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पुस्तक समीक्षाः मन का मौसम - रवि तिवारी

पुस्तक समीक्षाः मन का मौसम - रवि तिवारी

सुभाष मिश्र 

मन की निश्चल अभिव्य़क्ति, मन का मौसम दरअसल रवि तिवारी की जीवन यात्रा में अब तक आये बहुत से अनुभव का संचयन है। वे सरल, बोलचाल की भाषा में अपने अनुभव को साझा करते हैं। रवि अपने आसपास जो कुछ घटित होते देखते हैं उन्हें बिना लयछंद की परवाह किए व्यक्त करते हैं। दरअसल मन बहुत बावरा होता है, मन बैचेन होता है, और मन अपने भावों को व्यक्त की करना चाहता है। एक संवेदनशील कविता बिना लाग लपेट भाषाई जादू के अपने मन की बातों को अपने लेखन से व्यक्त करता है। इधर के दिनों में यह सुविधा हो गई कि हम जो कुछ सोचते हैं गढ़ते हैं, उसे सोशल मीडिया के जरिए तत्काल अभिव्यक्त कर देते हैं। रवि तिवारी बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। एक बड़ी सीमेंट कंपनी के अधिकारी होने के साथ ही वे राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आते हैं। फिल्मों में अभिनय से, सामाजिक गतिविधियों से भी गहरा जुड़ाव रखते है। रवि तिवारी की कविता एक आम आदमी को सीधे संप्रेषित होती है। वे किसी अमिधा, व्यंजना या इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करते, जिसके लिए पाठक को कविता का पुर्नपाठ करना पड़े। रवि,साहित्यकार या पत्रकार नहीं है फिर उनके कविता पढ़कर मन खुश हो जाता है। रवि के मन का मौसम अनुकूल रखने में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उनकी जीवन संगनी का भी बड़ा योगदान है। कहा भी गया है कि मन चंगा तो कटौती में गंगा।

रवि अपने मन की बात साझा करते हुए अपनी बात कुछ इस तरह से कहते हैं -

दिल में वही बसते हैं, जो मन को भाते हैं

मन बहुत चंचल है, होता है बहुत भोला

कभी जाता है बहक, हो जाता है गुमराह

खा जाता है धोखा।

दरअसल रवि अपने व्यवसायिक गतिविधियों में सीमेंट उद्योग से जुड़े हुए हैं जहां पत्थरों को महीन करके उनसे पक्की नींव और मजबूत मकान बनाने का काम होता है। वे अपने काम के सिलसिले में और स्वभावगत यायावर भी हैं, जिसकी झलक उनके लेखन में साफ दिखाई देती है। प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल ने किसी समय कहा था कि हर व्यक्ति  को अपने जीवन में एक किताब अवश्य लिखनी चाहिए। शुक्ल जी के इस हर व्यक्ति में रवि तिवारी भी शामिल हैं जिन्होंने ' मन का मौसम ' के रूप में हिंदी साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। मन का मौसम 300 पृष्ठ का संग्रह है, जिसमें 150 कविताएं संग्रहित है। यह एक तरह से रवि तिवारी के जीवन का निचोड़ है। उन्होंने मन का मौसम में अपने मन के भीतर चलने वाले झंझवातों को लिपिबद्ध किया है।

रवि तिवारी ने कविताओं के जरिए जीवन के हर पहलू को खूबसूरती से संजोया है। इस कविता संग्रह में मौसम, भारत के जवान, ईश्वर, पत्रकार, कोरोना, प्रधानमंत्री, लॉकडाउन, सफलता का मंत्र, दिन रात, दर्दे दिल, अनुशासन, देश की व्यथा, इंसानियत, आदत, मोबाइल, पार्टी के साथ साथ काढ़ा की विधि भी बताई गई है। संक्षेप में कहा जाए तो जीवन में जितने भी तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों, आंखों देखी खबरे सभी का उल्लेख है रवि तिवारी के मन की मौसम में है।

रवि तिवारी की कविता रायपुरियंस की कविता है, जो पूरे रायपुर से आपका साक्षात्कार कराती हो। इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा एहसास होता है कि पुराने रायपुर की गलियों और सड़कों पर होकर घूम रहे हैं। कविता में भूली बिसरी यादें ताजा हो जाती हैं जैसे - चाय का ठेला, बनारस के पान, फाफड़ा, बूढ़ातालाब आदि।

रायपुर की शान

उसकी अपनी पहचान

रही है एकदम निराली

कभी ना भुलाई जाने

ली यादगार कहानी

जिसने भी गुजारा है

 यहाँ अपना बचपन ..

रवि सिस्टम से बाहर रहते हुए भी सिस्टम का हिस्सा हैं। वे बखूबी जानते हैं कि ये सिस्टम किस तरह से काम करता है। काम के लिए एनओसी कैसे मिलती है। इसलिए उनकी कविता ईमानदार हाजिर हो, में ईश्वर और ईमानदार के बीच जो संवाद कायम किया गया है वह गजब का है।

यहां कवि ईश्वर से सवाल पूछता है कि- क्या ईमानदार आदमी होता है कमजोर तुम्हारी तरह?

नहीं, मैं कमजोर नहीं हूं आंतरिक शक्तिशाली हूं न झुकता हूं न टूटता हूं न ही डरता हूं किसी से।

दरअसल, हमारे समय का ये सच भी है कि एक ईमानदार आदमी पूरे तंत्र में अपने आपको मिस फिट पाता इसलिए कई बार इसके हाथ हताशा लगती है। फिर वो खुद को समझाईश देता है और कहता है सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं।

रवि अपनी अनुभव जनित अभिव्यक्ति को अपने पास उपलब्ध शब्द सामर्थ से यथासंभव व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। जो उनके पाठकों तक सीधे संप्रेषित होती है। इस बाजार समय में जहां हर चीज बिकने के लिए तैयार फिर वे चाहे जनता के वोटों से चुनाव जनसेवक ही क्यों न हो ये सब देखकर उनहें पीड़ा होती है। वे अपनी पीड़ा, चिंता और छटपटाहट को अपनी अभिव्यक्ति को माध्यम  बनाते हैं।

रवि अपने मजबूत इरादों और अपने मन में उठने वाले बहुत से सवालों का खुद से खुद जवाब देते हुए कहते हैं कि

- संकल्प मन में जरूरी है, जीवन की राह बदल देने को

यदि रखें इरादें मजबूत तो क्या नहीं हो सकता?

दरअसल, यहां रवि दुष्यंत कुमार की याद दिलाते हैं और हमें अनायास ये शेर याद आ जाता है।

कैसे आकाश में सुराख हो सकता नहीं

एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों