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सफलता की कहानी : दुब्बाटोटा मत्स्य प्रसंसकरण केन्द्र है मत्स्य उत्पादन के लिए तैयार

सफलता की कहानी : दुब्बाटोटा मत्स्य प्रसंसकरण केन्द्र है मत्स्य उत्पादन के लिए तैयार

सुकमा।   जिले में बदलाव की बयार अब तेजी के साथ पैर-पसार रही हैं। एक समय था जब सुकमा केवल नक्सलवाद के नाम से जाना जाता था और इसके दंश से इसकी पहचान हमेशा से पिछड़े व कमजोर जिले के रूप में होती रही लेकिन अब वही सुकमा विकास के नित-नए आयाम रचते हुए आत्मनिर्भर होने के दिशा में आगे बढ़ रहा हैं।


सलवा जुडुम के दौरान जिले में नक्सल प्रभाव अपने चरम पर था, जिसमें कई शालाएं, आश्रम, भवन, घर सबकुछ तबाह हुआ। ग्रामीणों के जिविकोपार्जन के साधन भी उन्हे विवशता पूर्ण त्याग करना पड़ा था।

इस हिंसा का शिकार दुब्बोटोटा स्थित मत्स्य प्रसंसकरण केन्द्र भी रहा, जहां 90 के दशक से मत्स्य उत्पादन कर मत्स्य पालकों का घर चलता था। नक्सल गतिविधियों के कारण वर्ष 2006 में मत्स्य उत्पादन का यह केंद्र पूर्णतः बंद हो गया। 

जिले में 1990 के आसपास दुब्बाटोटा में निर्मित मत्स्य बीज प्रक्षेत्र में मत्स्य उत्पादन, मत्स्य बीज उत्पादन का कार्य प्रारंभ था। अंदरूनी गांव होने के कारण सलवा जुडूम का प्रभाव दुब्बाटोटा पर भी रहा और मत्स्य प्रसंस्करण का कार्य बंद करना पड़ा। समय का चक्का चला और शासन-प्रसाशन के प्रयास से एक बार फिर से यहाँ के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव तेज हुआ।

आदिवासी अंचलों का विकास और उनके निवासियों को आर्थिक संवर्धन प्रदान करना शासन की प्राथमिकता है, और इसी का नतीजा है की इतने लंबे समय से बंद पड़े मत्स्य बीज प्रक्षेत्र का जीर्णाेधार किया गया।


मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल के मंशानुरुप, उद्योग मंत्री  कवासी लखमा के मार्गदर्शन में कलेक्टर  विनीत नंदनवार ने द्रुत गति से इस मत्स्य प्रसंसकरण केन्द्र का जिर्णोद्धार प्रारंभ किया, जो आज मुर्त रुप ले चुका है।

आज मत्स्य हेचरी का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है, और जल्द ही यहां मत्स्य उत्पादन भी प्रारंभ कर लिया जाएगा। जिला प्रसाशन के प्रयास से एक बार पुनः दुब्बाटोटा गांव अपने पुराने स्वरुप में लौट आया है। अब दुब्बाटोटा के ग्रामीणों के जीवन में बदलाव निश्चित है।

मत्स्य पालन में जिला होगा आत्म निर्भर, ग्रामीणों को आर्थि स्थिति होगी मजबूत 

दुब्बाटोटा में मत्स्य हेचरी शुरू होने पर यहां के ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उन्हें इससे रोजगार मिलेगा। अब तक मछली उतपादन हेतु बीज के लिए सीमावर्ती राज्य ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलांगना पर निर्भर रहना पड़ता था।

मत्स्य हेचरी से क्षेत्र के मत्स्य पालकों को जिविकोपार्जन का साधन तो सशक्त होगा ही साथ ही मछली बीज के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता पूर्ण रूप से बंद हो जाएगी। जिले भर में मत्स्य हेचरी से बीज लेकर ग्रामीण मछलियों का उत्पादन करेंगे और इसका क्रय-विक्रय होने पर ग्रामीण आर्थिक रुप से सशक्त बनेंगे।


जिलेवासियों को स्थानीय स्तर पर ही ताज़ी मछलियां उपलब्ध होंगी। प्रसंस्करण केंद्र के पुनः प्रारंभ होने से मत्स्य बीज उत्पादन हेतु सुकमा पूर्णतः आत्मनिर्भर हो जायेगा। इसके साथ ही बच्चों में कुपोषण को दूर करने में भी यह सहायक सिद्ध होगा और जिले में सुपोषण अभियान को गति मिलेगी।

दुब्बाटोटा में मत्स्य हेचरी का पुनः निर्माण शुरू होने से यहां के ग्रामीणों में खुशी की लहर हैं। गाँव के बुजुर्गों का कहना हैं कि पुराने दिन वापिस लौट रहें हैं ऐसा महसूस हो रहा हैं। एक समय था जब यहां के मछली बीज दूसरे इलाकों में पहुँचते थे, अच्छी आमदनी उन्हें होती थी। फिर सब कुछ बदल गया और यहां का मछली बीज का व्यापार बन्द हो गया।

उनमें से किसी को यह विश्वास नहीं था कि यह सब कुछ वापिस से लौटकर आएगा। लेकिन शासन-प्रशासन के प्रयासों से अब उन्हें बेहद खुशी हैं कि पुराने अच्छे दिन लौटकर आ रहें हैं। दुब्बोेटोटा के ग्रामीणों के लिए मत्स्य प्रसंसकरण केन्द्र ना सिर्फ आय का साधन रहा, बल्कि उनकी जीवनशैली थी, जिसे प्रशासन ने उन्हें वापस लौटा दिया है।

मत्स्य प्रसंस्करण केन्द्र के पुनः संचालन से क्षेत्र के सौंकड़ो मत्स्य पालकों को आजिविका का साधन उपलब्ध होगा। इस प्रसंस्करण केन्द्र में एक करोड़ स्पान, 40 लाख स्टैंडर्ड फ्राई का उत्पादन वार्षिक दर पर किया जाएगा जिससे मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि होगी।