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व्यंग्य: किस्सा एक कहानी का - अखतर अली

व्यंग्य: किस्सा एक कहानी का - अखतर अली


मैं एक कहानी सुनाना चाहता हूं |

सब से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि कोई भी कहानी न तो पूरी तरह झूठ होती है न पूरी कि पूरी सच होती है | थोड़े से सच में बहुत सारा झूठ मिलाकर कहानी तैयार की जाती है | सच के ख़मीर से झूठ का कथानक तैयार होता है | हर कहानी का एक समय होता है और हर समय की एक कहानी होती है |

यह उस लड़की की कहानी नहीं है जो थी तो मीठी लेकिन लोगो ने उसे देख देख कर नमकीन कर दिया | यह उन आंखो की भी कहानी नहीं है जिन आंखो को लोग ट्रेक्टर कहते है और उस पर इल्ज़ाम लगाते है कि उसकी आंखे जवानी को खोदती रहती है | यह उस नौजवान की कहानी भी नहीं है जिसकी बैंक की बुक में अंक नहीं है और प्रेम की बुक में शब्द नहीं है |

जी क्या कहा ....... नहीं नहीं यह उस हवेली की दास्तां नहीं है जहां खिड़की से इश्क का कारोबार चलता था और न ही यह उस समंदर की कथा है जिसमें एक लहर दूसरी लहर से पूछती है कि तीसरी लहर क्या है ? यह उस समाचार पत्र की कहानी नहीं है जिसे फुल पेज का विज्ञापन मिल जाये तो वह कहानी और कविता को निरस्त कर देता है | अरे नहीं नहीं यह उस हसीन चेहरे की कहानी नहीं है नकाब में दब कर जिसका दम घुट रहा है |

यह उस नजूमी की दास्तां नहीं है जो सुबह से दोपहर बना रहा था और शाम हो गई , दोपहर तो बनी नहीं सुबह भी हाथ से गई | यह उदास मन , सूखे मौसम , पीली घास , सुस्त घोड़े और तेज़ औरतो की कहानी नहीं है | यह उन बूढों की कहानी नहीं है जिन्होंने जवानी में कुछ नहीं किया और न ही यह उन जवानो की कहानी है जिन्हें बुढ़ापे का खौफ़ नहीं | यह उनकी कहानी नहीं है जिन्हें होश में यादे ख़ुदा न रही और जोश में खौफे ख़ुदा न रहा | उन लोगो की कहानी तो है ही नहीं जो साहिल पे खड़े होकर तूफ़ा का नज़ारा देखते है |

यह एक ऐसी घटना की कहानी है जिसमें वाकया तो इत्तू सा है लेकिन विवरण घनेरा है | यह कोई ऐसी कहानी नहीं है जो आरंभ होते ही खत्म हो जाये और न ही ऐसी कहानी है जो एक बार शुरू हो जाये तो फिर खत्म होने का नाम ही न ले | यह एक ऐसी कहानी है जिसका जहां समापन होगा वहां से अनेक कथाए आरंभ होगी | इसका कथ्य उतना अच्छा नहीं है जितना अच्छा इसका शिल्प है | नरेशन ज़्यादा लग सकते है लेकिन नरेशन भी कथा साहित्य के अंदर की चीज़ है कहानी के बाहर का सामान नहीं |

अब मै कहानी आरंभ करता हूं ..... जी श्रीमान क्या कहा आप समझ गए मै किसकी कहानी सुना रहा हूं ? नहीं नहीं यह उन अफसरों की कहानी नहीं है जो आफ़िस इसलिये आते है क्योकि डाक्टर ने उन्हें आराम करने के लिए कहा है और न ही उन पतियों की है जो घर के काम भी आफ़िस में करते है | देखिये महोदय आप इतनी ज़ोर से मत चिल्लाइये यह नाज़ुक कहानी है हाथ से छूट कर गिर गई तो टूट कर चूरा चूरा हो जायेगी | इसकी किर्ची किर्ची बिखर जायेगी | अरे नहीं जनाब यह पुरानी तस्वीर की नई प्रिंट नहीं है | इसमें रहस्य , रोमांस , एक्शन सब है |

क्या फ़रमाया इसे फ़िल्म निर्देशक को सुनाऊ इस पर अच्छी फ़िल्म बन सकती है ? ऐसा है श्रीमान अच्छी कहानी और अच्छी फ़िल्म का आपस में कोई संबंध नहीं होता | अक्सर अच्छी कहानी पर फ्लाप फ़िल्म और वाहियात कहानी पर हिट फिल्मे बनी है | फ़िल्म कहानी के भरोसे नहीं चलती यह तकनीक और प्रस्तुतिकरण का माध्यम है | यहां खोटे सिक्के हिट और धन दौलत फ़्लाप है |

मेरी कहानी एक ऐसी कहानी है जो ज़रा भी कहानी नहीं लगेगी जबकि है पूरी की पूरी कहानी | हर एक कहानी में घटना की जांच होती है मेरी कहानी में जांच ही एक घटना है | मै एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूं यह किसी के समर्थन या विरोध में दिया गया बयान नहीं है | इसमें न क्रोध है , न इर्ष्या है , न बदला | यह किसी देश की कहानी नहीं है यह समूची पृथ्वी की कहानी है | यह किसी व्यक्ति की कहानी नहीं है यह समूची मानवता की कहानी है |

यह उस आहत व्यक्ति की कहानी नहीं है जो अपने दुश्मन की बर्बादी की दुआ मांगते हुए कह रहा है – हे भगवान उस घर में बस एक औरत चिडचिडी दे दे | यह एक अच्छी औरत की कहानी नहीं है क्योकि अच्छी औरत की कोई कहानी होती ही नहीं | यह बुरी औरत की भी कहानी नहीं है क्योकि किसी भले आदमी में इतना साहस नहीं कि वह ज़माने को किसी बुरी औरत की कहानी सुना सके | यह उस शिक्षक की कहानी भी नहीं है जिसकी कक्षा में कोई छात्र पल भर के लिए भी नहीं सो सकता क्योकि वह खुद इतने जोर से खर्राटे लेते है कि कोई और कैसे सोये ?

मै अपनी तरफ़ से तो कहानी को ठोक ठोक कर तैयार किया हूं | इतनी ठोक ठोक से ये कितनी ठीक और कितनी ठाक हुई है यह तो ठीक ठीक से आप पाठक या श्रोता ही बता सकते है | मै इतना जानता हूं कि भले मेरी कहानी का क्षेत्रफल छोटा हो एकता है लेकिन इसका आयतन ज़बरदस्त है , व्यंग्य इसका वर्गमूल है | मेरी कहानी का जन्म किसी अन्य क्लासिकल कहानी की पसली से नहीं हुआ है | यह मेरी अपनी भोगी गई पीड़ा है |

यह एक गरीब किसान की कहानी नहीं है क्योकि अब कहानी के किसान ने भी गरीब होने से इंकार कर दिया है | उसने साफ़ साफ़ कह दिया है अब हमें गरीब , बेचारा , लाचार समझने की गलती न करना | यह बदनसीब लड़की की कहानी तो हो ही नहीं सकती क्योकि अब वह दिन गये जब लडकियां बदनसीब हुआ करती थी | अब तो लड़की शिक्षित है वह व्यवसाय करती है , नौकरी करती है , देश के लिए मैडल जीतती है |


मेरी कहानी में लड़की नहीं है | लड़की हो तो लोग सवालो की झड़ी लगा देते है | पहला सवाल लड़की सुंदर है क्या ? भाई साहब मेरी अपनी मान्यता है कि लड़की का लड़की होना ही कुदरत की इतनी सुंदर बात है कि उसमें अतिरिक्त सुंदरता तलाशना उचित नहीं | फिर पूछते है रंग कैसा है , लंबाई कितनी है , कहां तक पढ़ी है , व्यवहार कैसा है , पारिवारिक पृष्ठभूमि कैसी है , मेरे बेटे के लिए बात चलाओ | माताए बहू की तलाश में कहानियों में भी घुसने लगी है |

यह उन लड़कों की कहानी नहीं है जो डाक्टर , इंजीनियर और सी. ए. बनने के लिये मेहनत कर रहे है और न ही उन लड़कियों की कहानी है जो इनके डाक्टर , इंजीनियर और सी. ए. बनने का इंतेज़ार कर रही है | यह उन आशिकों की कहानी नहीं है जो पलकों में सितारे लिए राहों में खड़े है और न ही यह ज़मीन के उन दलालों की कहानी है जो किसी की ज़मीन किसी की बता कर किसी को बेच रहे है | फिर भी यह उत्तेजक घटनाओं की स्पाइसी कहानी है |

कल्पना के प्लाट पर जो कहानी की ईमारत खड़ी हुई है इसमें रिश्तो के रौशनदान है , मोहब्बत की खिड़किया है , त्याग की छत है , ज्ञान का मुख्य द्धार है | इस कहानी के निर्माण में उच्च स्तर का राँ मटेरियल इस्तेमाल किया गया है , सड़क निर्माण की तरह कथा निर्माण नहीं हुआ है | कहानी के शरीर पर कही भी सफ़ेद दाग के निशान नहीं है | पूरी रचना में निकासी की तरफ़ ही ढ़लान बनाई गई है |

लगता है मैं आज कहानी कह नहीं पाउगा | होता है कभी कभी ऐसा भी होता है जब बहुत कोशिशों के बाद भी ढंग की रचना बन नहीं पाती है | न ठीक से दृश्य बनते है , न प्रभावशाली भाषा तैयार होती है , न सही तरीके से पात्रों का चरित्र चित्रण ही हो पाता है | कहानी अकहानी होती जा रही है और कथन अकथन होता जा रहा है | घोषित अघोषित में तब्दील होते जा रहा है अतः मैं तुरंत कहानी के प्रयास को रोक देता हूं|