breaking news New

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपनी छाँवों को पकड़े नेता

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपनी छाँवों को पकड़े नेता


दुबले जन के तगड़े नेता

पिछड़े जन के अगड़े नेता


सुबह आस्तिक

उगते सूरज को करते नमस्कार

शाम नास्तिक

करते ढलते सूरज का तिरस्कार

संस्कार से हैं पाखण्डी

स्वार्थ साधने में ब्रहमाण्डी

अपने दुर्वचनों को कहते

अभिव्यक्ति की आज़ादी

उनसे कोई प्रश्न पूछ ले

बन जाते फरियादी--

हम दुबले हैं, हम पिछड़े हैं

करते यही मुनादी


वे अपने को पिछड़ा कह कर

अगड़े होते रहते

दुबले जन के बीच खूब

वे तगड़े होते रहते


दुबले जब से पिछड़े हैं

तब से उनके नेता अगड़े हैं

दुबले तो दुबले बने रहे

पर उनके नेता तगड़े हैं


सब तगड़ों के 

तगड़ों से ही झगड़े हैं

तगड़े ही तगड़ों से कितने अकड़े हैं

तगड़े ही तगड़ों की बाँहें पकड़े हैं

दुबले सदियों से पिछड़े थे

दुबले अब भी पिछड़े हैं


उनके गाँवों से दूर

अपने पाँवों में जकड़े नेता

पिछड़े जन से दूर

अपनी छाँवों को पकड़े नेता

दुबले जन के तगड़े नेता

पिछड़े जन के अगड़े नेता