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हर साल कुछ दिनों की तालाबंदी हो तो जीवन सहज और ज्यादा सुन्दर हो जाएगा

हर साल कुछ दिनों की तालाबंदी हो तो जीवन सहज और ज्यादा सुन्दर हो जाएगा

रायपुर : कोरोना महामारी से बचने देश भर में तालाबंदी कर दी गई, जिसकी वजह से रोबोटिक हो चुकी जिंदगी में अचानक से ब्रेक लग गया। इस दौरान महीने भर अपने ही घरों में कैद ऐसे लोगों से हमारी टीम चर्चा करने पहुंची जिनके हर रोज का एक एक मिनट काम के लिए समर्पित है। ये वो लोग हैं जो देश के भविष्य को गढ़ने में इतना डूब चुके थे की इनके पास खुद के बच्चों तक के लिए टाइम नहीं था। इस एक महीने की तालाबंदी के दौरान किसके जीवन में क्या बदलाव आया इस पर हुई चर्चा।  


लॉकडाउन ने जीना सीखा दिया

दुर्ग  के रूंगटा ग्रुप ऑफ़ कॉलेज की प्राचार्य तृप्ति अग्रवाल ने तालाबंदी का अपना अनुभव बताते हुए कहा की अभी तक हम सभी रोबोट जैसे काम करते जा रहे थे लेकिन इस एक महीने के दौरान अपने आप का आकलन करने का वक़्त मिला। शुरू से ही बड़ी भाग दौड़ भरी जिंदगी रही है, लेकिन लॉक डाउन के दौरान पहली बार परिवार के साथ रहने का मौका मिला। इस दौरान टेक्नीकल चीजें सीखने को मिली है। कॉलेज से लेकर देश भर की सभी जगहों और विदेशों तक भी ऑन लाइन काम करना पड़ा।  जहा तक ऑन लाइन क्लासेस की बात है तो इसमें अभी 50 परसेंट से ज्यादा छात्रों की उपस्थिति नहीं है लेकिन भविष्य के हिसाब से ये तरीका बहुत ज्यादा बेहतर होगा। इसके साथ ही लॉक डाउन के दौरान ऑफिस का काम करने के साथ ही हर रोज एक नई रेसिपी बना रहे है,आज तक किचन में गए नहीं थे लेकिन हर रोज कुछ नया सीखने करने का मौका मिला। इस दौरान सरकार के सभी ने कर्मचारियों की तनख्वाह से कुछ परसेंट काट कार सहायता के लिए उपयोग किया इसमें एक चीज जो देखने को मिली वो ये की भारत भर में लोगों ने जिंदगी को ज्यादा महत्व दिया। लोगों में दूसरों की सहायता के लिए आगे आने का मौका मिला है। लेकिन ये परमानेंट नहीं है सरकार केंद्र ने जन धन खाते में पांच सौ दिए लेकिन ये पर्याप्त नहीं है। जैसे की अमेरिका ने वहां के रहने वालों को 1200 डॉलर दिए, उनको पता है की कोरोना के बाद हमें भुखमरी से नहीं जूझना है। ऐसे ही हमारे यहां भी काम करना होगा।  

तृप्ति अग्रवाल, प्राचार्य रूंगटा ग्रुप ऑफ़ कॉलेज दुर्ग 

जिम्मेदारी बड़ी है लेकिन जो कुछ अधूरा सा लगता था अब सुकून में बदल गया

राजधानी के खम्हारडीह इलाके की थानेदार ममता शर्मा से तालाबंदी के दौरान आये बदलाव पर जब बात की गई तो उन्होंने कहा की पहले से ज्यादा जबावदारी बढ़ गई है, अब कानून व्यवस्था संभालने के साथ ही कोई इलाके में भूंखा न सोने पाए इसका भी ध्यान रखना पद रहा है। चुकी इस इलाके में सरकारी अधिकारीयों का रेसिडेंस होने के साथ ही उद्द्योगपतियों  का भी रहवरसी इलाका है। इसलिए भागादौड़ी भी ज्यादा रहती है , साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता है की घरों में काम करने के लिए कोई लोगों को बुला तो नहीं रहा। अगर ऐसा मामला मिलता है तो उनको रोकने का भी काम करना पड़ रहा है। तालाबंदी के दौरान कोई घर से न नकली इसके लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। इसके साथ ही जहां पहले सबकी अपनी अलग-अलग व्यस्ता रहती थी, वहीं आज घर का काम भी एक साथ मिल कर कर ले रहे हैं। लॉक डाउन के दौरान लोगों को एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय मिला है।