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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जो अपराधी नहीं होंगे मारे जाएंगे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जो अपराधी नहीं होंगे मारे जाएंगे

-सुभाष मिश्र

बस्तर के बीजापुर एडसमेटा गांव में मई 2013 में हुई कथित नक्सलाईट मुठभेंड़ में मारे गये 8 लोगों में जिनमें चार नाबालिग भी थे, वे निरअपराध और निहत्थे थे। उनका सबसे बड़ा अपराध था की वे अपराधी नहीं थे। जनकवि राजेश जोशी की सितम्बर 1988 में लिखी कविता बस्तर जैसी बहुत सी जगहों पर एकदम सटीक बैठती है।
जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे  
मारे जाएँगे।
कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे, जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे।
बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज़ हो
उनकी कमीज़ से ज़्यादा सफेद।
कमीज़ पर जिनके दाग़ नहीं होंगे, मारे जाएँगे।
धकेल दिए जाएंगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं  
जो गुन नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे।
धर्म की ध्वजा उठाए जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिऱ करार दिये जाएँगे।
सबसे बड़ा अपराध है इस समय  
निहत्थे और निरपराधी होना।
जो अपराधी नहीं होंगे  
 मारे जाएँगे।

जैसा कि अमूमन सरकारी तंत्र में होता है कि जब कोई मामला गंभीर हो जाता है और जनआक्रोश और आवाज को दबाना मुश्किल हो जाता है तो सरकार फौरी तौर से मामले को ठंडा कर लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए  मजिस्ट्रियल जांच, न्यायिक जांच, सीबीआई जांच आदि की घोषणा करती है। सामान्यत: न्यायिक आयोग 6 माह की अवधि के लिए बनाये जाते है किन्तु व्यवहारिक रूप से उनका कार्यकाल कई साल चलता है। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से जुड़ी घटना के आधा दर्जन घटनाओं के लिए गठित न्यायिक आयोगों ने दस-दस साल से अधिक का समय लिया। एडसमेटा की घटना की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायधीश व्ही.के.अग्रवाल की अध्यक्षता में गठित एकल आयोग ने हाल दी में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल के समक्ष रखी गई है। रिपोर्ट से जो बिन्दु निकलकर बाहर आये है उनके अनुसार मृतको में से कोई भी माओवादी नहीं था और ये सभी निहत्थे थे। इन्होंने पुलिस पर किसी प्रकार का हमला नहीं किया। जस्टिस अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हो सकता है डर के मारे सुरक्षाबलों ने फायरिंग शुरु कर दी हो। रिपोर्ट में घटना को तीन बार गलती से होना बताया गया।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में 17-18 मई 2013 की रात को हुई इस फर्जी एनकांउटर की घटना के बारे में कहा गया है कि बीज पांडम त्यौहार मनाने के लिए गांव के 25-30 लोग इकट्ठे हुए थे, उसी समय सुरक्षा बलों की ओर से आग की चपेट में आने की कथित घटना के बाद जवानों द्वारा कार्यवाही की गई। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि गलत धारण और डर की प्रतिक्रिया की वजह से यह घटना हुई। यदि सुरक्षाबलों के पास पर्याप्त उपकरण और खुफिया जानकारी होती तो इस घटना को टाला जा सकता था।

यहां सवाल यह भी है कि नक्सल क्षेत्र में विकास और सुरक्षा के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये की राशि से कौन से उपकरण खरीदे जाते हैं। खुफिया जानकारी देने के नाम पर खर्च होने वाला गोपनीय फंड का पैसा कहां जाता है। पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश के समय से ही बस्तर क्षेत्र और उससे लगे ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार जैसे राज्यों में नक्सल समस्या थी। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह मामला धीरे-धीरे बढऩे लगा। झीरम घाटी के रूप में इसको सबसे बड़ी परिणीति हुई जिसमें छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को अपने प्राण गवाने पड़े। माओवादियों द्वारा बिछाई गई बारुदी सुरंगों और धोखे से किये गये हमलो में अब तक न जाने कितने जवानों ने अपनी जान गंवाई।  इसकी दूसरी और पुलिस बल ने जवाबी कार्यवाही में बहुत से नक्सलियों को मारा, गिरफ्तार किया या सरेंडर करने के लिए मजबूर किया। इस बीच में दो पाटे के बीच में फंसे नागरिक जिनमें आदिवासियों की सर्वाधिक संख्या है वे भी मारे गये। इस दो तरफा हमलों में सर्वाधिक प्रताडि़त और जान गंवाने वाले उसी क्षेत्र के ग्रामीणजन है जो प्रभावित है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र के नागरिक के लिए एक तरफ कुंआ और एक तरफ खाई जैसी स्थिति हमेशा से रही है।

एडसमेटा घटना की जांच के लिए पहले एसओटी गठित की गई थी, उनके बाद मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट में डाली गई याचिका पर हुए फैसले के बाद सीबीआई इसकी जांच का रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बीजापुर के एडसमेटा प्रकरण की जांच छत्तीसगढ़ की बाहर की एंजेसी से कराने के आदेश दिये है। झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में शहीद हुए लोगों से जुड़ी घटना की जांच एनआईए तथा न्यायिक जांच जस्टिम प्रशांत मिश्रा कर रहे हैं। इसके पहले जून 2012 में सारकेगुड़ा हुई फर्जी मुठभेड़ का मामला हो या उसके बाद की घटनाओं की जांच का मामला हो सारी रिपोर्ट कभी भी समय पर नहीं मिल पाई।

छत्तीसगढ़ की नक्सली हिंसा या कहे सुरक्षाबल से जुड़े जिन मामलों में न्यायिक जांच की गई है उनमें ताड़मेटला कांड शामिल है। मार्च 2011 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में ताड़मेटला गांव में फोर्स ने 160 घरों में आग लगाई थी। 5 पांच बाद सीबीआई ने इस बात को खुलासा किया है। राज्य पुलिस ने दावा किया था कि आग नक्सलियों ने लगाई थी। जस्टिस मदन बी ठाकुर की बेंच को स्टेटस रिपोर्ट सौंपते हुए सीबीआई ने जानकारी दी कि ताड़मेटला में 160 घर पुलिस के ऑपरेशन के दौरान जले। इस मामले में दाखित चार्जशीट में सीबीआई ने सात विशेष पुलिस अधिकारियों का नाम लिया है और कहा है कि उसके पास 323 पुलिस कर्मियों और 95 सीआरपीएफ कर्मियों की संलिप्लता का सबूत है। यह आगजनी 11 से 16 मार्च के बीच हुई थी जब फोर्स गश्त पर थी।

चिंतलनार मुठभेंड़ की घटना 12 अगस्त 2011 को हुई, दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार क्षेत्र में हुई नक्सली व पुलिस मुठभेंड़ और आगजनी की घटना की न्यायिक जांच के लिए हाईकोर्ट के न्यायधीश टीपी शर्मा की अध्यक्षता में गठित विशेष जांच आयोग गठित किया गया था जिसने लंबे अंतराल बाद अपनी रिपोर्ट दी।

28 मई 2013 को झीरमघाटी में कांग्रेस नेताओं की परिवर्तन यात्रा बस्तर के झीरमघाटी से गुजर रही थी, तभी नक्सलियों ने काफिले पर हमला कर दिया। इस घटना में प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल उनके पुत्र दिनेश पटेल, बस्तर के दिग्गज नेता महेन्द्र कर्मा समेत करीब 29 लोगों की मौत हुई थी। वरिष्ठ नेता वीसी शुक्ला घायल हुए थे। इलाज के दौरान उनकी भी मौत हो गई। न्यायिक आयोग की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। वहीं, एनआईए ने जांच के बाद कोर्ट में चालान पेश कर दिया है।

बीजापुर के सरकेगुड़ा में हुई घटना की जांच के लिए सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन किया था। इस घटना में गोलीबारी में 17 लोगों की मौत हुई थी। आयोग ने करीब सात वर्ष बाद अक्टूबर 2019 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। पुलिस ने मुठभेंड़ के बाद नक्सलियों को मारने का दावा किया था, जबकि ग्रामीणों का आरोप था कि मारे गए सभी लोग सामान्य ग्रामीण थे।  भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या 09 अप्रैल 2019 को हुई।

नक्सली हिंसा या फर्जी एनकाउंटर के नाम पर सर्वाधिक शिकार गांव के मासूम जन या सशस्त्र बल, पुलिस के वे जवान होते हैं, जो ज्यादातर आर्थिक कारणों से सुरक्षा बलों में भर्ती होते हैं। अच्छे खाते-पीते लोग जो सिस्टम में कैसे रहना है और इसका लाभ कैसे उठाना है, जानते हैं, उन्हें इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कुछ पुलिस के अधिकारी अपने आऊट ऑफ टर्न प्रमोशन के चक्कर में भी कई बार मासूम लोगों को पकड़कर नक्सलवादी बताने में पीछे नहीं रहते। हर घटना के बाद होने वाली जांच की रिपोर्ट यदि समय पर नहीं आयेगी तो उसकी अनुशंसा की प्रासंगिकता समाप्त हो जायेगी।