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96 वां तानसेन संगीत समारोह

96 वां तानसेन संगीत समारोह

अजित राय

संगीत सम्राट तानसेन की जन्मस्थली बेहट ( ग्वालियर, मध्यप्रदेश) में आज के जमाने में सैकड़ों किसान मजदूरों को शास्त्रीय संगीत सुनते हुए देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। पिछले दिनों उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत और कला अकादमी भोपाल द्वारा आयोजित तानसेन संगीत समारोह ( 26-30 दिसंबर 2020) में हर सभा में सभागार युवा संगीत प्रेमियों से भरा हुआ था और पांव रखने की भी जगह नहीं थी। कोरोनावायरस से जूझ रही हमारी दुनिया में पिछले साल के आखिरी हफ्ते में इस समारोह ने गायकों, संगीतकारों और रसिकों को शास्त्रीय संगीत का नायाब तोहफा दे दिया।


ग्वालियर शहर के हजीरा इलाके में तानसेन और उनके एक गुरु सूफी संत मोहम्मद  गौस की मजार के पास दिसंबर महीने में हर साल आयोजित किया जाने वाला  हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का यह समारोह अब अंतरराष्ट्रीय हो चुका है। इससे युवा श्रोताओं को पता  दुनिया के हर देश के शास्त्रीय संगीत को सुनने और उससे परिचित होने का अवसर मिला।  यह भी आश्चर्य जनक है कि किसी न किसी रूप में यह समारोह पिछले 96 सालों से अनवरत आयोजित किया जा रहा है । 1980 से इसे मध्य प्रदेश सरकार ने अपने सालाना कैलेंडर में शामिल किया और अब यह ग्लोबल म्यूजिक फेस्टिवल का रूप ले चुका है। देश के जाने-माने हर गायक और संगीतकार यहां अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत और कला अकादमी के प्रभारी निर्देशक राहुल रस्तोगी कहते हैं कि " पिछले आठ महीने से कोरोनावायरस समय में सभी कलाकार अपने घरों में कैद हो गए थे, तानसेन संगीत समारोह में पहली बार उन्हें घरों से बाहर आकर मंच पर श्रोताओं के बीच गाने का मौका मिला। यह उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। "

इस साल राजन साजन मिश्र को छोड़ दें तो अधिकतर प्रस्तुतियां युवा संगीतकारों की थी। देवकी पंडित, संजय कुमार मल्लिक, अभिषेक लहरी, अभय रूस्तुम सोपोरी, मोहम्मद अमान खां, अब्दुल मजीद एवं हमीद खां, देवानंद यादव, कमल कामले, श्रीकांत कुलकर्णी, संजीव अभ्यंकर, रामजी लाल शर्मा, मधु भट्ट तैलंग, यश देवले, सुगातो भादुड़ी, कावलम श्रीकुमार, जगत नारायण शर्मा, हेमांग कोल्हटकर, सोमबाला सातले कुमार, साधना देशमुख मोहिते, साहित्य कुमार नाहर, गणेश मोहन, रूपक कुलकर्णी, सुनील पावगी, प्रशांत एवं निशांत मलिक, धनंजय जोशी, विवेक करमहे, पुष्प राज एवं भूषण कोष्ठी आदि कलाकारों की संगीत प्रस्तुतियां भारत में शास्त्रीय संगीत की बहुलतावादी छवियां रचती है।


डेनियल रवि रैंजेल ( मैक्सिको), दारूश अलंजारी, हमता बागी ( ईरान), और स्टीफेन काय ( यू के) के विश्व संगीत को सुनने के बाद लगता है कि पूरी दुनिया का शास्त्रीय संगीत एक ही धागे से बंधा हुआ है। तानसेन संगीत समारोह की हर सभा की शुरुआत मध्य प्रदेश के संगीत महाविद्यालयों के नौनिहालों से होती है। इस बार भी शंकर गंधर्व, माधव, तानसेन, साधना और भारतीय संगीत महाविद्यालय, ध्रुपद केंद्र और राजा मानसिंह तोमर संगीत और कला विश्वविद्यालय के छात्रों को अवसर मिला।

तानसेन का असली नाम रामतनु पांडे था जिनका जन्म ग्वालियर के पास बेहट गांव में 1493 से 1500 ईसवी के बीच हुआ था। वे रीवा नरेश राजा रामचंद्र सिंह के दरबारी थे। उनके गायन की शोहरत से प्रभावित होकर मुगल बादशाह अकबर ने 1562 में उन्हें अपने दरबार के नौ रत्नों में शामिल किया था। अकबर की बेटी मेहरून्निसा से प्रेम विवाह करने के कारण उन्हें इस्लाम कबूल करना पड़ा और अकबर ने उनका नाम मियां तानसेन रखा।वे वृंदावन मथुरा के स्वामी हरिदास के शिष्य थे और बाद में सूफी संत मोहम्मद गौस की सोहबत में आए। उनके संगीत में वैष्णव और सूफी परंपरा का मिश्रण है। पापुलर कल्चर में भी तानसेन की जबरदस्त लोकप्रियता रही है। उनपर 1943, 1958 और 1962 में तीन तीन बार फिल्में बन चुकी है। अस्सी के दशक में उनपर पाकिस्तान में एक टीवी सीरियल बहुत सफल रहा था। विजय की फिल्म " बैजू बावरा "(1952) सुपर हिट रही थी जिसमें भारत भूषण और मीना कुमारी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। कहा जाता है कि जब तानसेन गाते थे तो दीये जल जाते थे, बारिश होने लगती थी, पत्थर पिघल जाते थे और हिंसक जंगली जानवर भी शांत हो जाते थे।