breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये कैसी धर्म संसद

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये कैसी धर्म संसद

- सुभाष मिश्र
एक मशहूर मुहावरा है मजबूरी का नाम गांधी! यह मुहावरा कैसे बना और कैसे विकसित हुआ इसका समाजशास्त्रीय और राजनीतिक विश्लेषण जरुरी है लेकिन इसका अर्थ सत्ता की वादाखिलाफ़ी को ढंकने का जरिया बनता चला गया, लेकिन विगत सात सालों में नई दिल्ली में पदासीन मोदी सरकार के आने के बाद यह मुहावरा मजबूरी का नाम गांधी सरकार की नाकामयाबी को ढंकने का अस्त्र नहीं रहा और इस मुहावरे ने एक कारगर और हिंसात्मक रूप ले लिया है। बल्कि कहा जा सकता है कि ये मुहावरा विमर्श का विषय नहीं रहा है! गांधी, नेहरू, पटेल की विचारधारा में जो एक संश्लिष्ट और सबको लेकर चलने की जो बात है, वो अब इस सत्ता को नहीं चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा उनके मंत्री, सांसद, विधायक और हिंदुत्ववादी संगठनों से संबंद्घ  कार्यकर्तागण और धार्मिक साधु-संतों ने गांधी और नेहरू को निशाना बनाया। गांधी तो इनके लिए महात्मा भी नहीं रहे बल्कि इनके बरक्स महात्मा गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे का महिमा मंडन किया जा रहा है और गांधीजी को सार्वजनिक मंचों से अपमानित किया जा रहा है।

हरिद्वार के धर्म संसद की तजऱ् पर ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रावणभाठा ग्राउंड में आयोजित धर्म संसद में गांधीजी को गाली दी गई। अपशब्दों और वाक्यों से इनकी भत्र्सना की गई और गांधीजी के हत्यारे गोडसे का अभिनंदन भी किया गया। महाराष्ट्र से अवतरित एक साधु कालीचरण ने गांधी को धर्मसंसद में अपमानित किया और फिर हंगामा और बवाल होना तय था।

रायपुर में पूरे तामझाम के साथ धर्म संसद का आयोजन किया गया। कहा यह गया कि धर्म की रक्षा के लिए ये आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई नेता बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते नजर आ रहे थे, लेकिन रविवार को इस आयोजन में एक कथित संत कालीचरण दास ने ऐसा जहर घोला कि इसके आयोजक भी हैरान रह गए। मंच पर मौजूद कुछ साधु-संत भी अवाक रह गए। हमने पड़ताल करने की कोशिश की कि ये धर्म संसद क्या होती है? इसे आहूत करने का अधिकार किसके पास है तो कई संतों ने कहा कि धर्म संसद शंकराचार्य और विभिन्न अखाड़ों के महंत, रामानंदचार्य जैसे बड़े धर्म गुरुओं की उपस्थिति में आयोजित होती है। इसमें धर्म के विषय पर बात होती है। इसे कोई सरकार या पार्टी आयोजित नहीं कर सकती। अब रायपुर धर्म संसद के नाम पर सम्मेलन तो आयोजित करा दिया गया लेकिन यहां से राष्ट्र को एकजुट करने वाला कोई संदेश जाता इसकी बजाय समाज को तोडऩे वाला जहर निकलकर सामने आया।

हम इस तरह के कथित संत-बाबाओं के बयानों को तरजीह नहीं देते पर बड़ा सवाल यह है कि आखिर हमारे राजनेताओं को क्यों इस तरह के आयोजनों की जरूरत पड़ रही है। अक्सर भाजपा धार्मिक आयोजन और सियासत को जोड़कर काम करती रही है। हाल ही में हमने इसका नजारा बनारस में देखा, जहां पीएम मोदी विभिन्न मंदिरों में माथा टेकते हुए प्रधानमंत्री के बजाय एक तरह धार्मिक नेता के रूप में ज्यादा नजर आ रहे थे। मानो वे इस मामले में अपने सहयोगी यूपी के सीएम योगी को पीछे छोडऩे की होड़ लगा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस को इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी। जिस कांग्रेस के पास नेहरू की विरासत है, वो आज इतनी कमजोर हो चली कि उसे इस तरह के आयोजनों का हिस्सा बनना पड़ रहा है। अपने आप में ये बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस इस तरह भाजपा के बिछाये जाल में तो नहीं फंस रही है। खैर, इस पर विचार करने का काम कांग्रेस के रणनीतिकारों का है।

रायपुर में आयोजित धर्म संसद के मुख्य आयोजक कांग्रेस के विधायक, गौसेवक आयोग के अध्यक्ष महंत रामसुंदर दास थे। क्या महंत रामसुंदर दास नहीं जानते कि अभी थोड़े दिन पहले ही हरिद्वार की धर्म संसद में साधु-संतों ने किस तरह का धार्मिक उन्माद फैलाने वाला भाषण दिया? उन्होंने मंच में एक समुदाय को मार देने का आह्वान किया। देश के 76 वकीलों ने ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर करने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस घटना पर भाजपा की चुप्पी का जिक्र करते कहा है कि ऐसी हिंसात्मक बातें बर्दाश्त नहीं की जायेगी। समाज में उत्तेजना फैलाने वालों के खिलाफ कार्यवाही होगी। यहां सवाल यह भी है कि जिस धर्म संसद में गांधीजी के खिलाफ अपशब्द कहे गये वहां से केवल महंत रामसुंदर दास ही उठकर गये बाकी साधु-संत चुप बैठे रहे। सवाल यह भी है कि कांग्रेस को भाजपा बनने की जरूरत क्या है? उसे अपना जनेऊ दिखाने की क्या जरूरत है? आज धर्म के नाम पर इस तरह की उत्तेजनापूर्ण बातें करने वालों की वाहवाही, स्वागत-सत्कार करने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोगों को यदि जेल भेज भी दिया जाता है तो लौटने पर किसी विजेता की तरह इनका स्वागत सत्कार होता है। धार्मिक उन्माद के चलते लोगों में एक तरह का पागलपन मुखर हो रहा है। समाज में कानून का संविधान राज कैसे कायम हो यह आज की सबसे बड़ी चुनौती है। आज अधिकांश राजनीतिक पार्टियां धर्म की ध्वजा को पकड़कर अपनी चुनाव रूपी वैतरणी पार करना चाहती है। पिछले कुछ दशकों में साम्राज्यवादी ताकतों और समाज के ताकतवर तबके में राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए धर्म के दुरुपयोग की प्रवृति बढ़ी है।

आखिर क्यों बापू को सब समझ लेते हैं सॉफ्ट टारगेट और ऐसा करके हम अपना और इस देश का क्या नुकसान करते हैं, इसका अंदाजा भी लोगों को नहीं है। पूरी दुनिया में भारत की सबसे सर्वमान्य पहचान है महात्मा गांधी। जिनके दिखाये अहिंसा और मानवता की राह पर चलकर दुनिया भर के कई देशों ने अपने संघर्ष को नया आयाम दिया। जिन्होंने मानवता, समानता को सबसे ऊपर रखा। आखिर उन पर ही क्यों हमारे देश में स्तरहीन बातें कई बार कही जाती है जबकि उनके कामों की सराहना वे भी करते हैं जिनके खिलाफ उन्होंने संघर्ष में अपना पूरा जीवन खपा दिया। हम अपने देश में भले किसी भी विचार के मानने वाले हों, किसी भी नेता या ऐतिहासिक पुरुष को अपना आदर्श मानते हों लेकिन जब अंतर्राष्ट्रीय मंच की बात आती है तब हम गर्व से कहते हैं कि हम महात्मा गांधी के देश से आए हैं। हमारे यहां आने वाले बड़े से बड़े राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जब तक वो बापू से जुड़े किसी स्थल पर न जाए। बाहर गांधी के साथ लेकिन घर में गोडसे की गोद में बैठकर हम दुनिया को क्या संदेश दे रहे हैं? देश की क्या छबि गढ़ रहे हैं? इसका अंदाजा लगाने या इसकी जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा इन कथित बाबाओं से नहीं कर सकते।

साठ साल पहले भी गांधी की आलोचना होती रही है और अब भी होना चाहिए लेकिन उनको अपशब्द कहना और बिल्कुल खारिज कर देना बेईमानी ही नहीं बल्कि राजनीतिक साजिश है। जिसे धर्म-संसद के आयोजनों से ऐसे संतों और लोगों को नैतिक शक्ति मिलती है। अगर रायपुर में इसका विरोध भी एक दूसरे संत-महंत रामसुंदर दास ने किया तो प्रशंसनीय है लेकिन हरिद्वार धर्म-संसद के हंगामे के बाद तो प्रशासन को रायपुर में धर्म संसद के आयोजन की प्रशासनिक स्वीकृति नहीं देना चाहिए था। छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल आमंत्रण के बावजूद धर्म संसद से दूर रहे, अनुकरणीय और प्रशंसनीय है।

महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता के सबसे अग्रणी नेताओं में एक थे। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए देश को आज़ादी दिलाई। वे केवल एक नेता ही नहीं बल्कि वे एक निष्काम कर्मयोगी संत थे। वे युगपुरुष हैं और उनको अपमानित करना राष्ट्र के गौरव को अपमानित करना है और एक जघन्य अपराध है। वैचारिकी विभिन्नता के गांधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका और अवदान को राष्ट्रीय परिदृश्य से परे रखना भी अपमान है।

मैं वंशानुगत गुणों के प्रभाव पर विश्वास रखता हूँ, और मेरा जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ है इसलिए मैं हिन्दू हूं। अगर मुझे यह अपने नैतिक बोध या आध्यात्मिक विकास के विरुद्ध लगे तो मैं इसे छोड़ दूंगा। इसके अनुयायी को आत्माभिव्यक्ति का अधिक से अधिक अवसर मिलता है। हिन्दू-धर्म वर्जनशील नहीं है, अत: इसके अनुयायी न सिर्फ दूसरे धर्मों का आदर कर सकते हैं बल्कि वे सभी धर्मों की अच्छी बातों को पसंद कर सकते हैं और अपना सकते हैं। अहिंसा सभी धर्मों में है मगर हिन्दू धर्म में इसकी उच्चतम अभिव्यक्ति और प्रयोग हुआ है। (मैं जैन और बौद्ध धर्मों को हिन्दू-धर्म से अलग नहीं गिनता)।

हिन्दू धर्म कोई वर्जनील धर्म नहीं है। उसमें दुनिया के सभी नबियों और पैगम्बरों को पूजा के लिए स्थान है। वह साधारण अर्थों में प्रचार का ध्येय रखने वाला धर्म नहीं है। इसके अंचल में कई जातियां समा गई है, लेकिन यह विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह और अदृश्य रूप से हुआ है। हिन्दू धर्म सभी लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार ईश्वर को उपासना करने को कहता है और इसलिए इसका किसी धर्म से कोई झगड़ा नहीं है।

मेरी देशभक्ति और कुछ नहीं, अपनी चीर-मुक्तिऔर शांति लोक की मंजिल का विश्राम स्थान है। इतना मालूम हो जाता है कि मेरे समीप धर्म शून्य राजनीति कोई वस्तु नहीं है। राजनीति धर्म की अनुचरी है। धर्म ही राजनीति को एक फांसी ही समझा जाये। क्योंकि उससे आत्मा मर जाती है। आत्मरक्षा का सबसे अच्छा और चिरस्थाई साधन है आत्म शुद्धि। मैं इन मिथ्या, भयों से डरने वाला नहीं हूं।

गांधी की राष्ट्रीय, राष्ट्र की सार्वभौमिक और भौगोलिक परिकल्पना और विचार में कोई भी जातीय और सांप्रदायिक समुदाय का बहिष्करण नहीं है अपितु आत्मीय समवेशिकरण है। गांधीजी महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स महात्मा गांधी से बहुत पहले 1918 में पैदा ले चुके थे और धर्म के अत्यधिक अनुकरण को अफीम के नशे की तरह व्याख्यायित किया है और गांधीजी माक्र्स के विचारों से भिन्न बिल्कुल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए, जब विश्वास अंधा हो जाता है तो मर जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विश्वास कट्टरता में बादल जाता है। गांधी जी से बड़ा कोई हिन्दू आधुनिक भारत में दिखाई नहीं देता है लेकिन धार्मिक कट्टरता की जगह उनके धार्मिक दृष्टिकोण में नहीं है वर्ण सीमन गांधी जैसे मुस्लिम परिवार में जन्मे उनके शिष्य नहीं बनते।

धार्मिक होना कोई अपराध नहीं है लेकिन धर्म को सत्ता का माध्यम मानकर एक संप्रदाय को दूसरे संप्रदाय के खिलाफ करना गांधीजी की दृष्टि में धर्म नहीं है। गांधी जी की हत्या के बाद निर्मित देश हिंदुस्तान में हमारे नवनिर्वाचित सरकारों ने राष्ट्रपिता के विचारों को भुला दिया। सिर्फ उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उनको स्मरण कर खानापूर्ति भर करते हैं।

जो राष्ट्र अपने सपूतों और महापुरुषों को याद नहीं करता और उनके नागरिकों को उनके योगदान और अवदान से परिचित नहीं कराता, वैचारिक और नैतिक रूप से उस राष्ट्र की अवनति इसी तरह से होती है जिस तरह से अभी हो रही है। वर्तमान सरकार विगत के सरकारों से वैचारिक रूप से भिन्न है, जिसे गांधी, नेहरू, भगत सिंह के समवेशी समाज से न सरोकार है और न दरकार है। व्हाट्सएप ने फ़ेक विसविद्यालय की स्थापना की है और इतिहास को नए सिरे से आज की पीढ़ी को ज्ञान बाँट रही है। पोस्ट ट्रूथ (में ये सब ग्रहणीय है!) विगत की सरकारें गांधी-नेहरू-पटेल-भगत सिंह की वैचारिकी धरोहर को लिब्रल इकॉनामी की तेज़ रफ्तार ने विस्मृत कर दिया और मोदी सरकार के खेलने के लिए पिच तैयार कर दिया है।

छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का धर्म-संसद में न जाना उनके धर्म-निरपेक्षता के शासकीय चरित्र का उद्दात उदाहरण है लेकिन धर्म-संसद जैसे आयोजन को राजधानी में सम्पन्न होने में उनकी प्रशासनिक व्यवस्था का नाकाम होना भी एक उदाहरण माना जाएगा।
प्रसंगवश मित्र गिरीश पंकज की कविता-
साधु है शैतान हमारी बस्ती में
लुच्चे हैं भगवान हमारी बस्ती में
आम आदमी तुम भला कैसे यहां
बसते सभी महान हमारी बस्ती में
चोला पहने धर्म-कर्म का डोल रहे
जहरीले हैवान हमारी बस्ती में
रंगों में बंट गए यहां अब धर्म सभी
है ईश्वर हैरान हमारी बस्ती में
नकली हैं वे धर्मगुरु जो बांट रहे
विषपाई कुछ ज्ञान हमारी बस्ती में।।