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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-क्या बने बात जहां बात बनाये ना बने

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-क्या बने बात जहां बात बनाये ना बने


मिर्जा गालिब का एक मशहूर शेर है-
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने

देश में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर लगभग यही स्थिति है। केंद्र सरकार जिसने कृषि सुधार के नाम पर तीन नये कानून लाकर उन्हें दोनों सदनों से पारित करवा लिया, किसान उस कानून को मानने तैयार नहीं है और लगातार 48 दिन से हरियाणा-दिल्ली बार्डर पर ठंड की परवाह किये बगैर आंदोलनरत है। अब तक 65 किसानों की मृत्यु, ठंड और आत्महत्या के कारण से हो चुकी है। कभी किसान मौसम की मार से कभी सेठ की उधार से कभी सरकार के व्यवहार से तो कभी अपने हालात से मरने को मजबूर होता है। जय जवान जय किसान के नारों की सच्चाई को समझने वाले किसानों के मामले में सरकार से 8 दौर की बातचीत का भी अब तक कोई नतीजा नहीं निकला। 9वें दौर की बातचीत 15 जनवरी को कृषि मंत्री के साथ होनी है। इस बीच देश की सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए आगामी आदेश तक तीन कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को देखने के लिए चार सदस्यों की कमेटी बनाई है। किसान संगठनों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ऐतराज है। वे इस कमेटी को सरकारी कमेटी बताते हुए कह रहे हैं कि कमेटी में शामिल सदस्यों ने खुलकर नये कृषि कानूनों का समर्थन किया। जो लोग पहले से ही कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं, वे इसके विरोध में क्यों बोलेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसान समस्या का समाधान चाहते हैं तो हम ये नहीं सुनना चाहते हैं कि किसान कमेटी के सामने पेश नहीं होंगे। आंदोलनकारी किसान और उनके नेताओं को कमेटी के गठन पर शंका है। उन्होंने लगता है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के जरिये उनके आंदोलन को समाप्त करना चाहती है। किसानों के आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रकार की कोई रोक नहीं लगाई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर बिना किसी हल के आपको सिर्फ प्रदर्शन करना है तो आप अनिश्चितकाल तक प्रदर्शन करते रहिए उससे हल नहीं निकलेगा। सामान्यत: यह सुनने देखने में लगता है कि किसान सरकार को, सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं मानते किन्तु जब किसानों की बात सुनो तो लगता है उनके साथ धोखा हो रहा है। किसान संगठन कह रहे हैं कि कोर्ट के जरिये से सरकार ने उनके साथ शरारत की है। सभी सदस्य सरकार के ही पक्ष वाले हैं। हम कोर्ट से नहीं गये। हम तो सरकार से उसका काला कानून वापस लेने कह रहे हैं। किसानों की हालत गालिब साहब के शेर की तरह ही है कि क्या बने बात जहां बात बनाए न बनें।
किसानों की ओर से पैरवी कर रहे वकील कहते हैं कि इतने लंबे किसान आंदोलन के बावजूद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक किसानों से बात करने आगे नहीं आए। सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों के अमलीकरण पर रोक लगाने की सरकार की आपत्ति के संबंध में कहा कि लंबे वक्त से कोई नतीजा नहीं निकला है, सरकार का रूख सही नहीं है।

किसानों की ओर से अपने आंदोलन को पूर्व की भांति जारी रखते हुए 26 जनवरी को टै्रक्टर रैली निकालने की बात कही गई है। किसानों के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया है कि बुजुर्ग महिलाएं और बच्चे आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। स्वराज इंडिया के नेता डॉ. योगेंद्र यादव ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित समिति सरकारी समिति है। एटर्नी जनरल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में ये कहे जाने पर कि इस आंदोलन में खलिस्तानी समर्थक घुस आये हैं। कभी इस आंदोलन में नक्सलियों का हाथ होने की बात कही जाती है तो कभी इसकी फंडिंग की बात को लेकर सवाल किया जाता है। अपने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए यह किसान आंदोलन इस देश के लोकतंत्र में एक नई इबारत लिख रहा है। ये अपने हक की लड़ाई लडऩे वालों की हौसला अफजाई भी कर रहा है। इसके बावजूद इस आंदोलन पर तरह-तरह के आरोप सोशल मीडिया के जरिए आये दिन लगाए जा रहे हैं। योगेंद्र यादव ने कहा कि वे इस तरह के आरोपों से दुखी और निराश हं। यदि सरकार के पास इस तरह के इनपुट है वह कार्यवाही करे। आंदोलन की निर्णायक भूमिका में कौन है, कौन नेतृत्व कर रहा है यह देखने की बजाय इस तरह की अफवाह फैलाकर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। किसान संगठनों ने सरकार की नीति और नियत पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा है कि उनका आंदोलन अनवरत जारी रहेगा। किसान नेतओं का कहना है कि कानून सरकार ने बनाये हंै, इसलिये सरकार को इस कानून को वापस लेना चाहिए। किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा आंदोलन जारी रखने के संबंध में दी गई गाईड लाईन के प्रति धन्यवाद व्यापित करते हुए इसे अपना जनतांत्रिक अधिकार बताया है।

किसान संगठन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जिस चार सदस्यीय समिति को खारिज कर रही है उसमें शामिल लोगों के बारे में पब्लिक डोमिन में जो जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार भारतीय किसान यूनियन के भूपिंदर सिंह मान के प्रधान हैं। शेतकारी संगठन से जुड़े दूसरे सदस्य अनिल घनवंत ने गत दिनों कहा था कि सरकार किसानों के साथ विचार-विमर्श के बाद कानूनों को लागू और उनमें संशोधन कर सकती है, हालांकि, इन कानूनों को वापस लेने की आवश्यकता नहीं है, जो किसानों के लिए कई अवसर को खोल रही है। अनिल घनवंत की ही तरह कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी भी तीनों कृषि कानूनों के पक्ष में रहे हैं। 1991 से 2001 तक प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार काउंसिल के सदस्य रहे अशोक गुलाटी ने टाइम्स आफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि इन तीनों कानून से किसानों को फायदा होगा, लेकिन सरकार यह बताने में कामयाब नहीं रही। समिति के चौथे सदस्य कृषि नीति विशेषज्ञ और दक्षिण एशिया अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक प्रमोद कुमार जोशी ने कहा था कि आर्थिक सर्वेक्षण में मंडी प्रणाली को खत्म करने और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करने की सिफारिश की गई है जो तीन नए कानूनों में से एक है किसानों को बेहतर रिटर्न पाने और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने में मदद करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के फौरी राहत देने वाले फैसले से किसान संगठन खुश नहीं है। उन्हें लगता है कि सरकार ने उनके साथ शरारत की है। कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी में सरकार के पक्ष वाले लोग हैं। कोर्ट ने दो माह में रिपोर्ट मांगी है। सरकार कोर्ट के जरिये से आंदोलन को समाप्त करना चाहती है। किसान संगठनों का इतना कहना है कि हम कोर्ट में नहीं गये थे। कोर्ट ने स्वयं से संज्ञान लेकर जो चिंता  जाहिर की है, वह दिखावटी साबित हुई है। जब तक सरकार काले कानून को वापस नहीं लेती, तब तक यह आंदोलन वापस नहीं होगा। किसान कमेटी और न्यायालय के सामने नहीं जाकर इसे संसदीय समिति और संसद के दोनों सदनों में लेकर चर्चा कर खारिज किया जाना चाहिए। भाजपा से जुड़े भारतीय किसान संघ ने निष्पक्ष समिति बनाकर उत्पादक, उपभोक्ता और विक्रेता के प्रतिनिधियों को जोड़कर 140 करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वसमावेशी समिति के गठन का सुझाव दिया है।   

बहुत से कानून के जानकारों का कहना है कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने 99वां संशोधन अधिनियम 2014 के जरिये लाया। नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन को असंवैधानिक घोषित करते हुए इसे खारिज किया है, उसी तरह वह इन कृषि कानूनों को भी खारिज कर सकती थी।   
किसानों का आंदोलन फिलहाल समाप्त होते तो नहीं दिखता। सरकार भी इसे कोर्ट के पाले में डालकर किसानों की छबि अडिय़ल और कानूनों को नहीं मानने वाली बनाने पर तुली है। इस पूरे आंदोलन को एक तरह का राजनैतिक रंग देने की कोशिशें भी निरंतर जारी है। कोई इसे अकाली दल का प्रायोजित कार्यक्रम बताने पर तुला है तो कोई खलिस्तानी संगठन का। बाकी रही सही कसर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर डालकर उन्हें देशहित में काम करने से रोकने वाला करार देने के लिए काफी है। जिस तरह दिल्ली के मौसम में कोहरा छाया हुआ है, वैसा ही कुछ इस किसान आंदोलन को लेकर है। सरकार को इस मामले में कोई जल्दी नहीं है। किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि उनका भला चाहने की बात करने वाले दरअसल कौन हैं, उनकी मंशा क्या है। ऐसे हालात को देखकर सुदर्शन फाकीर का शेर याद आता है-
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है
क्या मेरे हक में फैसला देगा।