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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-समय जिसने सब कुछ बदल दिया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-समय जिसने सब कुछ बदल दिया


नया साल 2021 का आगाज हो गया। बीता साल विश्वव्यापी कोरोना संक्रमण की महामारी के साथ बहुत से कारणों से याद किया जायेगा। नये साल में चहां कोविड-19 की वैक्सीन के इंजेक्शन लगना शुरू हुआ हैं, वहीं एक नये कोरोना वायरस स्ट्रेन की दस्तक भी बहुत धमाकेदार तरीके से हुई है। कोरोना को लेकर जितने मुंह, उतनी बातें। कोरोना काल में लॉकडाऊन के दौरान भारतीयों ने सर्वाधिक देखने जाने वाले गेम ऑफ थ्रोन्स जैसे सीरियल को पीछे छोड़कर रामायण और महाभारत सीरियल को एक बार फिर देखा। रामानंद सागर द्वारा 1987 में बनाई गई रामायण और रवि चोपड़ा द्वारा बनाई और राही मासूम रजा के संवाद से भरी 1988 में बने महाभारत सीरियल को 1.9 बिलियन लोगों ने देखा। महाभारत की अमर कथा को समय के माध्यम से बताते हुए उद्घोषक कहता है कि ये भारतीय संस्कृति के उतार चढ़ाव की कथा है, ये सत्य और असत्य के महायुद्ध की कथा है। ये कथा मेरे सिवाय कोई नहीं बता सकता। हर युग को अपने युग में इस कुरुक्षेत्र से जुझना पड़ता है, और जब तक में हूँ ये युद्ध चलता रहेगा और मेरा कोई अंत नहीं, क्योंकि में समय हूँ।

कोरोना काल में घर में बंद रहने के दौरान तो लोगों के पास धर्म, आध्यात्म और मनोरंजन के नाम पर जो कुछ उपलब्ध हुआ वह आप देख रहे हैं। सरकार ने भी महाभारत, रामायण के प्रसारण में विशेष रुचि दिखाई। जिनके पास थोड़ा पैसा था उन्होंने नेटफ्लिक्स, अमेजन, हॉट स्टार जैसे ऐप पर बहुत सारी वेब सीरिज, विदेशी मूल की भारतीय भाषाओं में उपलब्ध फिल्में देखी और लगातार देख रहे हैं। ओटीटी प्लेटफार्म ने हमारे देखने-सुनने की प्रवृति में काफी बदलाव लाया है। भारतीय संस्कृति में पले बढ़े लोगों ने घर की चार दीवारी के भीतर वाई-फाई इंटरनेट के जरिये ऐसा कुछ भी देखा है जो वे सिनेमा हाल में, सेंसर बोर्ड के रहते तो कभी नहीं देख सकते थे। स्कूल कालेज बंद होने और ऑनलाईन क्लास तथा वर्क फ्राम होम के चलते लोगों की पढऩे-लिखने, सुनने देखने की आदत भी बदल रही है।

यदि हम बीते साल 2020 का लेखा-जोखा देखें तो हमें सबसे ज्यादा आर्थिक चुनौती का साल दिखाई देता है। तालाबंदी की वजह से जहां लोग बेरोजगार हुए वहीं उत्पादन इकाईयां के साथ-साथ स्कूल-कालेज यहां तक की बहुत से दफ्तर तक बंद हुए। बहुतो के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराया। हिन्दी-चीनी, भाई-भाई का नारा जो पहले ही झूठा साबित हो चुका था, इस साल में चीन की हरकतों की वजह से वह दुश्मनी में तब्दील हुआ। हमारा स्थायी शत्रु पाकिस्तान के साथ-साथ अब पड़ोसी छोटे-छोटे राष्ट्र हमें आंखें दिखाने पर आमादा दिखाई दिए। नागरिकता कानून को लेकर शाहीनबाग आंदोलन और उसके बाद किसान आंदोलन जो अभी भी जारी है, के कारण देश में कोरोना संक्रमण के बावजूद उथल-पुथल का माहौल बना रहा। इसी बीच लोगों ने कोरोना के साथ जीना सीख कर बिहार विधानसभा का चुनाव निपटाया। आपदा को अवसर में बदलकर भाजपा ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को चलता किया। महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा जो कभी सहोदर बहने हुआ करती थी, सौतन की तरह लड़ती देखी गई।

इसी दौरान लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसला आने से अयोध्या में भव्य राम मंदिर का रास्ता बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिये भूमि पूजन किया और मंदिर की आधारशिला रखी। कोरोना वायरस से ज्यादा सोशल मीडिया पर सामाजिक वैमनस्मता फैलाने वाला वायरस वायरल हुआ। कोरोना के कहर के बीच तबलीगी जमात को कठघरे में खड़े करके मुस्लिमो पर बेइंतहा हमले हुए। सोशल मीडिया की वॉल भारत-पाकिस्तान की सीमा में बंटी दिखी।

हर मोर्चे पर अपने को सफल मानने वाली मोदी सरकार और उसके चाणक्य समझे जाने वाले अमित शाह जैसा नेता भी किसान आंदोलन को नहीं रोक पाए। केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन ने सर्द मौसम में दिल्ली की सियासी माहौल को गर्मा बढ़ा दिया है। सितंबर महीने में 3 नए कृषि विधेयक जिसे संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बनाया गया, वह किसानों को रास नहीं आ रहा। किसानों का आंदोलन इस सदी का सबसे बड़ा आंदोलन बनता जा रहा है, जिसे सरकार चाहकर भी रोक नहीं पा रही है।

बिहार के चुनाव और महाराष्ट्र खास करके मुंबई के राजनैतिक माहौल को गरमाने में सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने बड़ी भूमिका निभाई। बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत जून महीने में अपने फ्लैट में मृत पाए गए। सुशांत राजपूत की मौत ने बॉलीवुड में वंशवाद बनाम बाहरी की लड़ाई को हवा दी। राजनीति में सुचिता की बात करने वाली भाजपा ने सत्ता हासिल करने के लिए पूरे देश में कहीं कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को साधकर और कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे करवा कर ऐसा माहौल बना की कमलनाथ सरकार गिर गई। शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। कोरोना वायरस के संक्रमण से पहले देश में नागरिकता संशोधन विधेयक संसद की मंजूरी के बाद इसके विरोध में पूर्वोत्तर से उठी आवाज 2020 की शुरुआत तक देशभर में विरोध प्रदर्शन और दिल्ली के शाहीनबाग में लंबे समय तक प्रदर्शन चला, जिसमें अधिकांश महिलाएं धरने पर बैठीं थीं। शाहीनबाग में प्रदर्शन का चेहरा बनी 82 साल की बिलकिस बानो को टाइम मैग्जीन ने 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली लोगों की अपनी सूची में शामिल किया। सीएए के विरोध में भड़की हिंसा फरवरी महीने के आखिर तक दंगों में तब्दील हो गई। दिल्ली दंगों में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। अर्थव्यवस्था के लिहाज से साल 2020 काफी खराब रहा। अमेरिका-चीन के बीच व्यापार, युद्ध और अन्य वैश्विक एवं घरेलू कारकों के चलते सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था पर कोरोना महामारी की गहरी मार पड़ी।  कोरोना संक्रमण के दौरान छत्तीसगढ़ ने मनरेगा और अन्य योजनाओं के जरिये किसानों, खेतीहर मजदूरों श्रमिकों को अन्न-धन के जरिये राहत पहुंचाकर देश में नाम कमाया। गोबर खरीदी के जरिये देश में नई मिसाल प्रस्तुत की। राजीव न्याय योजना के जरिये किसानों से 25 सौ रुपये क्विंटल धान खरीदकर बोनस देने वाली भूपेश बघेल की सरकार नये साल के आते-आते धान खरीदी में आर्थिक तंगी को लेकर मुसीबत में फंसी दिखाई देती है। केन्द्र से सहयोग के नाम पर पूरी सरकार दिल्ली कूच करने की तैयारी में है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर काफी तनातनी बनी हुई है। कांग्रेस पार्टी साल भर से अपना स्थायी अध्यक्ष नहीं ढूंढ पाई है। ट्रम्प और मोदी जी की दोस्ती अमेरिका में कोई खास गुल नहीं खिला पाई। ई गव्र्हमेंट और ई बैंकिंग की लाख कवायद के बावजूद अभी भी 60 प्रतिशत से अधिक लोग पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। पुराने और नये साल में ग्लोबलाईजेशन बढ़ा है, पूंजी का महत्व बढ़ा है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुनाफे बढ़े हैं। सरकारी कंपनियों की हालत पस्त है। निजीकरण के बहाने बहुत सारे क्षेत्रों में ग्लोबल पूंजी निवेश का प्रवेश हुआ है। मीडिया व्यापक सामाजिक सरोकारों की बजाय एजेंडा बेस खबरों के लिए जाना जाकर, गोदी मीडिया में तब्दील हो रहा है।

कथाकार, चित्रकार प्रभु जोशी कहते हैं कि-
ये एक हतभाग्य समय है, जिसमें जनतंत्र में आलोचना को एक किस्म के लम्पटई के लालित्य ने लकवाग्रस्त कर दिया है। सत्ता की राजनीति के समर्थक अपने, भाषा के मौलिक कमीनेपन पर आत्ममुग्ध है। वे किराए के इन्फो-वॉरियर्स है। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे में कुत्सित का कब्जा हो चुका है।