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भारतीय संस्कृति में बुजुर्गियत...

भारतीय संस्कृति में बुजुर्गियत...


अशोक कुमार सिंह 

गौर फरमाने वाली बात है। वैसे तो बात बहुत ही साधारण सी है पर अच्छा संदेश निहित है।हमारी पहचान को पूर्णतया परिभाषित करती है। इस कोरोना महामारी के प्रकोप से बचाव में पूरी दुनिया जुटी हुई है और प्रयासरत है।इस दिशा में पहल करते हुए वैक्सिन की खोज की गई और अब विश्वव्यापी टीकाकरण का दौर चल रहा है।

आपका ध्यान मैं इसी तरफ खींचना चाहता हूँ और अपनी संस्कृति की झलक दिखलाना चाहता हूँ।

इटली में चार में से एक मरीज़ को बचाने का विकल्प था तो युवाओं को बचाया गया। वृद्धों व बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़ दिया गया अर्थात उन्हें प्राथमिकता नहीं दी गई।

जबकि इसके ठीक उलट भारत में, दस में से एक व्यक्ति को टीके लग पाने का विकल्प था, तो हमने बुज़ुर्गों को पहले चुना और उन्हें प्राथमिकता भी दी गई और सर्वत्र मान्य भी हुआ।

हमारे यहाँ टीके की उपलब्धतता के आधार पर पात्रता की उम्र घटाते गये, बुज़ुर्गों को प्राथमिकता देते गये। वे बुज़ुर्गों को मरने के लिए छोड़ते रहे और हम उन्हें संजीवनी बूटी पिलाते रहे।

पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृति, भारत और इटली, भारत वाले और इटली वाली में यही तो फ़र्क़ है…!

हमारे लिए हमारे बुज़ुर्ग थाती हैं, धरोहर हैं। उनकी छत्रछाया सब पर वटवृक्ष की तरह आजीवन बनी रहे इसी सोच व कामना के साथ उन्हें प्राथमिकता दी गई। हमारी अपनी ज़िंदगी से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्हें संभालकर सुरक्षित रखना हमारा परम् कर्तव्य और नैतिक जिम्मेदारी भी है।

भारत सरकार के प्रति तहेदिल से धन्यवाद व साधुवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ जो उन्होंने

अपने भारतीय संस्कारों को जीवित रखा। हमारे यहाँ इसी सोच के कारण आज के आधुनिकता में भी बुजुर्गों व वृद्धों को तवज्जो व प्रधानता दिया जा रहा है। यही कुछ मूलभूत चीजें ऐसी हैं जो हम भारतीयों को औरों से अलग पहचान दिलाती है। ऐसे ही हम मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, वृक्ष देवो भवः की विचारधारा या सूत्र की राग नहीं अलापते हैं। इन विचारधाराओं में भी हमारी भारतीय संस्कृति रची बसी दिखाई देती है।

हमें भारतीय संस्कृति पर गर्व है और जो भाग्यशाली हैं उन्हें इसका हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। सच में भारतीय संस्कृति महान है।