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महँगी संसद, महँगे आंदोलन - ध्रुव शुक्ल

महँगी संसद, महँगे आंदोलन - ध्रुव शुक्ल

महात्मा गांधी ने बीती सदी की शुरूआत में चेताया था कि पार्लियामेण्ट लोगों के हाथ में थमाया गया महँगा खिलौना है जो देश को भारी खर्चे में डालता है। संसद शोर मचाने और स्वार्थ साधने की जगह बन जाती है जहाँ लोगों की भलाई की चिंता बहुत कम की जाती है। अब देश में महँगे संसद भवन की नींव रख दी गयी है जहाँ स्वार्थ साधने वालों को और ज़्यादा जगह निकल आएगी। हमारे तथाकथित जन प्रतिनिधि दिनों दिन महँगे और खर्चीले होते जायेंगे। भले ही संसद चले या न चले।

अब तो संसद के विरुद्ध होने वाले आंदोलन भी खूब खर्चीले और महँगे होते जा रहे हैं। जब देश की जीवन प्रणाली से जुड़ी धरती पर पाँव पसारते बाज़ार के खिलाफ होने वाले आंदोलन के बीच ही बाज़ार भर गया है तो ज़मीन को बाज़ार से कैसे बचाया जा सकेगा? संसद के बनाये कानूनों में भी देश की धरती पर बाज़ार भरने की खर्चीली व्यवस्था की गयी है जो देश के स्थानीय साधनों से खेती को दूर ले जायेगी।

इतने साज़ो-सामान से लैस महँगे आंदोलन को देखकर देश के उन करोड़ों लोगों का मन टूट रहा होगा जिन्हें अभी तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सुरक्षा से वंचित रखा गया है। पूस की ठण्डी रातों में अपने छोटे-छोटे खेतों पर ठिठुरते करोड़ों किसान अपने आंदोलन के लिए इतनी रजाइयाँ और कम्बल कैसे जुटायेंगे?  वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इतना महँगा आंदोलन कभी कर ही नहीं पायेंगे।

देश में होने वाले महँगे आंदोलनों को हिंदुस्तान, पाकिस्तान और खालिस्तान की बेहूदी बहस में उलझाकर हमारे राजनीतिक दल अपनी रोटियाँ तो सेक लेते हैं पर इससे देश के साधनहीन जनों की रोटी की चिंंता दूर नहीं होती बल्कि इन मतान्ध झगड़ों के बीच भारत की अस्मिता भी खतरे में पड़ जाती है।

कोई भी राजनीतिक दल भारत के बहुरंगी जीवन की उस वीणा को नहीं साध पा रहा है जिसमें सातों सुर लगते हैं। सब अपना ढोल पीट रहे हैं,गला फाड़ रहे हैं और जन-मन को अशान्त रखकर आपस में देश के धन और साधन पर अपना अधिकार जमाये रखना चाहते हैं। वे ऊँचे दामों पर बिकने को भी तैयार रहते हैं। उन्हें केवल अपना स्वार्थ साधना आता है, देश के जीवन का सुर साधने की योग्यता उनमें नहीं है।

हम भारत के लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि देश की इस असाध्य वीणा को कौन साधे। क्या हम अपने बीच से नये सुर-साधक नहीं खोज सकते?