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सुभाष मिश्र की कलम से - परहित सरिस धर्म नहीं भाई

सुभाष मिश्र की कलम से - परहित सरिस धर्म नहीं भाई

-सुभाष मिश्र

मनुष्य जिस ईश्वर या खुदा के लिए लड़ रहा है उसका एक ही धर्म है करूणा और प्रेम और ये दोनों ही तत्व धर्म और धर्मांतरण की चिंता करने वालों के भीतर से गायब है।

तुलसीदास जी का कथन है-
परहित सरिस धर्म नहीं भाई

लेकिन अब धर्म पर हित नहीं बल्कि पार्टी हित और पीड़ा पर केंद्रित हो गया है। सनातनियों के आदि पुरुष मनु ने कहा था धर्म के दस लक्षण हंै- धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना। भाजपा के एजेंडे में जो धर्म है उसमें से धैर्य, क्षमा, संयम, सत्य और क्रोध न करना। धर्म के ये सभी पंच तत्व, पंचतत्वों में विलीन हो चुके हैं।

धर्म और धर्मांतरण की, धार्मिक शुचिता की जिन्हें सबसे ज्यादा फिक्र है। उनमें से अधिकांश के सार्वजनिक जीवन आचरण से धर्म के तत्व गायब हैं।
राजनीतिक पराजय की खिसियाहट बहुत सारी राजनीतिक पार्टियों का धर्म बन चुकी है। इनका धर्म बन चुका है उन मुद्दों को हवा देना जिनसे आपका ध्यान अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों से हट जाये। ऐसी पार्टियों का बस चले तो वो देश की हर इमारत, हर सड़क, खेल के हर मैदान को, किसी एक खास रंग में रंग दे। नदियों की धारा को अपने रंग से रंग दे और जो उसकी बात न माने उसे अगवा करके पिटवा दें।

ऐसी धर्म-जाति आधारित पार्टियों भारत के सांस्कृतिक धार्मिक वैविध्य को समाप्त कर अपने रंग में रंग देना चाहती है। वो देश की सांस्कृतिक मिठास में कड़वाहट घोलने पर तुली है। ऐसी सोच वालों के लिए धर्मपरायण लोगों का परायण केवल धर्म के बाहरी आवरण पर है। उनके चिंतन में धर्म का स्थूल भाव है जो बाहरी आडम्बरों पर आश्रित है। जैसे तिलक लगा देने, रामनामी ओढ़ लेने, हाथ में कमंडल लेकर खड़ाउ पहनकर कोई धार्मिक नहीं हो सकता जब तक उनका हृदयांतरण न हो।

धर्म पूरी तरह निज आस्था का विषय है जबकि धर्म, संप्रदाय की कट्टरता को केंद्र में रखने वालों का वास्ता इसे व्यक्ति के बजाय समूह या समाज का मुद्दा बनाने में दिलचस्पी है।

राज्य से तिरोहित किन्तु केंद्र में पोषित होने वाली ऐसी पार्टी और उनके साथ खड़े बाकी राजनैतिक दल और संगठनों को आम आदमी की मुश्किलों को दूर करने का धर्म कभी याद नहीं आता। उसके निर्णय प्रजा हित में अधार्मिक है। धर्म का अर्थ केवल अगरबत्ती या दीया जलाकर घंटी बजाना भर नहीं है। जिस दिन देश की जनता इनके छिपे हुए एजेंडे को समझ जायेगी, उसी दिन इनकी अलगाववादी, प्रजा विरोधी नीतियों के चलते भारतीय जनता कभी भी उसकी घंटी बजा सकती है। सच तो ये है कि ऐसी सोच रखने वाले दलों को आत्म निरीक्षण कर विवेक का दीया जलाने की जरूरत है। कट्टरपंथी तालिबानी सोच रखने वाली राजनैतिक दलों की त्रुटियों का फायदा उन धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को अवश्य मिलेगा और उसकी कुंडली जागृत हो गई तो उनके भाग्य का सहस्र कमल खिलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। धर्म और जाति आधारित राजनीति करने वाले दलों को धर्मांतरण से ज्यादा फिक्र शुरू करनी चाहिए जनआस्था के स्थानांतरण की। जनता का मोहभंग उनके लिए बहुत अनिष्टकारी होगा। वो देश की संस्कृति के कमल की पंखुडिय़ां नोचने की बजाय उसे राजनीति की कीचड़ में यूं ही खिलने दें। फिलहाल इससे बड़ा धर्म नहीं लेकिन धर्मांतरण को जिस तरह बलात राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। ज़ाहिर है, धर्म के मामले में राजनीति की अवांछित घुसपैठ चलते धर्म विधानमंडलों में भी प्रवेश कर गया है। एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के अंतर्गत बनी संसद में धार्मिक नारे लगते हैं और सभापति को ऐसे नारे न लगने देने की सख्ती बरतने पर विवश होना पड़ता है। व्यापक समाज में भी, धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग आक्रामकता के साथ होता दिखाई देता है। संविधान में धर्मनिरपेक्षता को शामिल किये जाने पर ऐतराज जताया जा रहा है।

धर्म के नाम पर उसके एक ख़ास तरह के राजनीतिक संस्करण को वैध ठहराया जा चुका है। ऐसी स्थिति में धर्मांतरण को धार्मिक की बजाय राजनीतिक मुद्दे की तरह पेश करना आसान हो जाता है। छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के नाम पर इधर जारी विवाद को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

धर्म व्यक्ति के लिये है, व्यक्ति धर्म के लिए नहीं-डॉ. आंबेडकर ने जब यह कहा था तो उनका उद्देश्य धर्म को व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर मानकर धार्मिक स्वतंत्रता को उच्च संवैधानिक मूल्य के रूप में स्थापित करना भी था। मानव-इतिहास व्यक्ति की सामुदायिक पहचान को धर्म से जोडऩे के भयंकर दुष्परिणामों का गवाह स्वयं रहा है। विशेष रूप से सेमेटिक धर्मों यानी यहूदी-ईसाई-इस्लाम धर्मों के बीच वर्चस्व की जंग में जेहाद या क्रूसेड या धर्मयुद्ध का खूनी इतिहास रचा गया। पूर्वी धर्मों अर्थात हिन्दू-बौद्ध-जैन या ज़ेन या ताओ परम्परा में धर्म प्राय: व्यक्तिगत आस्था का मामला रहा है इसलिए उनमें खुलापन या सहिष्णुता की गुंजाइश भी रही है।
लेकिन इधर राजनीतिक लाभ के लिये धर्म के इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढऩे लगी है। इसके साथ ही उसे सामुदायिक पहचान से जोड़कर देखने और एक धार्मिक समूह को दूसरे से न सिर्फ भिन्न बल्कि विपरीत बताकर वैमनस्य के बीज बोए जा रहे हैं। फलस्वरूप वातावरण विषैला होता जा रहा है।

हमारा संविधान व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। यह मौलिक अधिकारों में से एक है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां धर्म बदलना कानूनी है और कोई भी किसी भी प्रतिबंध के बिना अपने धर्म का प्रचार और प्रसार कर सकता है।

धार्मिकता का यह सुनियोजित उभार भी है जो धर्म के प्रति निष्ठा और उसमें निहित मानवीय और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति सम्मान का प्रमाण नहीं, बल्कि धार्मिक रूप से उदार लोकतांत्रिक समाज में सेमेटिक धर्मों की तरह की जेहादी मनोवृत्ति के फैलने का सूचक है।