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जन्मदिन: मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं हमें सच्चा इंसान बनाती हैं

जन्मदिन:  मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं हमें सच्चा इंसान बनाती हैं

विवेक शुक्ल

आज मुंशी प्रेमचंद के नाम पर डॉक्ट्रेट की डिग्रियाँ ली जा रही हैं। प्रेमचंद को हर कोर्स में पढ़ाया जा रहा है। प्रेमचंद का साहित्य हर भाषा में अनुदित हो रहा है। लेकिन क्या नयी पीढ़ी के लेखकों एवं पाठकों द्वारा प्रेमचंद ईमानदारी के साथ आत्मसात किये जा रहे हैं? क्या जो मुंशी प्रेमचंद द्वारा उनके साहित्य में स्थापित किये गये आदर्श मानक हैं उसके साथ समकालीन साहित्य न्याय कर रहा है?

दरअसल ये प्रश्न अत्यंत ही गूढ़ एवं विचारणीय हैं जिसका न्यायोचित उत्तर किसी के पास नहीं। आज आम पाठकों के मध्य प्रेमचंद दो भागों में विभक्त हो चुके हैं। पहला भाग वो जिसमें उन्हें ऊँची जाति से लेकर निचली जाति तक के लोगों ने अपनी जाति का विरोधी घोषित कर रखा है तो वहीं दूसरे भाग में मुंशी प्रेमचंद को गुज़रे जमाने का रचनाकार साबित करने की असफल सी कोशिश नज़र आ रही। दरअसल देखा जाये तो मुंशी प्रेमचंद आज भी एक साहित्यकार के रूप में सामाजिक कुरीतियों के समक्ष बागी तेवर अख़्तियार किये किसी मजबूत स्तंभ की भांति तटस्थ हैं।

इतिहास ने एक अच्छे रचनाकार को यदि दुत्कारा है तो उसे रोली, फूलों के हारों से नवाज़ा भी है। प्रेमचंद के साथ भी कहीं न कहीं ऐसी ही परिस्थिति है। एक सामान्य कायस्थ परिवार में जन्म लेने वाला बालक धनपत जिसकी आरंभिक शिक्षा फ़ारसी भाषा से शुरू होती है और जिसने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू भाषा में लिखने के साथ की हो यदि उसका लेखन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वो स्वतंत्रता से पूर्व के समय में था तो वह लेखक किसी भी राष्ट्र के लिए बहुमूल्य धरोहर से कम नहीं। उनके साहित्य और जिन चरित्रों का उन्होंने चित्रण किया, जिन समस्याओं के बारे में उन्होंने बात की, आज भी हम उनसे उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चाहे वह ग़रीबी हो या जाति के आधार पर भेदभाव, ये चीज़ें आज भी हमारे समाज में हैं और स्थिति बद से बदतर हुई है। ‘होरी’ और ‘धनिया’ अब भी हमारे गाँवों में हैं।

मुंशी प्रेमचंद की आलोचना होती है, होनी भी चाहिए और भरहीक होनी चाहिए क्योंकि वो स्वयं किसी भी विधा को लेकर समस्त मतों को जानने, सुनने और पढ़ने को इच्छुक हुआ करते थे। किंतु समय के साथ आप ही बनते चले गये टेढ़े-मेड़े रास्तों पर चलते हुए हमें मुंशी जी के उन रास्तों की भी कदर करनी होगी जो हमारी सोच से कहीं अधिक पथरीले और दुर्गम थे।

मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी आज के दौर के लिए प्रेरणास्पद है. वे लिखते हैं, 'बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाती थी। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मौलवी ने न जाने कहां से आकर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है।

उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशन कर देने का सबाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएं लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुनकर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर, जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियां दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं, बिखरे हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पांव फूले हुए हैं, कितने तो अपनी जमा-जगह छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आंधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागने वालों में था।

(लेखक प्रख्यात ब्लॉगर हैं)