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शब्द - श्रद्धांजलि : प्रभुजी ने अपने स्वाभिमान की कई लड़ाईयां लड़ीं

शब्द - श्रद्धांजलि : प्रभुजी ने अपने स्वाभिमान की कई लड़ाईयां लड़ीं


*प्रभु जोशी को यूँ तो ना जाने कितने लोगों ने याद किया , श्रद्धांजलि दी पर कहानीकार ओमा शर्मा और पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक अशोक मिश्रा व  

राजीव कुमार शुक्ला ने उन्हें कुछ यूँ याद किया ।*

भाई, सखा, स्नेही अग्रज, लेखक- कथाकार, विरल चित्रकार, चिंतक, दृष्टा, पति-पिता, हिंदी प्रेमी...सोचने चलूँ तो क्या क्या रूप और भूमिकाओं में आपको देखा,जाना समझा। आपका सब कुछ सहज और सबके लिए था। आपके इंदौर-देवास कस्बों सा ही देसी। आपकी कहानियों को पढ़कर उनके रचे के बारे में हैरत होती थी क्योंकि एक तरह से वे भाषा की मार्फ़त इत्मिनान से की गई चित्रकारियां ही हुआ करतीं, और आपकी चित्रकारी!लगता था कितने घरानों के उस्तादों ने कोई विलंबित राग तैयार किया है।आर्थिकी समेत दुनिया के तमाम अहम कलागत और सभ्यतागत सवालों पर आप कभी रूबरू तो कभी फोन पर देर तक अपनी चिंताएं साझा करते, हुसेन साब से साक्षात्कार करने के समय आपसे उनकी कला की बारीकियों के बारे में खूब जाना-समझा, आप थे जो अतीत के उस्तादों के साथ युवा रचनाशीलता को पढ़े जाने का आग्रह करते, कला और साहित्य का वैश्विक फलक आपको ऊर्जस्वित किए रखता, आप ही थे जो कला और संगीत के तत्वों(कुमार गंघर्व विशेषतः) को साहित्य के सफे पर इतने सलीके से रखते कि पढ़ने वाले को भरोसा रहता, आप ही थे जो मेरी किसी लंबी कहानी को एक अच्छे खासे उपन्यास को सेबोटेज करने का स्नेहवश उलाहना देते, आपके पास स्वस्थ रहने के नुस्खे लिए जाते थे, आप ही थे जो वैचारिकी के बीचोबीच लेखक के निजी संसार की भी खैर-खबर रखना चाहते, आपसे सेंस ऑफ ह्यूमर की सीख भी बैठे ठाले और मुसलसल मिलती, नेहरू सेंटर या जहांगीर कला दीर्घा में प्रीतिश नंदी, गुलजार, विजय कुमार, सुधा अरोड़ा,अनूप सेठी, विनोद दास समेत दूसरों की सोहबत में कितनी चर्चाओं और ठहाकों के दौर चलते, आप थे जो तमाम अफरा तफरी के बीच सभी आत्मीय मित्रों को अपने इंदौर का नमकीन जरूर नवाजते...आप पोटुओं पर उन गिने-चुने उन खास अजीजों में थे जिसके लिए कोई लिखता है...उत्सुक और रहमदिल आलोचक का हृदय लिए। 


अभी आप लगातार सक्रियताओं से घिरे थे। लगभग पूरे पड़े हुए दो तीन उपन्यासों को संवारने को लालायित थे, इन दिनों लगातार ही कैसे जिंदादिल पोर्ट्रेट (मनमोहन सरल, रमेश उपाध्याय, गुलजार, प्रीतिश नंदी, टैगोर और दूसरे भी)बनाये जाते थे। रेमण्ड कार्वर और रेमण्ड विलियम को एक साथ संभालने की आपके भीतर ही कूवत थी। आपकी धाराप्रवाह भाषा और वैचारिकी को सुनना मन्त्र-मुग्ध सा करता था। हिंदी साहित्य और भाषा की शान थे आप।


 अपने लहराते लंबे बालों और अपनी उस काली जैकेट में माशा अल्लाह कितने फबते थे यार!

प्रभु दा, आपको जाते न देखा जाएगा!

*ओमा शर्मा*


*जैसे जिंदादिल पोर्टेट थे प्रभु जोशी*


वह साल 1979 के दिसम्बर महीने के आख़िरी दिनों में कोई सांझ थी। मैं जबलपुर में यशस्वी कथाकार, 'पहल' पत्रिका के सम्पादक, प्रखर वामपंथी आन्दोलनधर्मी बुद्धिजीवी और मेरे जैसे तब के बहुत सारे नौजवानों के दोस्त और नेता ज्ञानरंजन जी के अग्रवाल कॉलोनी वाले घर में बैठा उनसे बातचीत कर रहा था। तभी वहां सुदर्शन व्यक्तित्व के एक युवा आए। ज्ञान जी ने परिचय कराया कि ये प्रभु जोशी हैं, कथाकार और चित्रकार, आकाशवाणी, इन्दौर में काम करते हैं। बात आगे बढ़ी। प्रभु जी ने बताया कि आकाशवाणी में हर वर्ष विभिन्न कार्यक्रम श्रेणियों के लिये एक प्रतियोगिता होती है। उसके लिये इन्दौर केन्द्र की ओर से प्रविष्टि के तौर पर भेजने के लिये उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध की कालजयी कविता 'अंधेरे में' का एक रेडियो रूपान्तर रचा है। समस्या यह है कि नियमानुसार उसके आलेख का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रविष्टि के साथ ही भेजा जाना है और वह कराने में उन्हें कठिनाई हो रही है और इसमें मदद के सुझाव के लिये वे हरिशंकर परसाई जी के पास गए थे, जिन्होंने उन्हें ज्ञानरंजन जी से चर्चा करने की सलाह दी थी। यह उनके आने का तात्कालिक कारण था।


मैंने बी.एच.यू. में पढ़ाई पूरी कर अक्टूबर, 1978 में जबलपुर में कृषि विश्वविद्यालय में रेडियो ऑफ़िसर के पद पर अपने नौकरी के जीवन की शुरुआत की थी। परसाई जी, ज्ञानरंजन जी, अलखनन्दन जैसे व्यक्तित्वों के मार्गदर्शन और सान्निध्य का लाभ पाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ और 'विवेचना' में जनवादी साहित्य और रंगकर्म की दीक्षा आरम्भ हो गई थी। था तो मैं 22 साल का 'बचवा' ही, इसलिये बहुत चकित हुआ, जब ज्ञान जी ने उस अनुवाद के लिये प्रभु जी को मेरा नाम सुझाया। उनके हिसाब से मेरी हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों ठीक थीं, रेडियो माध्यम की मुझे कुछ समझ थी और साहित्य तथा ख़ासकर कविता में भी कुछ दखल था। प्रभु जी पूरी तरह निश्चिंत तो क्या हुए होंगे, पर शायद कुछ ज्ञानरंजन जी पर भरोसे और कुछ तत्काल विकल्प के अभाव ने उन्हें सहमत किया और वह ज़िम्मेदारी मुझे मिल गई।


कहने की ज़रूरत नहीं कि काम काफ़ी चुनौतीपूर्ण और जटिल था। प्रभु जी इन्दौर लौटने के पहले बता गए थे कि अधिकतम एक सप्ताह में अनुवाद उन तक पहुंच जाना चाहिए, क्योंकि प्रविष्टि भेजे जाने की अंतिम तिथि सर पर आ चुकी थी। एक नयी समस्या यह उपज गई कि मेरा नाम 1980 में जनवरी में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये चुनाव ड्यूटी में आ गया। तो सुबह दफ़्तर, दोपहर में निर्वाचन कार्य की कलेक्ट्रेट में ट्रेनिंग और लगभग रात भर अनुवाद। सौभाग्य से मेरे पिता लक्ष्मीकान्त शुक्ल जी उस समय मेरे पास आए हुए थे और उनकी मदद से अनुवाद का काम पूरा हो गया। पर तब डाक से भेजने का समय नहीं बचा था, तो जबलपुर के घनिष्ठ कथाकार मित्र अशोक शुक्ल उसे हाथोंहाथ इन्दौर ले गए और प्रभु जोशी जी को सौंपा। कुछ दिनों बाद सूचना मिली कि वह कार्यक्रम पुरस्कृत हुआ, तो बहुत सन्तुष्टि और थोड़ा सा गौरव भी हुआ कि उसमें बहुत नगण्य ही सही, कुछ अंशदान मेरा भी था।


उस प्रसंग के उपसंहार में एक दिलचस्प बात यह हुई कि पारिश्रमिक की राशि मुझे मिलने में काफ़ी देर हुई, यहां तक कि ज्ञानरंजन जी ने कुछ खिन्नता ज़ाहिर करते हुए प्रभु जी को पत्र भी लिखा। बहरहाल पारिश्रमिक कुछ देर-सबेर सही, मिल गया।


इस बीच मैं आकाशवाणी की सेवा के लिये चुन लिया गया और रायपुर केन्द्र से मेरी आकाशवाणी कथा भी शुरू हो गई। एक-दो वर्षों बाद किसी बैठक के लिये आकाशवाणी, इन्दौर जाने का अवसर आया। वहां मैं ढूंढ़ कर प्रभु जी से मिला और आधिकारिक परिचय की धुंध हटा कर 'अंधेरे में' वाली पहचान याद दिलाई। जब उन्हें याद आ गया, तो वे लपक कर गले मिले, एक ठहाका लगाया और कहा, अब तो आप इस सिस्टम में आ ही गए और यहां का हाल जान ही गए हैं।


इन्दौर केन्द्र मध्य प्रदेश का सबसे पुराना आकाशवाणी केन्द्र तो था ही, सर्वाधिक सर्जनात्मक भी था। स्वतंत्र कुमार ओझा जैसे दिग्गज और गुणी प्रसारक वहां थे, पर आधुनिकता बोध से समृद्ध युवा प्रतिभाओं की जगमगाती टोली भी वहां थी, जिसमें सबसे चमकदार सितारे प्रभु जोशी थे, पर उनके मार्फ़त अन्य लोग जैसे संदीप श्रोत्रिय, राकेश जोशी आदि अनमोल मित्र भी मिले।


उसके बाद के कालखण्ड में प्रभु जोशी की बहुआयामी और लगभग अविश्वसनीय रचनाशीलता से परिचय और संवाद गाढ़ा होता गया। बतौर कथाकार उन्होंने नये प्रतिमान सिरजे थे, तो बतौर चित्रकार वे विश्वव्यापी ख्याति अर्जित कर रहे थे। एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में वे जब जो कुछ कहते-लिखते थे, वह बहुधा विमर्श का केन्द्र हो जाता था। उनमें एक अत्यंत सम्माननीय बात यह थी कि अपनी विराट बौद्धिक उपलब्धियों के बावजूद वे प्रसारण कर्म को पूरी निष्ठा, तन्मयता और रचनात्मक बेचैनी के साथ नवाचारों का अन्वेषण करते हुए निभाते और आगे बढ़ाते थे। उनके बोलने के लहजे में मालवा का प्रकट और प्रत्यक्ष संस्पर्श होता था। ध्वनि माध्यम की अद्भुत सम्भावनायें उन्हें लगातार रोमांचित करती थीं।


हिन्दी के बिगाड़ के ख़िलाफ़ उन्होंने जम कर बोला और लिखा। अपनी पैनी नज़र से इस मामले में भी पाखण्ड रचने वाली बड़ी से बड़ी शख़्सियतों को वे पहचान लेते थे और फिर उनकी बखिया उधेड़ देने में वे ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते थे।


प्रभु जी ने देश- विदेश का ख़ूब पढ़ा था, पढ़ा ही नहीं, पचाया भी था। सभाओं-गोष्ठियों में अपने वक्तव्यों और टिप्पणियों में वे अधुनातन वैश्विक बौद्धिक विमर्श के उद्धरण देते थे और इस बात की क़तई चिन्ता नहीं करते थे कि अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे लोग अपने द्वेष में उन्हें 'स्नॉब' ही क्यों न मान लें। यह साहस वे धारा के विपरीत जाने में भी दिखाते थे और ज़रूरी नहीं कि धारा विपक्षियों की ही हो। समलैंगिक सम्बन्धों के समर्थन के ज्वार के ख़िलाफ़ उन्होंने खुल कर लिखा था। हाल में, फटी जीन्स पहनने को स्त्री मुक्ति या आत्मनिर्णय का प्रतीक मानने की भी उन्होंने डट कर आलोचना की थी और ध्यान दिलाया था कि ये चालू प्रतीक वैश्विक पूंजीवाद की हर चीज़ की तरह नारी अस्मिता को भी बाज़ार की चमकीली और भड़काऊ वस्तु बना देने की मुहिम से उपजे हैं। वे तथाकथित 'पॉलिटिकली इनकरेक्ट' बात कहने से नहीं चूकते थे और भेड़चाल का हिस्सा बनने से इंकार करते थे।


उनसे आख़िरी ढंग की मुलाक़ात 2019 में दिल्ली में आकाशवाणी भवन में हुई। दूरदर्शन से उनकी अवकाशप्राप्ति के बाद शायद फ़ंड वगैरह का कोई लम्बित प्रकरण था, जिसमें सलाह-मशविरे के लिये लीलाधर मण्डलोई जी की सलाह पर वे मेरे पास आए थे। उस प्रसंग में तब जो कुछ किया जाना था, किया गया, पर फिर हमेशा की तरह बातचीत समूची दुनिया की केन्द्रीय चिन्ताओं तक फैल गई। तभी मुझे याद आया कि 'अंधेरे में' का एक नया रेडियो रूपांतर युवा साथी विनोद कुमार ने किया था, सो संदेश भेज कर उन्हें भी मैंने अपने कमरे में आमंत्रित कर लिया और इस तरह उस चर्चा का वितान और भी व्यापक और समावेशी हो गया।


प्रभु जोशी जी से फ़ोन पर बातचीत बहुत नियमित तो नहीं पर कभी-कभी होती रहती थी। पिछले साल आकाशवाणी और दूरदर्शन के ज़्यादातर पुराने पर कुछ वर्तमान भी साथियों का एक Whatsapp समूह बना, जो बाद में कुछ खीझ और कुछ ऊब कर मैंने छोड़ दिया, पर जितने दिन उसमें रहा, उसमें जिन लोगों की posts पढ़ना एक समृद्धिकारक अनुभव होता था, उनमें लगभग शीर्ष पर प्रभु जोशी ही होते थे, जो बताते थे कि नौकरशाही के जड़ शिकंजों के बीच सर्जनात्मक स्वाभिमान की लड़ाइयां उन्होंने कैसे लड़ी और कई बार जीती थीं।


उनसे प्राप्त कुछ चित्र अनुकृतियां पास हैं, बीते अप्रैल की 8 तारीख़ तक की कुछ टिप्पणियां, जिन्हें Whatsapp पर साझा करने लायक लोगों में गिनने का मान मुझे भी उन्होंने दिया। अलविदा, अग्रज। आपकी विरासत दुनिया को उत्कंठा और रंग बख्शती रहेगी।

*राजीव कुमार शुक्ला*


 *प्रभु जी कईयों के आश्रयदाता*

मैं निजी दुख को सोशल मीडिया में उजागर करना सामान्यतः पसन्द नहीं करता। मगर कभी कभी जब दुख अकेले नहीं सम्भलते ,करना पड़ता है।

विख्यात कथाकार,

उपन्यासकार जिन्होंने अपनी कथाओं ,

उपन्यासों में 'मालवी' बोली की सुंदर छटाएं बिखेरीं ।

जिन्होंने अपनी पेंटिंग्स में, महलों के बदले, अब गिरे कि तब गिरे -जैसे घरों को चित्रित किया। कथाओं में फूल-पत्ती के बदले ग़रीब-गुरबा को जगह दी। जो ख़ुद तमाम ख्याति और राष्ट्रीय,

अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़े जाने के बाद भी संघर्षशील मध्यमवर्गीय जीवन ही जिये और सतत छटपटाये से एक स्कूटर में घूमते रहे। 

प्रभु दा -अब तक पंच तत्वों में मिल कर अपने हज़ारों चाहने वालों के आंसुओं में बह रहे होंगे या हमेशा जैसे हंस रहे होंगे।

मेरे जैसे कइयों के आश्रयदाता, बन्धु सम, अग्रज सम,प्रभु जोशी को अशेष श्रद्धांजलि।

*अशोक मिश्रा*