभाषित करने के इन शब्दों का प्रयोग हो रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक में अध्यापक क्रिस्टीन श्वोबेल पटेल ने ‘अल जज़ीरा’ में अपने लेख में बताया है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी जनता को कहा कि यह चीनी वायरस से युद्ध है. इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें युद्धकाल में सरकार की तरह काम करना चाहिए. फ्रांस के प्रमुख ने कहा कि हम युद्ध के बीच हैं. चुनौती लेकिन कहीं और है. वह समझ में आया जब जर्मनी की मुखिया मर्कल ने दुकानों में काउंटर पर बैठे, रसीद काटते लोगों को सलाम किया.

दुकान, ख़रीददारी ये साधारण जीवन के सबूत हैं. जर्मन प्रमुख ने साधारण जीवन को बहाल रखने की चुनौती को समझने की कोशिश की. मिलना-जुलना, बाज़ार, खेल के मैदान… ये सब ज़िंदगी के मामूलीपन के चिह्न हैं. युद्ध असाधारण परिस्थिति उत्पन्न करता है. इस समय समाचार, विचार और सामाजिक आचार का निर्धारण सिर्फ और सिर्फ सरकार कर सकती है. साधारण जनता पूरी तरह सरकार के भरोसे और उसकी मोहताज हो जाती है. वह अपने सारे अधिकार खुद ब खुद सरकार के हवाले करने को तैयार हो जाती है. इस तरह सरकार जनता की मर्ज़ी से उसकी मालिक बन बैठती है. देश हित में एक स्वर से बोलने की मांग खुद जनता की ओर से उठने लगती है. मतभेद के स्वर को सरकार का नहीं देश, राष्ट्र और जनता का शत्रु ठहरा दिया जाता है.

सैनिक से बलिदान की अपेक्षा है. क्या युद्ध छिड़ा हो तो उसे मज़बूत जूते मांगने का हक़ है? उसे लड़ना और मरना है. युद्ध के बीच में अधिकार की बात स्वार्थ चिंता कही जाती है. इस समय अगर डॉक्टर खुद को संक्रमण से बचाने की सामग्री की मांग करते हुए काम रोक दें तो उन्हें सजा मिले, यह मांग उसी जनता की तरफ से उठने लगेगी, जो इनके लिए करतल ध्वनि के कोलाहल का उत्सव मना रही थी. जिसकी रोजी मारी गई और जो अब सरकार और रहमदिलों का मोहताज है दो रोटी के लिए, वह कौन-सा सैनिक है? वह कौन-सी जंग लड़ रहा है?

युद्ध दो भावों को प्रबल करता है, एक भय और दूसरे घृणा. कुछ कहेंगे वीरत्व, लेकिन हम जानते हैं कि वह अपवाद है भय जितना प्रबल होगा और कितना व्यापक होगा, सत्ता के समक्ष समर्पण उतना ही सरल होगा. जनता का स्वेच्छया समर्पण हर सत्ता का सपना है. जनता जब बिना सवाल खुद को हुकूमत के सुपुर्द कर देती है तो उसके भीतर जनतांत्रिक प्रतिरोध की कमी का पता चलता है.

वह भयग्रस्त कर दी गई है, जागरूक नहीं है और इस तरह वह सत्ता के वशीभूत होने को बाध्य है. प्रश्नविहीन कर दी गई ऐसी जनता निश्चय ही सभ्य और परिष्कृत नहीं है.घृणा भय के बाद दूसरा भाव है. कोरोना से घृणा कैसे की जाए? यह वायरस देखा नहीं जा सकता. जिसे संक्रमित करता है, वह अवश्य ही दृश्य है.मैं, मेरे स्वजन जब इसके मेजबान हों तो वे सहानुभूति के पात्र हैं और उपचार के भी, लेकिन वह जो मेरा नहीं है, ऐसी अवस्था में संक्रमण का स्रोत हो जाता है, उसका इश्तेहार बना कर बाकियों को उससे सावधान किया जाता है.घृणा को परिचित आश्रय मिलने से वह अधिक कठोर और क्रूर हो सकेंगी. इसलिए पुराने पूर्वाग्रह और शत्रुताएं युद्ध के बहाने उभर आती हैं.पिछली महामारियों में इसके उदाहरण हैं जब अमेरिका में मैक्सिकन और यूरोप में यहूदियों को निशाना बनाया गया.अमेरिका और बाक़ी जगहों पर चीनियों पर हमले उनके खिलाफ पहले से मन में पल रही घृणा की अभिव्यक्ति है जैसे भारत में उत्तर पूर्व के लोगों पर हमले.

युद्ध और शत्रु की तलाश ने भारत की राष्ट्रीय और पारंपरिक घृणा को वैधता दे दी है. वह है मुसलमानों के खिलाफ नफरत.भारत में हर तरफ मुसलमानों के खिलाफ नफरत की आंधी आ गई है. हर तरफ पैदल सैनिक अपने इलाकों की सुरक्षा में तैनात हो गए हैं.गली, मोहल्ले, गांवों में मुसलमानों पर आक्रमण हो रहे हैं, उनका कारोबार बंद किया जा रहा है. मुसलमान विरोधी घृणा बजबजाकर बाहर बह रही है.क्या यही इस सरकार के नेता पिछले सालों में नहीं कर रहे थे? क्या वे संतुष्ट नहीं हैं कि इस युद्ध ने इसे जायज बना दिया है?

हमें सरकारों और भीरु राजनेताओं, बुद्धिजीवियों से कहना चाहिए कि यह युद्ध नहीं है. इस नए, अनजान वायरस के मानव संसार के प्रवेश से खलबली मच गई है.अभी मालूम हुआ कि दुनिया जा सबसे युद्धकामी देश इस सूक्ष्म वायरस से जनता की रक्षा करने में कितना लाचार है! जनता की सुरक्षा हथियारों के ज़ख़ीरे से नहीं होती. लेकिन भारत में किसी ने पूछा कि जब स्वास्थ्य के लिए सरकार जनता से उनके गहने और पैसे मांग रही है, तभी वह इस्राइल से सैकड़ों करोड़ रुपये के हथियार क्यों ख़रीदी रही थी?

इतना धन वह मध्य दिल्ली की नई सज्जा पर क्यों खर्च कर रही है? ये सवाल अगर भारत के मीडिया ने नहीं किए तो क्यों?

क्योंकि युद्ध में सरकार से सवाल जुर्म है. युद्ध में पक्ष और विपक्ष, मित्र और शत्रु खोजे और बनाए जाते हैं, जबकि हमारा मानवीय समाज के रूप में बचा रहना नए रिश्ते बनाने की हमारी ताकत पर टिका है. यह एकजुटता युद्ध की भाषा में नहीं विकसित की जा सकती. खुद को बंद करके और चाभी सरकार के हवाले करके नहीं की जा सकती, खुद को स्वतंत्र करके ही की जा सकती है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)