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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - किताबें करती हैं बातें

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  किताबें करती हैं बातें

-सुभाष मिश्र

हम जिस उत्तर आधुनिक समय में सांस ले रहे हैं वह संकटों का कोलाज है। इस उत्तर आधुनिक समय में किताबों के प्रति लोगों का धैर्य खत्म होने लगा है। किताबें कैरियर के लिए ज्ञान की जरुरत में उपस्थित है। शब्द की लिखित सत्ता के लिए संकट खड़ा हो गया है। टीवी चैनलों की बाढ़ ने यह भरोसा दिलाया था कि खबरों के साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य का एक संपूर्ण रुप भी प्रस्तुत किया जाएगा लेकिन यह भरोसा जल्दी ही टूट गया। अधिकांश टीवी चैनलों ने अपना भरोसा खो दिया। वे खबरें प्रस्तुत करने की जगह खबर बनाने लगे। लिखित शब्द को चुनौती देकर टीवी चैनलों पर जो रंगीन सपना साकार आकार लेने लगा था उसमें घोर व्यवसाई इच्छाएं और राजनीतिक आकांक्षाएं पलने लगीं। हमारे पुस्तकालय पाठकों के लिए तरस रहे हैं। खबर आई है कि जमशेदजी टाटा द्वारा स्थापित पुस्तकालय में केवल प्रतिदिन एक पाठक आता है। मेरे अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता के नाम से मेरे पैतृक घर वारासिवनी में दस साल पहले जोर-शोर से स्थापित ग्रंथालय की किताबें धूल खा रही हैं। परिचित इसे बंद करने का सुझाव दे रहे हैं। जिनके घरों में पहले से बहुत सी पुस्तकें हैं, उनके घर की नई पीढ़ी उसे किसी सुरक्षित हाथों में सौंपने बेताब है। सड़क किनारे फुटपाथों पर लगने वाली पुरानी किताबों की दुकान हो या पुस्तक मेलों में लगने वाली पुरानी किताबों के स्टाल सब जगह औने-पौने में बड़े से बड़े लेखकों की किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध रहती हैं। अधिकांश पुस्तकालय में कोर्स की या कैरियर से जुड़ी किताबें या ई-लाइब्रेरी के जरिए नये ज्ञान की काम की किताबें पढऩे वाले पाठक ही ज्यादा मिलते हैं।
कबीर का दोहा है-
पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ,
पंडित भया ना कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।


अब लोग प्रेम का ढाई आखर भी मोबाईल के जरिए व्हाट्यअप पर पढ़ ले रहे हैं। चि_ी-पत्री, खतों खिताबत तो पहले ही बंद हो गई थी। कबीर का ही ये लिखा 'सब कहते कागद की लेखी में कहता आंखन की देखी भीÓ आज दूसरे ढंग से सच होता दिख रहा है। लोगों को अब ज्यादा लिखना पढऩे की आदत नहीं रही। उन्हें ट्वीटर, इंस्टाग्राम पर कम शब्दों में ज्यादा चाहिए। लोग पढऩे से ज्यादा देखना और सुनना चाहते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण उपजी स्थितियों ने लंबे समय से शिक्षण संस्थाओं को बंद रखा। किताबों की जगह ऑनलाईन पढ़ाई ने ले ली है। लोग अब किताबों के पन्ने नहीं पलटते। वे मोबाईल, लैपटॉप, कम्प्यूटर के माउस  स्क्राल के जरिए काम की चीजें पढऩे लगे हैं।

एक ओर जहां आज हिन्दी के बड़े से बड़े लेखक की किताबों की प्रतियां हजार दो हजार तक सीमित होकर रह गई है। वहीं कुछ किताबें बेस्ट सेलर के रुप में हजारों की संख्या में बिक रही हैं। ऑनलाईन किताबों का बाजार भी इन दिनों बहुत बढ़ा है। शिक्षा से जुड़ी ऑनलाईन कोचिंग और रीडिंग का कारोबार कई करोड़ों में चला गया है। 2017 में बायजू ने लगभग 260 करोड़ का राजस्व अर्जित किया और 2018 वित्तीय वर्ष में इसे दोगुना कर दिया। 520 करोड़ की कमाई की। BYJU'S, Toppr, वेदांतु और Unacademy की पसंद भारत में काफी लोकप्रिय रही है। लिंक्डइन लर्निंग, कौरसेरा, उडेमी जैसे वैश्विक ब्रांड भी भारतीय बाजार में लोकप्रिय हैं। BYJU'S, डाउटनट, ग्रेड अप, testbook,Toppr, Unacademy, वेदांतु सबसे आगे है। ई बुक पढऩे  के लिए भारत में जो ई बुक रीडर सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। उनमें कोबो ऑरा, ब्लैक किंडल ई रीड शामिल है।

इंटरनेट के कारण सूचना का प्रसार प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन चुनौती यह है कि सूचनाओं की अधिकता है और इसकी प्रामाणिकता की गारंटी नहीं दी जा सकती है। यही वजह है कि छात्रों, शिक्षाविदें और शोधकर्ताओं को समान रूप से गुणवत्तापूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए पुस्तकालयों की आवश्यकता पर जोर दिया जाती है। यदि पुस्तकालय केवल पढऩे/सीखने या पुस्तकों तक पहुँचने के लिए स्थान प्रदान कर रहे हैं तो वे अप्रासंगिक हैं। हमें एक स्थान प्रदान करने की आवश्यकता है जहां लोग आना चाहते हैं, पुस्तकों और लेखकों पर चर्चा करें। बच्चों में पढऩेे की आदतों को विकसित करने के लिए पुस्तकालय समय की आवश्यकता है। आज हमारा समाज पढऩेे से हटकर केवल स्क्रीन देखने की ओर जा रहा है, जिसके कारण छात्र रचनात्मक और विश्लेषणात्मक क्षमताओं को खो रहे हैं। इसके उल्ट
सफदर हाशमी की कविता कहती है-
किताबें करती हैं बातें, बीते जमानों की दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की, एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की, फूलों की, बमों की जीत की, हार की
प्यार की, मार की। सुनोगे नहीं क्या किताबों की बातें? किताबें, कुछ तो कहना चाहती हैं तुम्हारे पास रहना चाहती हैं। किताबों में चिडिय़ा दीखे चहचहाती, कि इनमें मिलें खेतियां लहलहाती।
किताबों में झरने मिलें गुनगुनाते, बड़े खूब परियों के किस्से सुनाते।
किताबों में साईंस की आवाज़ है, किताबों में रॉकेट का राज़ है।
हर इक इल्म की इनमें भरमार है, किताबों का अपना ही संसार है।
क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे? जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे?
किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

आधुनिक तकनीक के आने के बाद और पढऩे-लिखने की रुचि कम होने के साथ ही अब ऐसे-ऐसे एप आ गये हैं, जहां किताबों को पढ़कर सुनाने वाले मौजूद हैं। दास्तानें गोई की तरह है अब रोचक और साफ उच्चारण के साथ किताबों का आडियो वर्जन भी उपलब्ध है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों में भी धीरे-धीरे पढऩे की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। इस बात को लेकर शिक्षा शास्त्रियों और शिक्षण संस्थानों की चिंता भी बढ़ रही है। बच्चों में पढऩे की रुचि बढ़ाने के लिए हरियाणा जैसे राज्य में लिटरेचर फेस्टिवल तक आयोजित किए गये।  

किताबों की उपलब्धता और रूचि को देखते हुए सर्वप्रथम ब्रिटेन में सन् 1850 में पुस्तकालय अधिनियम पारित किया गया और इसके बाद अन्य देशों में इसके लिए प्रयास शुरू किये गए। भारत में पुस्तकालय अधिनियम तैयार करने की दिशा में सर्वप्रथम प्रयास डॉ. रंगनाथन द्वारा किया गया। उन्होंने सन् 1930 में वाराणसी में आयोजित अखिल एशिया शैक्षणिक सम्मलेन में आदर्श पुस्तकालय अधिनियम का प्रारूप प्रस्तुत किया।  

लोग पुस्तकों को पढऩेे के लिए आकर्षित हो और पुस्तकालय इसमें अहम भूमिका निभाए इस उद्देश्य से इस मिशन की शुरुआत हुई है। 2014 में पुस्तकालयों पर राष्ट्रीय मिशन का उद्देश्य मॉडल पुस्तकालयों की स्थापना, क्षमता निर्माण और विस्तृत सर्वेक्षण करके एक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना था। 5,000 पुस्तकालयों की आधारभूत डेटा की तैयारी के साथ शुरू हुआ । राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में पंजीकृत पुस्तकालयोंकी कुल संख्या 5,478 है। बहुत से राज्यों में पुस्तकालय कानून भी बने। पुस्तकालयों के नाम पर जिस तरह की किताबों की खरीद-फरोख्त और कमीशनबाजी होती है, यह किसी से छिपी नहीं है। बहुत से प्रकाशक जिनकी किताबें कोई पाठक माटी मोल खरीदकर नहीं पढऩा चाहता उनकी किताबें पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही है। शिक्षण संस्थाओं की मिलने वाले बजट में प्रावधानित पुस्तक खरीदी प्रकाशकों, अफसरों और विभाग के मंत्री, बिचौलियों को कारण उन उद्देश्यों और रुचि की पूर्ति नहीं कर पाता जिसे सोचकर बजट बनाया गया था। एक सर्वे के अनुसार, ई-किताबेंपूरे चीन में सबसे लोकप्रिय है, जहां 24.4 प्रतिशत उपयोगकर्ता डिजिटल प्रारूप पसंद करते हैं, जबकि 32 प्रतिशत उपयोगकर्ता कागज़ की किताबों को पसंद करते हैं। भारत में, 2020 में केवल 5.6 प्रतिशत पाठकों ने ई-पुस्तकों की ओर रुख किया, जबकि 24.5 प्रतिशत ने कागज़ की किताबेंपढऩा जारी रखा।  
प्रसंगवश कृष्ण कल्पित की कविता-
मैं बहुत सारी किताबों की
एक किताब बनाता हूं
मैं कवि नहीं ,जिल्दसाज  हूं
जो बिखरी हुई किताबों को बांधता है ,
किताबें जलाने वाले इस महादेश में
मैं किताब बचाने का काम करता हूं।