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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संस्कृति के क्षेत्र में पनपती अपसंस्कृति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संस्कृति के क्षेत्र में पनपती अपसंस्कृति

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और लोक संगीत को अपने नाटकों के जरिए देश-दुनिया में पहुंचाने वाले हबीब तनवीर की विरासत को आगे बढ़ाने का काम सरकारी स्तर पर तो नहीं हो पाया किन्तु जब बहुत से उत्साही रंगकर्मी लंबे लॉकडाउन के बाद अपने इस पुरखे को याद करने के लिए उनके 99वें जन्मदिन एक सितम्बर पर नाट्य समारोह करने छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग गये तो उन्हे बाप-दादा याद दिलाए गए। बेलगाम नौकरशाही और अपसंस्कृति की पोषक ताकतों को भला हबीब तनवीर और उनकी विरासत से क्या लेना-देना। वैसे भी सरकारों को हबीब तनवीर वाली जनसंस्कृति से डर लगता है। सरकार किसी की भी हो कम ही ऐसे नेता, अफसर होते हैं जो जनसरोकार से जुड़ी बातों को ईमानदारी से आगे बढ़ाते हैं। जो भी विधा, कला, साहित्यिक जनचेतना का वाहक होता है उसे सत्ता जानबूझकर नजरअंदाज करती है। यही वजह है कि गंभीर लेखक कवि संस्कृतिकर्मी हाशिए पर रहता है और विदूषक चाटुकार पुरस्कारों और इनाम-इकराम से नवाजे जाते हैं। सत्ता हमेशा से चारण भाट और नये संदर्भ में गोदी मीडिया या कहें भक्त मंडली को अपने ईर्द-गिर्द देखना चाहती है। संस्कृति विभाग में पनपती अपसंस्कृति और वहां की कार्यप्रणाली की यह घटना एक झलक मात्र है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से जिस तरह से संस्कृति विभाग की कार्यप्रणाली रही है उसको लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं। कोरोना काल में घर बैठे लोककलाकारों, रंगकर्मियों के लिए कोई आनलाईन कार्यक्रम नहीं सुझा। हजारों लोक कलाकार खाली बैठे रहे। उनकी स्थिति मजदूर से भी खराब थी। छोटे-मोटे आयोजन की बजाय इन्वेंट कल्चर में विश्वास करने वाला संस्कृति विभाग और उसके सिपहसालार, पता नहीं छत्तीसगढ़ में किस तरह की संस्कृति को पुष्पित पल्लवित करना चाहते हैं।

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार भारत भवन की तर्ज पर एक संस्कृति भवन बनाना चाहती है, इसके लिए उन्होंने संस्कृति परिषद के गठन की घोषणा भी की है। किसी भी देश और समाज की संवेदनशीलता और मनुष्यता की पहचान वहां की संस्कृति पर निर्भर करती है। किसी भी देश और समाज की संस्कृति उस देश की आत्मा की पहचान होती है। सांस्कृतिक संपन्नता देश का गौरव होती है। जिस समाज या राज्य की संस्कृति जितनी संपन्न होगी उस राज्य की पहचान विशिष्ट रहती है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के लिए असली चुनौती अब शुरू होगी, क्योंकि महज इमारतें बना देने से संस्कृति का संरक्षण नहीं होता, उसके लिए योग्य व्यक्ति और संस्था में कारगर नीतियों का गठन होना होगा। संस्कृति विभाग की ही तरह इन परिषदों की स्वायत्तता की रक्षा बहुत आवश्यक है अन्यथा ये नौकरशाही की चपेट में आकर अपना ध्येय और अर्थवत्ता खो देंगी। परिषदों के सदस्य के रूप में मीडियाकारों को नहीं बल्कि श्रेष्ठ सर्जकों को स्थान दिया जाना चाहिये।

कोरोना काल से उपजी स्थितियों के बाद कुछ ज्यादा है। ये सामूहिकता के विराम का समय है। ये सामाजिक और भौतिक दूरी का समय है। ये तालाबंदी के बाद उपजी निराशा का समय है। ये किसी भी सामूहिक कला के प्रदर्शन को ना करने का समय है। ये वर्चुअल समय है, जिसमें बहुत से लोग आपको क्वारेंटीन जैसी स्थिति में देखना चाहते हैं। यह रंगमंच से सामूहिकता के नदारद होने का समय है। यह सामाजिक प्राणी माने जाने वाले मनुष्य के अकेले—थकेले पड़ जाने का समय है। कोरोना के कारण पिछले साल मार्च महीने से सारी प्रदर्शनकारी कलाओं की प्रस्तुति बंद थी जो अब धीरे-धीरे खुल रही है। कोरोना काल में कोई समारोह का आयोजन नहीं हो रहा है जिससे कलाकारों को काम मिला हो। यही हालत लोक कलाकारों, प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े लोगों की है। हमारे कलाकार भी शामिल हैं, जिनके पास फिलहाल करने को कुछ नहीं है। ऐसे समय में सामूहिकता को प्रदर्शित करने वाली रंगमंच से जुड़ी थोड़ी बात भी जरूरी है। नाटक एक सामूहिकता जीवंत कला है। जीवंतता नाटक की मूल आत्मा है। नाटक अपनी हर प्रस्तुति से पहले से अलग होता है। नाटक में नाटक के कलाकार, अभिनेता, दर्शक और तकनीक की त्रयी होती है। नाटक जीवन से अलग किसी तीसरी दुनिया की चीज नहीं है।

नाट्य गतिविधियों के नियमित संचालन के लिए कुछ नाटक समूह अपने कलाकारों के साथ मिलकर अपने-अपने स्तर पर काम करते हैं। रंगमंच बहुत से लोगों के जुनून के कारण तमाम विपरीत परिस्थिति में भी जिंदा है। नाटक के लिए जब भी कलाकार आपस में जुटते हैं तो वे अपने समय की, आसपास के दुख-दर्द की, संघर्ष की और अपने लोग अपने जुनूनी साथियों के सहयोग से नाट्य गतिविधियों का संचालन करते हैं। कोरोना काल में संस्कृति विभाग बमुश्किल 150 कलाकारों को दो हजार रूपये मासिक पेंशन दे पा रहा है।  संस्कृति विभाग के अफसर और उस जैसी मानसिकता के लोग रंगकर्मी योग मिश्र के साथ हुए दुव्र्यवहार से शांत नहीं हुए। उन्होंने अपने सीजी फिल्म वाट्सएप ग्रुप से योग मिश्र को बाहर कर दिया। यह ग्रुप छत्तीसगढ़ी फिल्म के लोगों को ग्रुप से जोड़कर छत्तीसगढ़ की सिनेमा नीति पर राय के लिए बनाया गया था। इस हरकत से क्षुब्ध होकर बहुत से फिल्मकारों ने ग्रुप से खुद को एक्जिट कर लिया।

संस्कृति विभाग के दुव्र्यवहार से दुखी कलाकारों ने बैठक में अपने दम पर समारोह करने का निर्णय लिया। आगामी 1 सितम्बर को हबीब तनवीर की 99वीं जन्म जयंती है। इस अवसर पर लॉकडाऊन में तैयार नवोदित कलाकारों के 5 नाटकों का प्रदर्शन संस्कृति विभाग के सहयोग से करना चाहते थे। संस्कृति विभाग के एक जिम्मेदार अफसर पत्र देखे बिना कह दिया है आप मेरे कंधे पर बंदूक रखकर चलाने आए हैं?... संस्कृति विभाग ने तुम्हें कार्यक्रम करने कहा था क्या?... तुम्हारे बाप का नहीं है। संस्कृति विभाग की जो कुछ भी करना चाहोगे हम सहयोग कर देंगे? इस घटना से छत्तीसगढ़ के संस्कृति कर्मी बेहद क्षुब्ध हैं। उनका कहना है कि नाटक करना तो हमारा काम ही है जो बिना शासन के सहयोग के भी हम रंगकर्मी हमेशा से करते आ रहे हैं पर पाँच दिन का कार्यक्रम थोड़ा हमारे बजट से बाहर हो जाता है। इसलिए हमने सरकारी सहयोग लेने की सोची थी और यह भी तय किया था कि कोरोना के कारण या किसी और कारण से यदि संस्कृति विभाग हमें सहयोग नहीं करता तो जहाँ हम रिहर्सल करते हैं वहीं औपचारिक रूप से हम यह कार्यक्रम कर लेंगे।

हबीब साहब और उन जैसे बहुत से रंगकर्मी, साहित्यकार और संस्कृति कर्मियों को याद करने उनका उत्सव मनाने किसी संस्कृति विभाग के अफसर की कृपा नहीं चाहिए। किन्तु इन अफसरों को भी ये मालूम होना चाहिए कि ये विभाग इनके बाप की भी बपौती नहीं है। सरकार जनता की है और जनता के पैसों से ही संचालित होती है। छत्तीसगढ़ के प्रत्येक नागरिक सरकार में बराबरी का शेयर होल्डर है। हबीब साहब के नाटक आगरा बाजार में नजीर अकबराबादी का एक गीत है-
आदमी नामा  
दुनिया में बादशाह है सो है वो भी आदमी  
और मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी  
जऱदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमी  
नेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी  
टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी  
यां आदमी पे जान को वारे है आदमी  
और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी  
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी  
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी  
और सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमी