ध्रुव शुक्ल की कोरोना को लेकर सामयिक और गंभीर कविता

ध्रुव शुक्ल की कोरोना को लेकर सामयिक और गंभीर कविता

बाजार से खरीदी मृत्यु


किसी दूर देश के विमान से आयी है मृत्यु

टेक्सी में बैठकर चली गयी है

न जाने किसके घर

पता पूछ रही है पुलिस उस घर का ...

... कहीं रेलगाड़ी में तो नहीं बैठ गयी

उस घर से निकलकर

... कहीं सिटी बस से उतर गयी हो

किसी बस स्टाप पर

ढूँढे नहीं मिल रही मृत्यु


दरवाजे बंद किये घरों में छिपे हैं लोग

आहट ले रहे हैं मृत्यु की

कौन जाने वह किसका दरवाजा खटखटा दे


सब मान बैठे हैं

घरों में रहने से नहीं आयेगी मृत्यु

शायद वे भूल गये हैं

वह तो चाहे जब आती है सबके घर


मृत्यु को याद रखकर जीने से

जन्म लेती रहती है जीने की कला

तभी तो जीवन कभी कम नहीं पड़ता

इसी कला में बसी होती है मृत्यु कविता की तरह

जब कोई चला जाता है अपना घर छोड़कर

हर बार शेष रह जाती है जीने की की कला


घर से इतने बाहर क्यों आ गये

कि बाजार से मृत्यु खरीदकर

घर लौटना पड़ रहा है

वह तो घर में ही रची-बसी है