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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -डी.एन.ए. टेस्ट की जरुरत क्यों ?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -डी.एन.ए. टेस्ट की जरुरत क्यों ?

-सुभाष मिश्र

किसी भी आदमी का डीएनए अक्सर संदेह की स्थिति में टेस्ट किया जाता है ताकि ये मालूम हो सके कि जो उसकी संतान होने का दावा कर रहा है, या किया जा रहा है क्या वाकई वो उसकी संतान है कि नहीं? इस समय देश को याद दिलाया जा रहा है कि हम सबका डीएनए एक है। कोई भी व्यक्ति सुबह उठकर अपने भाई को गले लगाकर नहीं कहता है कि तू मेरा भाई है। हमारा डीएनए एक है, हमारा खून का रिश्ता है, हमें एक-दूसरे की परवाह करनी चाहिए। बहुत कुछ अकहा, अलिखित और आपसी समझ और परस्पर प्रेम से होता जाता है। हमारे देश में वोट की राजनीति कहें या दिखावापन हमें बार-बार हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की याद दिलाई जाती है। पहले हिन्दी-चीनी भी भाई-भाई थे, फिर लड़ाई हो गई। चूंकि हिन्दू, मुस्लिम, बौद्घ, इसाई और बहुत से धर्मों को मानने वाले लोग सदियों से साथ रह रहे हैं। सभी ने एक दूसरे के खान-पान, रीति-रिवाज, बोली-भाषा को अपनाया है इसलिए हम सब दिखने, सुनने, बोलने, बताने में एक जैसे हैं। ये अलग बात है कि अपनी धार्मिक मान्यताओं की वजह से कोई पगड़ी बांध लेते हैं, कोई दाढ़ी बढ़ा लेता है, कोई टोपी पहन लेता है, पर हैं, सब एक जैसे। विदेशों में जब एशिया मूल के लोग जिनमें हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी, बंगलादेशी रुप शामिल हैं, मिलते हैं तो एक-दूसरे के ब्रदर होते हैं क्योंकि उनकी बोली, भाषा, खानपान, आदतें एक जैसी होती है। महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा है कि भारतीय सभ्यता भिन्न-भिन्न धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाली और अपने-अपने भौगोलिक तथा अन्य पर्यावरणों से प्रभावित संस्कृतियों का संगम है। तद्नुसार इस्लामी संस्कृति अरब, तुर्की, मिन और भारत में एक जैसी नहीं है, लेकिन वह स्वयं इन देशों की परिस्थितियों से प्रभावित हुई है। अत: भारतीय संस्कृति भारतीय है। यह न पूरी तरह हिंदू है, न इस्लामी और न कोई अन्य। यह इन सबका मिला-जुला रूप है और मूलत: पूर्वी है। जो व्यक्ति स्वयं को भारतीय कहता है, उसका यह कर्तव्य है कि इस संस्कृति की कद्र करें, इसका न्यासी बने और यदि इस पर कोई आंच आए तो उसका प्रतिकार करें। आज भारत में विशुद्ध आर्य संस्कृति जैसी कोई चीज विद्यमान नहीं है। आर्य लोग भारत के ही मूल निवासी थे या वे यहां जबर्दस्ती घुस आए, यह जानने में मेरी कोई विशेष रुचि नहीं है। मेरी रुचि तो इस तथ्य में है कि मेरे बहुत पहले के पूर्वज पूरी स्वतंत्रता के साथ एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे और हमारी वर्तमान पीढ़ी उसी मिश्रण का परिणाम है।  

अभी हाल ही में गाजियाबाद में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के सलाहकार रहे डॉ. ख्वाजाइ्फ्तिखार की किताब वैचारिक समन्वय-एक व्यावहारिक पहल पर जिसमें अयोध्या-बाबरी विवाद पर बड़ा खुलासा किया गया है के रिलीज अवसर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि सभी भारतीयों का डी.एन.ए. एक है और मुसलमानों को डर के इस चक्र में नहीं फंसना चाहिए कि भारत में इस्लाम खतरे में है। जो लोग मुसलमानों से देश छोडऩे को कहते हैं, वे खुद को हिन्दू नहीं कह सकते। लिंचिंग की घटनाओं में शामिल लोगों पर हमला बोलते हुए कहा कि वे हिन्दुत्व के खिलाफ हैं। हालांकि कुछ लोगों के खिलाफ लिंचिंग के कुछ झूठे मामले दर्ज किए गए हैं। भागवत ने मुसलमानों से कहा कि वे भय के इस चक्र में न फंसे कि भारत में इस्लाम खतरे में है। देश में एकता के बिना विकास संभव नहीं है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान भारत की सामाजिक संस्कृति और उसकी वैचारिकी के अनुकूल है लेकिन यह कैसे भुलाया जा सकता है कि संघ भारतीय समाज की बहुलता समन्वयशीलता और सामाजिकता के खिलाफ हिंदुओं को हिंदुत्व की एकांगी  विचारधारा तले एकजुट करने के राजनीतिक अभियान में अपनी स्थापना के साथ ही लगा हुआ है। संघ को सांस्कृतिक संगठन कहना छलावा है। संस्कृति के आवरण में छिपी राजनीति और उसकी नीयत आज छिपी नहीं है। सर संघचालकों में सर्वाधिक मुखर रहे गोलवलकर ने संघ की विचारधारा को छिपाया भी नहीं और गैर-हिंदुओं के खिलाफ बहुसंख्यक हिंदुओं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए मॉडल के तौर पर इटली और जर्मनी के फासीवादी सर्व सत्तात्मक शासन को पेश किया, जो अल्पसंख्यकों के विरुद्ध घृणा, उनके दमन और उनसे दुराव पर आधारित है। उनकी कल्पना का हिन्दू राष्ट्र 1930 के दशक के जर्मनी से भिन्न नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राजग सरकार उसी कल्पना को सच करने की दिशा में  काम कर रही है। इसलिए पिछले सात वर्षों में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं और उन्हें सुलगाने के लिये राजनीतिक और कानूनी प्रावधान ज़ोर-शोर से लागू किये गये हैं। उनके खिलाफ व्यापक स्तर पर दुष्प्रचार अभियान में मीडिया लगातार सक्रिय है और एक घृणा का वातावरण देश में बनाया जा रहा है। इस प्रवृत्ति के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी कोई खुला विरोध दर्ज नहीं किया, बल्कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर मौन रहकर सत्ता प्रतिष्ठान और संघ ने ऐसी घटनाओं का समर्थन ही किया, क्योंकि सड़क पर उनके कार्यकर्त्ता जब इन्हें अंजाम दे रहे थे तो संघ के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे थे।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संविधान में संघ के गठन और स्थापना को लेकर जो उद्देश्य दर्शाये हैं उसके अनुसार यह देश की विघटित अवस्था में (क) हिंदुओं में से संप्रदाय, मत, जाति तथा पंथ की विभिन्नताओं तथा राजनीति, अर्थनीति, भाषा तथा प्रांत-संबंधी भेदों से उत्पन्न विघटनकारी प्रवृत्तियों को दूर करने और उनमें अतीत की महानता का ज्ञान कराने, सेवा त्याग और समाज के प्रति नि:स्वार्थ भक्ति भाव करना शामिल है।  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य और मन्तव्य हिंदू समाज के अनेक एवं विभिन्न वर्गों को संघटित कर एकात्म बनाना और हिन्दू-समाज को उसके धर्म और संस्कृति के आधार पर शक्तिशाली तथा चैतन्यपूर्ण करना है, जिससे वह भारतवर्ष की सर्वांगीण उन्नति कर सके शामिल है।  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंचालक बालासाहब देवरस ने आपातकाल के समय संघ पर प्रतिबंध लगाये जाने पर 22 अगस्त 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर कहा था कि देश की आंतरिक सुरक्षा, सार्वजनिक शांतता एवं व्यवस्था को खतरा पहुँचे ऐसा कोई भी काम, कभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नहीं किया है। अखिल हिंदू समाज को एकरस, स्वत्वपूर्ण एवं संगठित कस्ना यह संघ का हेतु है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सांप्रदायिकता का आरोप करने वाले भी कुछ लोग हैं पर उनका यह आरोप भी निराधार है। यद्यपि संघ का कार्यक्षेत्र संप्रति केवल हिंदू समाज तक ही सीमित है, फिर भी किसी भी अहिंदू के खिलाफ कुछ भी, संघ में सिखाया नहीं जाता। संघ में मुसलमानों का द्वेष करना सिखाया जाता है, यह कहना भी सर्वथा असत्य है। इस्लाम धर्म, मुहम्मद पैगंबर, कुरान तथा ईसाई धर्म, ईसा मसीह, बाइबिल-इनके संबंध में संघ में अनुचित शब्द का भी प्रयोग नहीं होता। इतना ही नहीं, बल्कि सर्व धर्म समभाव माने एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति यह जो हिंदुओं की विशेषता है, उसी को संघ सर्वोपरि मानता है। संघ प्रमुखों द्वारा कभी हां, कभी ना जैसी स्थिति और उनके फालोवर की सोच और व्यवहार संघ को लेकर संशय खड़ा करता है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कहते हैं कि सरस्वती शिशु मंदिर से लेकर संघ द्वारा बौद्घिक प्रशिक्षणों में मुसलमानों के खिलाफ जो नफरत का बीज बोया गया है वह निकालना आसान नहीं है। यदि आप अपने व्यक्त किए गए विचारों के प्रति ईमानदार हैं तो भाजपा में वे सब नेता जिन्होंने निर्दोष मुसलमानों को प्रताडि़त किया है उन्हें उनके पदों से तत्काल हटाने के निर्देश दें।

ऐसी स्थिति में संघ प्रमुख के बयान को देर से दिया गया विवेकपूर्ण वक्तव्य या लीपापोती की कोशिश कहा जाना भी उपयुक्त नहीं है। दरअसल इसके पीछे की राजनीतिक चाल और नफरत पर टिके फासीवादी नज़रिये की चतुर रणनीति को पहचानना कठिन भी नहीं है। ऐसे कुछ अवसर पहले भी आये हैं जब संघ के वैचारिक एजेंडा के अनुरूप उपद्रवी कार्रवाइयों पर निंदात्मक बयान, वह भी देर से, दिए गए। लेकिन ऐसी कार्रवाइयाँ थमी नहीं। ज़ाहिर है, इनसे संघ नेतृत्व की परोक्ष सहमति जान पड़ती है और निंदात्मक बयान महज़ दिखावा हैं। यह दोमुंही नीति है। संघ प्रमुख के ताजा बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिये।
लेकिन इसका एक और पहलू भी ध्यान खींचता है। कोरोना प्रबंधन में केंद्र सरकार की विफलता, बंगाल  में आक्रामक हिंदुत्व की चुनावी पराजय और उत्तरप्रदेश के आगामी चुनाव की संगति में भी इसे देखा जा सकता है। पिछले कुछ महीनों में केंद्र सरकार की दिशाहीनता और नाकामी के चलते उसकी लोकप्रियता में गिरावट आयी है। सीएए, एनआरसी जैसी कवायद से अल्पसंख्यकों में अलगाव बढ़ा है। विश्व बिरादरी में भी इससे भारत की साख गिरी है। ऐसे में अल्पसंख्यकों के घाव भरने के लिए मरहम की तरह ऐसे बयानों का उपचारात्मक प्रयोग किया जा रहा हो तोअ चरज नहीं। हार्डकोर हिंदुत्व की राजनीतिक उठान अब उतार पर है। उसकी क्षतिपूर्ति के लिए यह एक रणनीतिक बयान है। कांग्रेस पर अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली विचारधारा अपने ऊपर आसन्न संकट की पहचान कर आत्मरक्षा के लिए यदि स्वयं अल्पसंख्यकों के वैचारिक और भावनात्मक तुष्टिकरण के कदम उठा रही है, तो उसकी विडंबना को समझना मुश्किल नहीं है।