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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -घर का जोगी जोगड़ा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -घर का जोगी जोगड़ा

-सुभाष मिश्र
विनोदकुमार शुक्ल को साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान। साहित्य अकादमी फेलोशिप के लिए चुना गया है। हिन्दी में सुमित्रानंदन पंत, जैनेद्र कुमार, महादेवी वर्मा, निर्मल वर्मा और डॉ. नामवर सिंह को यह फेलोशिप सम्मान मिल चुका है। विनोद कुमार शुक्ल के साथ अंग्रेजी के लेखक रस्किन बॉन्ड को भी महत्तर सदस्य (फेलोशिप) घोषित किया गया है। साहित्य अकादमी में 24 भारतीय भाषाओं के कुल 21 सदस्य ही हो सकते हैं। विनोद जी को इसके पहले वर्ष 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। विनोद जी गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप (मप्र शासन), रजा पुरस्कार (मप्र कला परिषद), शिखर सम्मान (मप्र. शासन), राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (म.प्र. शासन), दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान (मोदी फाउंडेशन), साहित्य अकादमी पुरस्कार भारत सरकार से सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दी गौरव सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, उ.प्र. शासन) छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पुरस्कार मिला है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सही ही कहा है कि पूरे छत्तीसगढ़ को उन पर गर्व है। मूलत: राजनांदगांव के रहने वाले विनोद जी की कर्मभूमि और लंबे समय से निवास रायपुर में है। गजानन माधव मुक्तिबोध के सानिध्य में कविता की शुरुआत करने वाले विनोद कुमार शुक्ल का पहला कविता संग्रह 1971 में जयहिंद के नाम से प्रकाशित हुआ। तबसे अब तक न जाने विनोदजी ने कितने ही कविता संग्रह, उपन्यास, बाल साहित्य रच डाले। बिलासपुर, रायपुर संभाग कविता के जरिए छत्तीसगढिय़ों की व्यथा को बयां करने वाले विनोद कुमार शुक्ल को अब तक ना ही पद्मश्री मिला, ना ही पद्मभूषण। राज्य ने उनका नाम इस सम्मान के लिए भेजने की जेहमत ही नहीं उठाई। इस बीच में ना जाने कैसे-कैसे लोगों को ये सम्मान मिल गया, उसकी अपनी एक लंबी कहानी है। बहरहाल, कहावत है घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध। हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे, शंकर शेष की परंपरा में विनोदजी भी शामिल है जिन्हें अपने घर में वह सम्मान, नहीं मिले जिसके वे हकदार थे। ये सारे लोग किसी पुरस्कार, पहचान के मोहताज नहीं रहे। इनका काम, लेखन ही देश-दुनिया में इनकी पहचान है।

कला, साहित्य, संस्कृति से जुड़ा देश-दुनिया का बौद्धिक तबका विनोद जी और उनके लेखन को बखूबी जानता है। उनके उपन्यास नौकर की कमीज पर मणिकौल ने फिल्म बनाई। मानव कौल, वरुण ग्रोवर से लेकर न जाने कितने सेलिब्रिटी विनोदजी की लेखनी के दीवाने हैं। विनोद जी समूची पृथ्वी को अपना घर मानते हैं और कविता के जरिए कहते हैं-
जाते-जाते पलटकर देखना चाहिए
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे कि याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की होगी घर में अन्न जल होगा कि नहीं की चिंता
पृथ्वी पर अन्न जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में जैसा होगा
और पृथ्वी की तरह लौटना घर की तरह लौटने जैसा।
विनोद कुमार शुक्ल अपनी कविता के जरिए छत्तीसगढ़ के एक गरीब मजदूर मंगलू के मंगल की कामना करते हुए उसके बहाने संपूर्ण पृथ्वी के मंगल की कामना करते हैं। मंंगलू उनकी कविता में इस तरह छत्तीसगढ़ का ही नहीं, सारी दुनिया के वंचित समुदाय का एक प्रतिनिधि चरित्र बन जाता है। उनके लेखन में छत्तीसगढ़ की आत्मा पूरे वैभव और गरिमा के साथ प्रकट होती है। वे लोकल फार ग्लोबल के नहीं, लोकल विथ ग्लोबल के कवि हैं, जो स्थानीयता और वैश्विकता के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींचते। विनोद जी अपनी कविता के जरिए यह उम्मीद जताते हैं कि सबसे बड़ा डॉक्टर सबसे गऱीब आदमी का इलाज करे और फ़ीस माँगने से डरे। वैश्वीकरण के दौर में महंगी शिक्षा और महंगी चिकित्सा तक पहुँचने में नाकाम सामान्यजन के पक्ष में इससे ज़्यादा मार्मिक अपील और क्या होगी। विनोद कुमार शुक्ल का कवि हताश होकर बैठे आदमी की ओर हाथ बढ़ाता है, उसे वह जानता नहीं मगर उसकी हताशा को जानता है। उनकी कविताएं हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था -
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
दृश्य में सोचने वाले विनोद कुमार शुक्ल से उनकी रचना प्रकिया के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं की जब आप रचना प्रकिया में लिखते-लिखते आगे बढ़ते चले जाते हैं ये उसी तरह की बात है जैसे दृश्य मे देखने की बात हुई। आप ज़मीन पर चलते हुए आगे बढ़ते चले जाते हैं, जितना आगे बढ़ेंगे उतना जो आपके चलने से आपका देखा हुआ उपस्थित होता है। और आगे जहाँ रूकेंगे तो आगे बढ़ोगे तो बढ़ते-बढ़ते लगता है इस तरफ़ चले तो, उस तरफ़ चले तो अच्छा लगेगा।
सुप्रसिद्ध आलोचक कवि अशोक बाजपेयी कहते हैं कि विनोद जी साधारण जीवन बोध की फैंटसी रचने वाले कवि हैं। बंधाई आलोचनात्मक भाषा में कहें तो विनोद जी यथार्थ के नहीं अतियथार्थ के कवि हैं। विनोद कुमार शुक्ल की कविता में पहले की कविताओं की अंतरध्वनियां नहीं है।
एक जनवरी को जन्में विनोद जी ने 84 साल पूरे कर लिए हंै किन्तु अभी भी उनके भीतर पढऩे और लिखने की ललक जिस तरह से बरकारर है, वह देखते ही बनती है। विनोदजी से मिलकर बात करके आप हमेशा समृद्ध होते हैं। उनकी अपनी ही कविता की तरह उनके पास जरूरी काम की तरह जाकर महसूस किया जा सकता है।
जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आयेंगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियां जाऊँगा।
जो लगातार काम से लगे हैं
मैं फुरसत से नहीं
उनसे एक जरूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा।
इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

विनोद जी को सुनना भी एक ऐसी पगडंडी से होकर गुजरने जैसा है जो सपाट नहीं है अपितु थोड़ा ऊबड़-खाबड़ और पथरीला है पर यह रास्ता आपको उस झरने की ओर ले जाने वाला रास्ता बन जाता है जिसकी निर्झरणी में आप देर तक भीग सकते हैं। वे बिना किसी शोरगुल के अपनी सृजन यात्रा में लगे रहते हैं।
उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए आप यह समझ पाना मुश्किल है कि उनका रचा यह यथार्थ फैंटेसी के साथ घुल मिलकर इस तरह से आता है कि पहचान कर पाना मुश्किल हो जाता है कि इसमें कितना यथार्थ है और कितनी कल्पना?
विनोद जी अपने समूचे लेखन में उनकी प्रकृति के अधिक निकट दिखलाई पड़ते हैं। अपनी 6 दशक की लेखन चर्चा की शुरुआत उन्होंने सन 1960 में श्रीकांत वर्मा के संपादन में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका कृति से की जिसमें उनकी आठ कविताएं छपी थी, विनोद जी उन दिनों में जबलपुर में कृषि महाविद्यालय पढ़ा करते थे। उनकी पहली किताब लगभग जयहिंद अशोक वाजपेयी द्वारा सम्पादित पहचान सीरीज 2 के अंतर्गत प्रकाशित पुस्तिका के रूप में आई।
लगभग जय हिंद में विनोद कुमार शुक्ल की कुल इक्कीस कविताओं को 24 पृष्ठों में प्रकाशित किया गया था। विनोद कुमार शुक्ल यह भी कहते हैं कि मैं तो चुपचाप साहित्य की दुनिया की तरफ चला जा रहा था, मुझे पता ही नहीं लगा कि कब मैं साहित्य की दुनिया में शामिल हो गया। मेरी सोच में मुक्तिबोध का गहरा प्रभाव था, इसलिए मेरी कविताओं के प्रतीक और बिंब कुछ दूसरी तरह के होते थे।
रायपुर-बिलासपुर संभाग विनोद कुमार शुक्ल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कविताओं में से एक है। 1980 में लिखी गई उनकी इस कविता का पिछले साल योग मिश्रा ने नाटक के रूप में मंचित भी किया। छत्तीसगढ़ में अनेक वर्षों से गरीब, मजदूर और छोटो किसानों का पलायन होता रहा है। ये गरीब, मजदूर और किसान रोजी-रोटी के चाहत में अपना गांव घर छोड़कर देश के अकेले प्रदेशों में पलायन के लिए मजबूर होते हैं।  
ट्रेन की जनरल बोगी में बैठे हुए मजदूर परिवारों की सरलता, भयानक किस्म की अमानवीयता भी है। ये किस दुनिया के लोग हैं, जो बोगी में सीट खाली रहने पर भी सीट में न बैठकर खड़े रहते हैं या नीचे उकडू बैठ जाते हैं। मूंगफली के फेंके गए छिलको के लिए खिसककर जगह बनाने वाले छत्तीसगढ़ के भोले-भाले ग्रामीण की यह इस कदर दयनीयता (एक तरह से क्रूरता) ही क्या  छत्तीसगढ़ की वास्तविक पहचान हैं? छत्तीसगढ़ के लोगों को यहां के परिवेश को समग्रता ने समझने के लिए यह कविता एक कुंजी की तरह है। रायपुर-बिलासपुर संभाग विनोद कुमार शुक्ल की एक अद्भुत और महान कविता है। यह हिंदी कविता के इतिहास में मुक्तिबोध की महान कविता अंधेरे में की तरह  एक महान  कविता  होने  का  दर्जा रखती है। अपनी अद्भुत अंतर्वस्तु और शिल्प के कारण भी यह हिंदी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कविता है।
विनोद कुमार शुक्ल की कविता बेहतर दुनिया का स्वप्न देखने वाली कविताएं हैं। उनकी कविताएं हमारे इस मनुष्य विरोधी समय में मनुष्य के पक्ष में खड़ी हुई कविताएं हैं, जो हस्तक्षेप और प्रतिरोध के लिए तत्पर दिखाई देती हैं। विनोद कुमार शुक्ल की कविता की आंखें न केवल इस सच्चाई को देख पाती हैं, वरन उसे अपनी संवेदना का एक हिस्सा भी बना लेती हैं।