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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कपड़े नहीं सोच बदलने की जरुरत है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कपड़े नहीं सोच बदलने की जरुरत है

सुभाष मिश्र
किसी भी स्त्री, पुरुष को अपनी शारीरिक संरचना, परिवेश, सामाजिक मान्यताओं, कामकाज की सुविधा और अपनी मर्जी के अनुसार सजते-संवरते हैं, और कपड़े पहनते है। कोई क्या पहने, क्या खाये, कैसे रहे यह उसकी अपनी निजता है। जिसका सम्मान सभी को करना चाहिए। हम जिस पुरुष वादी समाज में रहते है, वह अक्सर स्त्रियों के पहनावे, रहन-सहन और चाल-चलन को लेकर बहुत बातें होती है, सीख दी जाती है। ये पहली बार नहीं हुआ है की किसी राजनेता ने किसी स्त्री के पहनावे को लेकर कमेंट किया हो।  इसके पहले भी बहुत बार स्त्रियों को लेकर कमेंट होते रहे है।

रिप्पड जीन्स पहनने वाली महिलाओ पर बयान देकर उत्तराखंड के तीरथ सिंह रावत की काफी आलोचना हो रही है। रावत की टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर एक नई बहस भी छिड़ी है। विवाद बढ़ता देखकर उन्होंने क्षमा मांग ली और कहा की मुझे जीन्स से दिक्कत नहीं है, लेकिन फटी जीन्स से ऐतराज है।

उन्होंने यह टिप्पणी अपनी एक महिला सहयात्री को लेकर की थी जो फ्लाइट में उनके बगल में बैठी थी और एक एनजीओ चलाती है। उनकी पोशाक के बारे में बताते हुए मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया था कि ऐसी महिला किस तरह के संस्कार देगी। जो ऐसी फटी हुई जीन्स दिखाकर अपने घुटने दिखा रही हो।  उन्होंने कहा की मैने संस्कार, संस्कृति व परिवेश के परिप्रेक्ष्य में यह बात कही थी। यदि उनकी इस बात से किसी को दुख पहुंचा है, तो वह इसके लिए माफी मांगते हैं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री रावत ने कहा था कि संस्कारों के अभाव में युवा अजीबो गरीब फैशन करने लगे हैं और घुटनों पर फटी जींस पहनकर खुद को बड़े बाप का बेटा समझते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे फैशन में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं।

हमारे देश के नेताओं की लड़कियों की जींस, स्कर्ट वगैरह से पुरानी दुश्मनी है। गोवा के पूर्व डिप्युटी चीफ मिनिस्टर सुदीन धवलीकर ने नाइट क्लबों में लड़कियों के शॉर्ट स्कर्ट और सी-बीच पर बिकनी पहनने पर बैन लगाने की बात की थी। उनका कहना था कि लड़कियों का नाइट क्लबों में शॉर्ट स्कर्ट पहनना गोवा की संस्कृति के लिए खतरा है। पूर्व बीजेपी विधायक बनवारी लाल सिंह ने भी राजस्थान के सभी सीबीएसई स्कूलों में स्कर्ट पर बैन लगाने की मांग की थी। पीपल शाह गांव की इस पंचायत ने जींस-स्कर्ट पहनने वालों का बायकॉट करने की बात कही है। उनका तर्क भी यही है कि जींस, स्कर्ट से हमारी भारतीय संस्कृति खराब हो रही है।

क्या हमारी भारतीय संस्कृति की जड़ें वाकई इतनी कमजोर हैं कि फटी जींस या छोटी स्कर्ट पहनने से हिल जाए? क्या वाकई इन कपड़ों में इतनी ताकत है कि ये छेड़छाड़ से लेकर ड्रग्स की बिक्री तक बढ़ा सकती हैं ? हमारे देश में छोटी-छोटी बच्चियों से रैप होता है। धुंधट में रहने वाली, घर की चार दीवारी में रहने वाली महिलाओं के साथ घर में घुसकर छेड़छाड़ आम बात है। दरअसल यह एक तरह की सोच है जिसका प्रगटीकरण अलग-अलग तरीके से उस मानसिकता के लोग करते हैं जो संस्कृति के संवाहक कहलाते हैं। पिछले साल कन्नड़ अभिनेत्री संयुक्ता हेगड़े के साथ हुआ। संयुक्ता को स्पोट्र्स ब्रा पहनकर एक्सरसाइज करने पर फब्तियों-तानों के साथ मारपीट तक का सामना करना पड़ा। गुडग़ांव के शॉपिंग मॉल में एक अधेड़ उम्र की महिला ने वहां मौजूद दो लड़कियों को छोटे कपड़े पहनने पर उनका रेप कर दिए जाने की वीभत्स बात कही। अगर आप छोटे कपड़े पहने लड़कियों को देखें, तो उनका बलात्कार कर दो। कोलकाता में टीशर्ट और स्कर्ट पहनकर शॉपिंग करने वाली एक 25 वर्षीय लड़की को भी एक महिला ने धमकी देते हुए कहा कि तुम्हारा तो रेप होना चाहिए। जब लड़की ने इसका विरोध किया, तो उसके साथ मारपीट भी की गई।

बलात्कार इसीलिए नहीं होते क्योकि महिलाएं, लड़कियां छोटी कपड़े पहनती है बल्कि इसीलिए की तीरथ सिंह रावत जैसे पुरुष का प्रचार करते है और अपना कर्तव्य निभाने की बजाय इस तरह की ऊलजूलूल बयानबाजी करते हैं।

जीन्स आमतौर पर घुटनो या फिर जांघ के पास से रिप्पड होती है और इन फटी हुई जीन्स की कीमत नार्मल जीन्स से काफी ज्यादा होती है। जीन्स को सबसे पहले 1970 में एक बिजनेसमैन लोएब स्ट्रॉस ने डिज़ाइन किया था और इन्होने ही डेनिम ब्रांड की शुरुआत की थी। उन्होंने एक ट्रॉउजऱ तैयार किया जो वर्किंग वुमन के ऊपर बहुत सूट करती थी और इसे गहरा नीला रंग दे दिया।

मुख्यमंत्री रावत ने यह बयान बाल संरक्षण आयोग की और से नशा मुक्ति को लेकर कार्यशाला में कहा की युवा पीढ़ी गलत दिशा में जा रही है। महिलाओं को फटी जीन्स में देखकर हैरानी होती है और इससे समाज में क्या सन्देश जायेगा। इस पर गायिका सोना मोहपात्रा ने ट्विटर पर अपनी फोटो शेयर की है जिसमे वह रिप्पड टी शर्ट पहने नजऱ आ रही है, इसके साथ ही उन्होंने लिखा है लड़किया रिप्पड जीन्स पहनती है उन्हें भारत में किसी से इजाज़त लेने की जरुरत नहीं है।

अमिताभ बच्चन की नातिन नव्या नवेली ने लिखा, हमारे कपड़े बदलने से पहले अपनी मानसिकता को बदलिए। क्योंकि हैरान करने वाली बात सिर्फ इस तरह के संदेश हैं जो समाज में भेजे जा रहे हैं। मैं अपने रिप्ड जींस पहनूंगी। धन्यवाद... और गर्व से पहनूंगी। महिला आयोग अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने लिखा उत्तराखंड के सीएम को लड़कियों के जीन्स पहनने से दिक्कत है। मुख्यमंत्री तो बन गए पर दिमाग अभी भी सड़क छाप है। वो दिन दूर नहीं जब जीन्स पहनने पर ये यूएपीए लगा देंगे। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी तीरथ सिंह रावत के इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। सीएम साहब, जब आपको देखा तो ऊपर-नीचे-आगे-पीछे हमें सिर्फ बेशर्म-बेहूदा आदमी दिखता है।

महिलाएं फेसबुक, ट्वीटर और इंस्टाग्राम के अलावा अन्य प्लेटफार्म पर रिप्ड जीन्स में अपनी तस्वीरें शेयर कर रही है। सोशल मीडिया पर लोग लगातार उनकी मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं और उन्हें अपने बयान पर माफी मांगने को कर रहे है।

नये समय की कामकाजी स्त्री अपने अनुसार जीना चाहती है। वह सदियों से चली आ रही कथित मान्यताओं, रूढिय़ों और अपने लिए किये जाने वाले दूसरे दर्जे के व्यवहार को खारिज करती है। वह जानती है कि मौजूदा व्यवस्था के बाहर कदम रखने से उसे निर्मम सजा भुगतनी पड़ सकती है। किन्तु वह इसकी परवाह नहीं करती। लेखिका प्रभा खेतान की छिन्न मस्ता की नायिका प्रिया की तरह नई स्त्री का सूत्र वाक्य है की मैं यदि अपनी नजरों में सती हूं तब किसी और की नजरों में खुद को स्थापित करने की यह कठिन तपस्या बेकार है। बिलकुल बेकार। खासकर तब व्यवस्था का एहसास कचोटता है, जब आप अच्छी तरह से जानते हैं कि सामने वाला आदमी बात सुनने को तैयार नहीं है।

स्त्री की वेशभूषा उनकी आजादी पर सवाल उठाने भलीभांति जानते हैं कि संवैधानिक रूप से स्त्री-पुरुष बराबर है, लेकिन सामाजिक रूप से दोनों के लिए अलग-अलग मापदंड हो शायद ही किसी नेता ने कभी किसी पुरुष के वेशभूषा, पहनावे को लेकर सवाल उठाए हों। हमारे देश में अधिकांश गालियों औरतों के जननांगों को लेकर ही दी जाती है। गलती किसी ने की हो, झगड़ा किसी का हों, बीच में एक-दूसरे की मां, बहन को लेकर गाली-गलौज आम बात है।

नए समय की कामकाजी स्त्री अपने अनुसार जीना चाहती है वह सदियों से चली आ रही कथित मान्यताओं, रूढिय़ों और अपने लिए दिए जाने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार को ख़ारिज करती है वह जानती है की मौजूदा व्यवस्था के बहार कदम रखने से उसे निर्मम सजा भुगतनी पड़ सकती है।
कवि विनोद सिल्ला की एक कविता है।
मै हैरान हूँ इस चुप्पी से ....
मैं हैरान हूं यह सोचकर
किसी महिला ने उंगली नहीं उठाई,
तुलसीदास पर  जिसने कहा:-
च्च्ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी
सब हैं ताडऩ के अधिकारी।
मैं हैरान हूं यह सोचकर
किसी औरत ने नहीं
जलाई मनुस्मृति
जिसने पहनाई
उन्हें गुलामी की बेडिय़ां।
मैं हैरान हूं,यह सोचकर
किसी औरत ने धिक्कारा नहीं
उस राम  को
जिसने गर्भवती पत्नी को
अग्नि परीक्षा के बाद भी
निकाल दिया घर से बाहर
धक्के मारकर,

मैं हैरान हूं यह सोचकर
किसी औरत ने
नहीं किया नंगा, उस कृष्ण को
चुराता था जो नहाती हुई
बालाओं के वस्त्र
योगेश्वर कहलाकर भी
जो मनाता था रंगरलियां
सरे आम!

किसी औरत ने लानत नहीं भेजी
उन सबको,जिन्होंने
औरत  को समझकर च्च्वस्तुज्ज्
लगा दिया, जुए के दाव पर
होता रहा जहां च्च्नपुंसकज्ज्
योद्धाओं के बीच
समूची औरत  जात का  चीर_हरन!

मैं हैरान हूं ये सोचकर
किसी महिला ने नहीं किया
संयोगिता_अंबालिका के
अपहरण का विरोध
आज तक!

और मैं हैरान हूॅ ये सोचकर,
क्यों इतना होने के बाद भी,
उन्हें अपना श्रद्धेय मानकर
पूजती हैं मेरी मां,बहन, बेटियां
उन्हें देवता भगवान मानकर
आखिर क्यों?

मैं हैरान हूॅ
उनकी चुप्पी देखकर
इसे उनकी सहनशीलता कहूॅ या
अंध श्रद्धा  या फिर
मानसिक गुलामी की  पराकाष्ठा !