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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इतिहास से सीखना है या उसे जीना है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इतिहास से सीखना है या उसे जीना है

- सुभाष मिश्र

इतिहास से सीखना है या उसे जीना, आखिर क्यों हो रहा है अतीत का पोस्टमार्टम। अदम गोंडवी की एक कविता से जिसने अपनी कलम से समाज को बांटने की कोशिश करने वालों का पर्दाफाश किया है।

गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे, क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे,
जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई, मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे
जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में, क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे
तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो क्या, द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे?

 
जाहिर है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ की बात इतिहास को मानने से इनका या उसे देखने के लिए अलग-अलग चश्मों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, ये कोशिश पहले भी होती रही है। अब समझना होगा कि इतिहास के साथ इस तरह छेड़छाड़ या उस पर अपना नया राग और ढपली बजाने से किसे फायदा होता है? दरअसल, 2022 में देश के कई राज्यों में चुनाव होना है इस बात को आज के पॉलिटिकल मैनेजर बेहतर जानते हैं कि भारतीय जनमानस अतीत में जीना बेहद पसंद करती है, भले लोगों के सामने वर्तमान में हजार परेशानी मुंह बाएं खड़ी हों लेकिन उन्हें इतिहास में घटित गौरवमयी बातों में बेहद रुचि होती है, इसलिए जब-जब लोगों का ध्यान किसी बड़े मुद्दे से हटाना हो या फिर किसी समाज इतिहास में नया नायक बना देना या फिर किसी प्रचलित जगह का नाम ही बदल देने जैसा स्टंट किया जाता है और अपने इस किए को इस तरह सही ठहराया जाता है कि फलां व्यक्तिइतिहास में ऐसा था इसलिए इसका नाम बदलकर हम उससे ज्यादा महान व्यक्ति खोजकर लाए हैं, अब इनके नाम पर हम इस जगह का नाम रख देते हैं। बस इतना करके हमारे नेता निश्चिंत हो जाते हैं, फिर वे देशभर में इस पर हो रही बहस, टीवी चैनलों पर चल रहा सिरफुटौव्वल का मजा लूटते हैं।

कंगना रनौत और उन जैसे बहुत से लोग देश के नये इतिहासकार हैं। ये बतायेंगे कि आजादी लड़ाई से नहीं भीख से मिली। ये बताएंगे कि देश की आजादी में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों का कोई योगदान भी था। ये बताएं कि देश में सभी लोग एक जैसे राष्ट्रभक्त थे, जो भिन्न सोच और धर्मावलंबी रहे हैं या हैं वे सब राष्ट्रद्रोही हैं। कहा जाता है कि आदमी अपने इतिहास से सबक लेता है, सीखता है। अब ये देश को नये तरह के इतिहास में जीना सीखा रहे हैं। हमारे देश में इस समय सोची समझी स्क्रिप्ट पर काम हो रहा है, कंगना रनौत जैसे लोग इससे एक्ट कर रहे हैं। दरअसल सत्ता के सुर में सुर मिलाने के बहुत से फायदे हैं यह बात पद्मश्री कंगना रनौत जैसे बहुत से लोग जानते हैं। दरअसल ऐसी बहुत सारी बातें करके बहुत से लोग बार-बार इतिहास, संस्कृति, धर्म, परंपरा आदि की बातें करके लोगों का ध्यान इतिहास की ओर मोड़कर उसका लाभ वर्तमान में कमाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को देश का वह इतिहास चाहिए जो वर्तमान में लोगों को आपस में बांटे। एक दूसरे के बीच वैमनस्यता पैदा करें। आजमगढ़ को अब आर्यमगढ़ कहा जाएगा, ऐसे ही धीरे-धीरे इतिहास के नाम पर बहुत से नाम बदले जाएंगे।

जनसंचार अब सूचना के प्रसार की प्रभावी पद्धति है। सूचना की अकल्पनीय गति और अबाध विस्तार की संभावना के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के आगमन से जनसंचार का जब एक नये दौर में प्रवेश हुआ तो उससे निकलने वाले सूचना के प्रवाह में सच और झूठ, तार्किकता और मूढ़ता, ज्ञान और अज्ञान सब एक-दूसरे में एकमेक हो गये। नतीजा यह हुआ कि अपने निहित स्वार्थ के अनुसार वास्तविकता को गढ़ कर पेश करने का कौशल इधर विकसित हुआ है जिसमें दक्षिणपंथी और कट्टर साम्प्रदायिक राजनीति ने महारत  हासिल की है। इसके छोटे-बड़े नेता और समर्थक सच के शिकार करने के लिये झूठ का एक आकर्षक मायाजाल रचते हैं जिसमें फंसकर सच मानो तड़पने लगता है। दक्षिणपंथी राजनीति के समर्थक मीडिया संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों, अकादमियों और अन्य जगहों में हैं। वे किसी भी तात्कालिक मुद्दे पर ऐसी प्रतिक्रिया गढ़ते हैं जिसमें अतीत और वर्तमान की विकृत छबियां वास्तविक जान पड़ती हैं। इस प्रक्रिया में परम्परा और इतिहास को मनगढ़ंत ढंग से पेश कर उसे राजनीतिक लक्ष्यों के लिये आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्हें आत्मविश्वास के साथ कुछ इस अंदाज़ में पेश किया जाता है कि वह जनमत के तौर पर स्थापित हो जाता है। एक ऐसी आम सहमति इधर बनती दिखाई देती है, जिसमें स्वाधीनता संग्राम के वास्तविक नायकों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ाकर उनकी झूठी छबि निर्मित की जा रही है ताकि स्वाधीनता के मूल्यों को विकृत कर पेश किया जा सके। इस दौर में देश का पूरा आकाश झूठ की दुर्गंध से भरा हुआ है। झूठ और दुव्र्याख्या की ऐसी केंद्रीयता को प्रतिष्ठित करने में कुछ फिल्मी हस्तियों का भी योगदान है। इनमें अनुपम खेर और कंगना रनौत प्रमुख हैं। हाल ही में गांधीजी को लेकर जिस आत्मविश्वास के साथ कंगना ने बयान दिया है, उसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। राजनीति और अभिनय जगत की हस्तियों को अकादमिक विशेषज्ञों की तरह बर्ताव करते देख आप सिर पीट सकते हैं, लेकिन उनका बिगड़ता कुछ नहीं। दरअसल, पिछले दिनों इतिहास पर अपना नया प्रकाश डालते हुए यूपी के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इतिहासकारों ने चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक को सिकंदर के मुकाबले कमतर आंका है। चंद्रगुप्त मौर्य से हारने वाले यूनानी सम्राट सिकंदर को महान बता दिया गया। अब उनके इतिहास के इस ज्ञान का मकसद किस खास वर्ग को साधने के लिए था। साथ ही बड़ी तादाद में लोगों को मुद्दे से भटकाकर नई बहस में उलझाना का था। उत्तरप्रदेश की तरह मध्यप्रदेश में भी इतिहास पर एक नया विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति रख दिया गया। इस दौरान जोर-शोर से प्रचारित किया कि रानी कमलापति अंतिम गोंड रानी है। इस रेलवे स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं के साथ विकसित किया गया है। हबीबगंज भोपाल के नवाब के नाम पर था। इसे 1979 में इस स्टेशन को डेवलप करने के दौरान रखा गया था, इससे पहले इस जगह का नाम शाहपुर था। कई लोगों ने सवाल उठाया तो इतिहास को पन्नों को पलटा गया रानी के बलिदान की कहानी और उसकी इतिहासकारों द्वारा उपेक्षा का मामला उठाया गया। इस तरह आज की महंगाई, बेरोजगारी, अपराध भ्रष्टाचार को मात देने के लिए रानी कमलापति का पुनर्जन्म कराया गया। इसी तरह आजकल देश में एक नए इतिहासकार ने अवतार लिया है। इनके ज्ञान के सोर्स के सामने गूगल बाबा भी पानी भरते नजर आ रहे हैं जी हां, हम बात कर रहे हैं विवादों की क्वीन कंगना रनावत की जिन्होंने देश की आजादी को लेकर ऐसा बयान दिया जिस पर कई दिनों तक मीडिया अपना माथापच्ची करता रहा। देशभर में कंगना के पुतले फूंके गए, थानों में शिकायत दर्ज कराई गई, इन सबके बाद भी कंगना ने भी झुकने का नाम नहीं लिया। उसने कहा कि अगर कोई बता दे कि 1947 में अंग्रेजों को खदेडऩे कौन सा आंदोलन हुआ था तो वो उन्हें मिला सम्मान लौटा देंगे। हाल ही में उन्होंने महात्मा गांधी पर भी टिप्पणी की है इस नई इतिहासकार की चुनौती पर अभी बहस का दौर जारी है। इसके बीच देश की कई बड़ी समस्याएं पीछे छूट गई हैं। इस तरह के विवादों को आगे बढ़ाने में हमारे देश में सोशल मीडिया का बड़ा शानदार योगदान रहता है। जैसे ही कोई छोटी सी बात हुई उसे जंगल में आग की तरह फैलाने और उस पर जमकर बहस करने इतिहास को अपनी तरह से पोस्टमार्टम करने का दौर निकल पड़ा है। आजकल युवाओं की प्रिय कवि माने जाने वाली अनामिका अंबर की ये लाइनें भी हमें इतिहास की पुर्नव्याख्या करती नजर आती हैं-
जो इतिहास बताता है तुम समझा दो वो सार हमें, देश खड़ा है किन तथ्यों पर बतला दो आधार हमें,
जब गाँधी के साथ गोडसे है तुमको स्वीकार नही महाराणा के साथ भला क्यों अकबर हो स्वीकार हमें।


देखा जाए तो एक खास वर्ग द्वारा ही इतिहास पर बार बार सवाल उठाने का क्रम हम देखते हैं। हमारे युवावर्ग को इतिहास के नाम पर बहुत तरह से भटकाया जा रहा है। वो जो प्रायोजित सामग्री देखते हैं उसे ही इतिहास का सच मानने लगते हैं। दरअसल, इतिहास के पन्नों में युद्ध भी है, बुद्ध भी है, राग भी है, द्वेष भी है। यह आपके व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है कि आप अपने इतिहास से क्या सीखते हैं? इंसान गलतियों का पुतला होता है इसलिए इतिहास में हुई गलतियों से सीख लेना चाहिए। हर देश को एक सुंदर और सुरक्षित भविष्य के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। जरूरी नहीं है कि इतिहास युद्ध करके ही लिखा जाये।