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कारवॉ का सफ़र तीस बरस: एक गधे की आत्मकथा के बहाने

कारवॉ का सफ़र तीस बरस: एक गधे की आत्मकथा के बहाने

अमन कबीर

रायपुर, 25 मार्च। समाज के विभिन्न वर्गों और सरकारी व्‍यवस्‍था पर कटाक्ष करता नाटक 'एक गधे की आत्मकथा' का मंचन मंगलवार को रवींद्र भवन में किया गया। उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार कृष्ण चंदर द्वारा लिखित कृति का नाट्य रूपांतरण अख्तर अली ने किया है। इसका निर्देशन नजीर कुरैशी ने किया। नाटक में अमन कबीर के गीतों का इस्तेमाल किया गया। इसमें पहला गाना 'पुकारता सड़क-सड़क, तलाशता गली गली...', दूसरा गाना 'लड़कियां ये लड़कियां...' और तीसरा गाना जब होता है जब गधे की हत्या के बाद उसका सर कटा मिलता है। इसके बोल हैं 'टूट गए ख्वाब सारे मर गए अरमान हैं...' थे।

फिल्म लेखक व गीतकार अमन कबीर ने बताया कि कारवॉ भोपाल से मेरा रूहानी लगाव रहा है...बारहा कारवॉ के सफ़र में मैं गाहे बा गाहे चला और कभी लंबे वक़्त तक नदारत भी रहा - हॉ इस बार हाजी नज़ीर कुरैशी साहब जो मेरे उस्ताद भी है और ख़ैर ख़्वाह भी उनके हत्थे चढ़ गया - और कृष्ण चंदर साहेब का बेशक़ीमती उपन्यास -एक गधे की आत्मकथा के गीत लिखने के लिए हुक्म हो गया- हालांकि इस उपन्यास को बाज़ मर्तबा पढ़ा हैै लेकिन कमबख़्त गधा पकड़ मैं नहीं आया- इस उपन्यास का ड्रामाटाईटेशन अथ नाट्य रूपान्तरण मेरे बेहद अजीज़ और छत्तीसगढ़ की मिट्टी की से उपजे ज़हीन लेखक,व्यंग्यकार जनाब अख़्तर अली साहेब ने किया है तो उन्हीं से दरयाफ्त किया कि-

" साहेब कृष्ण चंदर का गधा, नज़ीर साहब का और आपके गधे में फर्क़ क्या है"।

उन्होंने कहा-" सद अफसोस हम सबका गधा एक ही है कबीर भाई!"

और फ़िर लगा इनका गधा मैं ही हूं या ये सभी अपने आप में गधे हैं- और जो कुछ बन पड़ा उसे लफ़्ज़ों में पिरौने की कोशिश की - और तब समझ में आया-  ये गधा आम आदमी है- जिसे प्रजातन्त्र में स्वामी तो कहा जाता है लेकिन नौकर उस पर राज करते हैं- यह कॉमन मेन-यह आम आदमी-यह गधा इसे कुछ आये न आये-हालातों से समझौता करके जीना ज़रूर आता है-ये दिखने में,रहन-सहन में कॉमन है लेकिन इसका जिगर अन कॉमन है- इसकी छाती 56 इंच की नहीं है लेकिन इसकी दुबली-पतली,कमज़ोर छाती में वो दम है जिससे देश चलता है-इसके बच्चे पढ़-लिख कर भी बेकार घूमते हैं-इसकी माँ,बहन,बेटी पे अत्याचार होते हैं-दंगे-फसाद में,विस्फोटों में यह ही मरता है-यह ही बर्दाश्त करता बंजर खेतों की हूक-ये ही दबा होता कर्ज़ के भारी बोझ तले -यही लटक जाता है अपने ही खेत के किसी पेड़ की साख में फंदा डाल के-इसी के वोट से बनती है सरकार,बनते है पॉलिटिशियन जो इसी का ख़ून चूसते हैं खटमल की तरह-यह गधा तब भी  खामोशी से बदलाव की उम्मीद में सब कुछ सह जाता है- इस देश की नींव हिलने नहीं देता-इसे देखकर ख़ुद ख़ुदा भी सोचने लगे कि-यार किस खेत की मूली है -

गधा होना और होकर जीना कोई शार्ट टर्म कोर्स नहीं है।गधा बेचारा मंहगाई, डीजल, पेट्रोल,गैस, बिजली बिल,वगैरह के चक्कर में फंस कर सिर्फ़ गधा ही बनकर रह जाता है।

नज़ीर कुरैशी और अख़्तर अली के इस गधे में यदि आप ख़ुद को देख पाए तो यक़ीन माने आप गधे नहीं हैं...।

रंगमंच ज़िन्दाबाद