प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हाथरस की नई पहचान हास्य नहीं दरिंदगी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हाथरस की नई पहचान हास्य नहीं दरिंदगी


कभी काका हाथरसी के हल्के-फुल्के चुटीले व्यंग्यों, कविता के लिए जाने जाना वाला हाथरस इधर अपनी दरिंदगी के लिए सुर्खियों में है। हाथरस के दबंगों ने एक दलित लड़की से ना केवल बलात्कार किया बल्कि उसकी जीभ काटी, हड्डियां तोड़ी और उसे मरने छोड़ दिया। जब दिल्ली की निर्भया की तरह हाथरस की इस मासूम की जान चली गई और हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा हुआ तो अचानक से महिलाओं की अस्मिता के लिए चिंतित सरकार के कारिन्दे चार दिन बाद जागे और घटना को अंजाम देने वाले चार आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा।

अभी हाल में हमने सोशल मीडिया के जरिये बिटिया दिवस पर बेटियों के लिए खूब कसीदे पढ़े और बेटियों की खूब बात की मगर हमारा सामाजिक नजरिया, जमीनी हकीकत बेटियों को लेकर कैसा है, इस तरह की घटनाएं उसका उदाहरण है।'


हमारे समाज में लड़की होना, दलित होना, गरीब होना ये एक तरह का अभिशाप है। निर्भया और हैदराबाद की डॉक्टर के साथ हुई हैवानियत की घटना के बाद उपजे जनाक्रोश, कड़े कानूनी प्रावधान के बावजूद इस तरह की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही है। यह इस बात को भी बताता है कि हम कितना भी सभ्य समाज क्यों न बना लें, हमारे अंदर बैठा पुरुष जो सत्ता का प्रतीक है, वह उसे उकसाता है। सदियों से विकसित सोच का नतीजा यह भी है कि कोई दलित है, तो दबंग को यह अधिकार मिल जाता कि वह उसके साथ किसी भी तरह का सलूक  करे और वह उसके खिलाफ भी ना बोले। यदि लड़की बोलने का साहस करती तो इसके पहले उसकी जुबान काट ली गई। कुछ लोगों के भीतर दबंग, समर्थ और जमींदारी, सामंती मानसिकता की सोच अभी भी कायम है। इन्हें इस बात का घमंड है कि कानून हमारा क्या करेगा? देश को हिलाने वाली तीनों घटनाओं को अंजाम देने वाले दरिंदे कम पढ़े लिखे थे। उन्हे यह लगता है कि हम ऐसा करके छूट जाएंगे। दरअसल, वे बहुत सारी ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं को आये दिन अंजाम देते रहते हैं और उन्हे कोई रोकता, टोकता नहीं है। ऐसे लोगों से लोग कम उलझते हैं। सामान्य दिनों में लोकल पुलिस इनके साथ दिखाई देती है। जब तक ऐसे मामले सुर्खियां नहीं बनते तब तक पुलिस भी हरकत में नहीं आती। हाथरस की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ।  

उत्तर प्रदेश के हाथरस 14 सितंबर को 20 साल की लड़की को चार-पांच लोगों ने एक खेत में उसके गले में दुपट्टा डालकर घसीटा था, फिर उसका रेप किया था। इस दौरान पीडि़ता के साथ इतनी हैवानियत हुई कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई, शरीर में कई जगह फ्रैक्चर आ गए, यहां तक कि हैवानों ने उसकी जीभ तक काट डाली। हाथरस में दरिंदगी की शिकार दलित लड़की की मृत्यु के बाद मचे सियासी बवाल के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की और आरोपियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करने को कहा।  योगी आदित्यनाथ ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए प्रकरण की जांच के लिये विशेष जांच दल का गठन किया गया है।  
पूर्वांचल का एक लोकगीत है-
ओ रे विधाता, बिनती करुं परुं पइयां बारंबार।
अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार।

नई सदी की स्त्री ने इस धारणा को तोड़कर अपने लिए स्वर्ग के द्वार खोलने का साहस किया है। उसने अपने साहस, शिक्षा और अवसर की समानता के जरिये पुरुषवादी उस समाज की उस सोच को जो पुरुषों की लैंगिक श्रेष्ठता को महिमामंडित करती थी, झूठा साबित किया है। नये दौर की आजाद स्त्री भी बहुतों को अच्छी नहीं लगती। कथित संस्कार, शालीनता और परंपरा के नाम पर वो उसे भी जब तक आर्थिक मजबूरी न हो, चारदीवारी में रखना चाहते हैं।

पुरुषवादी सोच के दबंगों को स्त्री की ना समझ में नहीं आती। यदि वह सफेद कॉलर है तो वह इन दरिन्दो की तरह बलात्कार नहीं करता, सिर्फ ऐसे हालात निर्मित करता है जिसमें स्त्री मजबूरी में राजी हो जाये, विवश हो जाए, उसमें समर्पण भाव आ जाए। वह लोभ, लालच, पैसा, पॉवर को इस्तेमाल करके स्त्री को हासिल करना चाहता है। स्त्री को माल या उपभोग की वस्तु समझने वाली मानसिकता उसे बाजार और मीडिया में भुनाने के लिए बहुत से हथकंडे रचती है। हालिया घटना में जब तक सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण में रिया, कंगना, दीपिका नहीं आई तब तक टीआरपी का खेल नहीं जमा। अब रोज इस बहाने स्त्री को बेचा जा रहा है। ग्रामीण परिवेश या कम पढ़े-लिखे लोगों पर तथाकथित दबंग लोग अपनी ताकत दिखाते हैं। महिलाओं से बलात्कार करने वाले पुरुष महिलाओं को सैक्स आब्जेक्ट के रुप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि महिलाओं का काम ही है पुरुषों की शारीरिक जरुररतों को पूरा करना। कई बार ये लोग महिला की इज्जत उतारने, उसे उसकी औकात बताने, उस पर रेप के जरिये अपना गुस्सा निकालने का कृत्य भी करते हैं।  

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तथा उत्तर प्रदेश की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि भारत की एक बेटी का रेप-क़त्ल किया जाता है, तथ्य दबाए जाते हैं और अन्त में उसके परिवार से अंतिम संस्कार का हक़ भी छीन लिया जाता है। गीतकार जावेद अख्तर ने अपनी ट्वीट में लिखा कि यूपी पुलिस ने रेप पीडि़ता के शरीर का रात के ढाई बजे ही उनके परिवार की बिना अनुमति और यहां तक कि बिना मौजूदगी के अंतिम संस्कार कर दिया। इसी तरह की बात बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस घटना पर ट्वीट करते हुए लिखा, हाथरस की पीडि़ता का पहले कुछ वहशियों ने बलात्कार किया और कल पूरे सिस्टम ने बलात्कार किया। फिल्म एक्टर अक्षय कुमार ने ट्वीट किया, गुस्से में हूं और निराश हूं! हाथरस गैंगरेप में ऐसी क्रूरता, ये सब कब रुकेगा? हमारे क़ानून और उनका पालन इतना सख्त होना चाहिए कि सज़ा के बारे में सोचकर ही बलात्कारी डर के मारे कांपने लगे! दोषियों को फ़ांसी दो, बेटियों और बहनों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाओ, कम से कम हम ये कर सकते हैं।  

एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में भारत में महिलाओं के प्रति अपराध 7.3 प्रतिशत बढ़ गए। करीब 31 प्रतिशत मामलों के लिए महिला के किसी ना किसी जानने वाले को ही जिम्मेदार पाया गया।  2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। 2018 में महिलाओं के खिलाफ हुए 3,78,236 अपराधों के मुकाबले 2019 में 4,05,861 अपराध दर्ज किए गए। प्रति एक लाख महिलाओं पर अपराध की दर 62.14 दर्ज की गई, जो 2018 में 58.8 प्रतिशत थी।

2019 में भारत में बलात्कार के कुल 31,755 मामले दर्ज किए गए, यानी औसतन प्रतिदिन 87 मामले। सबसे ज्यादा मामले राजस्थान में दर्ज किए गए (5,997)। उत्तर प्रदेश में 3,065 मामले और मध्य प्रदेश में 2,485 मामले दर्ज किए गए। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में 30.9 प्रतिशत मामलों के आरोपी पति या उसके रिश्तेदार जिम्मेदार पाए गए। कुल मामलों में 21.8 प्रतिशत मामले महिला की मर्यादा को भंग करने के इरादे से किए गए हमले के, 17.9 प्रतिशत अपहरण के और 7.9 प्रतिशत बलात्कार के थे।  
अंत में अनामिका की कविता-
पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है कागज़
बच्चों की फटी कॉपियों का
'चनाजोरगरमÓ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलसुबह अलार्म बजने के बाद !
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फि़ल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !

भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।

देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चींखती हुई चीं-चीं
'दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ।
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।Ó
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!