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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -काहे का ढाई, काहे का अढ़ाई

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -काहे का ढाई, काहे का अढ़ाई

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के ढाई साल आज पूरे हुए। ढाई-ढाई साल की सत्ता को लेकर कुछ लोगों ने सरकार को अस्थिर कर भूपेश बघेल के नेतृत्व को चुनौती देने की लुकी-छिपी कोशिशें की। चूंकि छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब और केरल जैसी स्थिति नहीं है, इसलिए यह तो संभव नहीं होता कि कांग्रेस से विधायक बागी तेवर के साथ अलग होकर, इस्तीफा देकर सरकार को गिरा पाये। मंत्रिमंडल में 15 प्रतिशत की सीलिंग के चलते बहुत से लोगों को चाहकर भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जा सका। लिहाजा उन्हें सरकार और संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारी देकर संतुष्ट किया गया है। छत्तीसगढ़ में बहुत से लोग निगम-मंडल में एडजेस्ट किए गये हैं, अभी-भी बहुत से लोग आस लगाए बैठे हैं। किसी भी बारात में दो-चार नाराज फूफा तो रहते ही हैं, फिर तो ये फूफाओं से भरी कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र, पद, प्रतिष्ठा, पॉवर नहीं मिलने से पनपता असंतोष, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तथा केंद्रीय नेतृत्व की टालमटोल नीति के चलते आज कांग्रेस बहुत से राज्यों में डांवाडोल स्थिति में है। गनीमत है छत्तीसगढ़ आज भी कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। इस मजबूत गढ़ को भी ढाई का पहाड़ा पढ़ाकर कमजोर करने की पुरजोर कोशिशें जारी है किन्तु भूपेश बघेल के मजबूत नेतृत्व के कारण यहां वैसा कुछ नहीं होता दिख रहा है जैसा हाल कांग्रेस शासित बाकी राज्यों का है। सत्ता के शतरंज के खिलाड़ी संभवत: ढाई की चाल को समझ नहीं पाये। देख सुने सच से, भोगा हुआ सच अलग होता है।

कांग्रेस मुक्त भारत का सपना संजोने वाली भाजपा का वर्तमान चाल, चरित्र और चेहरा जिस तरह का है उसके अनुसार यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत नहीं मिला होता और कांग्रेस 68 सीटों की बजाय 50 सीटों पर अटक जाती तो अभी तक दिल्ली में बैठे चाणक्य और उनके खऱीद-फऱोख्त में माहिर गुर्गे मध्यप्रदेश, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मणिपुर की तरह ही यहां भी खेला कर देते। पश्चिम बंगाल में खुद के साथ खेला हो जाने के बाद अपने उत्तम प्रदेश यानी यूपी को संभालने में नाको चने चबाने रही भाजपा, उसका गोदी मीडिया और कुछ फूल छाप कांग्रेसी भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार को ढाई साल की सरकार बताकर अस्थिर करने की फिराक में है। जिस टीएस सिंहदेव के कंधे पर बंदूक़ रखकर यह गोली दागी जा रही थी, वही बयान दे रहे हैं कि ऐसा कोई फ़ार्मूला नहीं है। भूपेश बघेेल ही नेता हैं। छत्तीसगढ़ के प्रभारी पीएल पुनिया और टीएस सिंहदेव ने कुछ न्यूज चैनल में चल रही इन ख़बरों को फर्जी करार दिया है जिसमें यह कहा जा रहा था कि छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल के सीएम की व्यवस्था है। 17 जून यानी आज सरकार के ढाई साल होने पर मुख्यमंत्री बदल जायेगा। फेक न्यूज़ क्रियेट करने वालों ने एक फ़ेक आईडी के ज़रिये ये अफ़वाह फैलाई। टीएस सिंहदेव को खंडन जारी कर कहना पड़ा कि मैं दिल्ली में नहीं यहीं हूँ, जो खबरें वायरल हो रही है वह बताती हैं कि सोशल मीडिया किस स्तर तक चला गया है। इस झूठी खबर को फैलाने वाले अज्ञात लोगों के खिलाफ रायपुर के पंडरी थाने में एफआईआर भी लिखाई गई है। ढाई साल का प्लान यदि काम नहीं करता था तो दुष्प्रचार में लगे लोगों ने एक अफ़वाह और भी हवाओं में फैला रखी है वह है सीडी कांड। बहुत सारी अनैतिकता में लिप्त लोग इस समय नैतिकता की बहुत बात कर रहे हैं।

दरअसल चुनावी पराजय या बहुमत के लिए ज़रूरी जादुई आंकड़े से पीछे रहने के बावजूद भाजपा ने बहुमत प्रबंधन के लिए जोड़तोड़ की जो राजनीतिक शैली विकसित की है, उससे एकाधिक बार तात्कालिक सफलता भले ही मिल गयी हो, लोकतंत्र की सेहत के लिहाज से यह घातक है। अब तक उसे चुनाव और सरकार बनाने में मिलती रही सफलता से उसकी जो अजेय छबि निर्मित हुई है, उससे एक तरफ उसमें अहंकार पैदा हुआ, जिसे अब जनता भी महसूस करने लगी है, वहीं दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था और महामारी नियंत्रण में उसकी अक्षमता, लापरवाही, संवेदनहीनता और नाकामी ने उसे अलोकप्रिय बना दिया है। आगामी चुनावों की दृष्टि से उसकी संभावनाएं धूमिल नजऱ आती है लेकिन अर्थव्यवस्था और कोरोना महामारी के कुप्रबंधन के आरोप से बचने के लिए जिस तरह आँकड़ों में भी हेरफेर किया है, उसके चलते जनता का विश्वास उससे उठने लगा है। इसके बावजूद झूठ, अफ़वाह और षड्यंत्र के सहारे राजनीति करने से अब भी वह बाज़ नहीं आ रही। भविष्य में अगर जोड़तोड़, झूठ, अफवाह और दुर्भावना के ज़रिए राजनीतिक सत्ता को येन-केन प्रकारेण प्राप्त करने का प्रपंच अन्य दल भी करने लगे और वह देश की राजनीतिक संस्कृति का अंग बन जाए, तो इसका दोष भाजपा के अलावा और किसे दिया जाएगा।

कांग्रेसी हो या भाजपाई दोनों ही पार्टी से जुड़े चुने हुए जनप्रतिनिधियों को यह बात नहीं भूलना चाहिए कि थोड़े से लालच और सत्ता के नजदीक जाने के चक्कर में उन्हें जनता की भारी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अजीत जोगी ने तरूण चटर्जी सहित बहुत से कद्दावर नेताओं को भाजपा से तोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया। जनता ने उन्हें अगले चुनाव में चलता कर दिया। पश्चिम बंगाल जहां अभी हाल ही में चुनाव हुए हंै वहां भी कुछ विधायक भाजपा को छोड़कर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में जाने की फिराक में हैं। कहने को हमारे देश में दल-बदल कानून लागू है किन्तु राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने इसका तोड़ निकल लिया है। जहां कहीं भी मार्जिनल बहुमत है या गठजोड़ है वहां भी सरकार को गिराना अस्थिर करना आसान होता है किन्तु छत्तीसगढ़ में यह संभावना नहीं है। भाजपा को अभी इसके लिए ढाई साल और प्रतीक्षा करनी होगी। इस बार मोदी लहर वैसे काम नहीं आने वाली है, जैसे पिछले लोकसभा में कर गई। इस बार मोदी लहर पर कोरोना की बेरोजगारी की आर्थिक मंदी की लहर ज्यादा भारी है।

अब बात भूपेश बघेल के ढाई साल के कार्यकाल की। दरअसल जो लोग भूपेश बघेल के तेवर और ज़मीनी पकड़ को जानते हैं उन्हें यह अहसास है कि अगली बार भी यह जीत की गारंटी है। छत्तीसगढ़ी अस्मिता और स्वाभिमान को पुनर्जीवित करने वाले भूपेश बघेल ने यहां के गरीब, मेहनतकश, किसान और आमजनों के बीच एक नये तरह के विश्वास का संचार किया है। अपने कुशल प्रबंधन से बिना ताली-थाली बजाये, दीवाली मनाए, कोरोना महामारी से निपटने गाँव-गाँव में दवाई की पोटली पहुँचाई। लिबरल लॉगडाऊन और बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन के ज़रिए जनता के हितों और स्वास्थ्य का ध्यान रखकर लोगों को बेहतर स्वास्थ्य के साथ ज़रूरी सुविधाएं भी उपलब्ध करायी। छत्तीसगढ़ में आक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई बल्कि देश के बहुत से राज्यों को यहां से आक्सीजन मिली।
एक ओर जहां लोग इकाई-दहाई, ढाई का पहाड़ा पढ़कर भूपेश बघेल को चलता करने के मंसूबे पाल रहे हैं वहीं दूसरी ओर भूपेश बघेल मिशन 23 की शुरूआत करते हुए अपने साथियों से जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ाने कह रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठजनों के प्रशिक्षण शिविर में अपने साथियों को उन्होंने एकता और तालमेल का पाठ पढ़ाकर सरकार की उपलब्धियों की याद दिलाई। भूपेश बघेल ने अपने साथी कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र के अनुसार 2500 रूपये प्रति क्विंटल धान खरीदी की, किसानों की कर्जमाफी की और नगरनार में आदिवासी की अधिग्रहित जमीन वापस लौटाई। सरकार के ढाई साल का लेखा-जोखा देते हुए यह भी बताया गया कि हमें अपने काम को गांव-गांव तक पहुंचाना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने 30 महीनों में छत्तीसगढ़ के अंदर कई विकास के काम किए हैं। अब हम छत्तीसगढ़ आने वाले पर्यटकों को सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और संस्कृति मात्र नहीं दिखाना चाहते, हम उन्हें अपने गांव-खेत और समृद्धि भी दिखाना चाहते हैं। वह दिन भी आएगा जब लोग हमारे गौठान देखने के लिए छत्तीसगढ़ आएंगे। सुराजी गांव योजना के नरवा गरवा घुरवा बारी कार्यक्रम से गांवों में बदलाव की शुरुआत हुई है जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। गोधन न्याय योजना को पूरे देश में लागू करने की बात हो रही है। राजीव गांधी किसान न्याय योजना कोरोना काल में किसानों का संबल बन गई है। लगता है भूपेश बघेल को किसी प्रशांत किशोर की जरूरत नहीं है, उनका काम, उनका कॉन्फिडेंस ही उनकी पहचान है।