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छत्तीसगढ़ एक खोज- 10वी कड़ी: जब गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने किया अपनी पत्नी से छल

छत्तीसगढ़ एक खोज- 10वी कड़ी: जब गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने किया अपनी पत्नी से छल

 - रमेश अनुपम

 संदर्भ : बिलासपुर रेल्वे स्टेशन

विश्वप्रसिद्ध कवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर क्या अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी से कभी छल कर सकते हैं ,वह भी बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर, यह किसी के लिए भी विश्वास कर पाना थोड़ा मुश्किल होगा। छल वह भी मात्र पच्चीस रुपए के लिए । पर सच्चाई यही है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे महान तथा संवेदनशील कवि ने मात्र पच्चीस रुपयों के लिए अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी से झूठ बोला। 


" गीतांजलि ” जैसी सर्वश्रेष्ठ काव्यकृति के लिए विश्व का सर्वोच्च सम्मान नोबल प्राइज ग्रहण करने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और अपनी ही पत्नी से यह छल, सभी कहेंगे यह संभव  नहीं है।

पर यह सचमुच घटित हुआ बिलासपुर रेल्वे स्टेशन पर, जिसे विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीवन पर्यंत कभी भूला नहीं सके थे। यह उस समय की घटना है जब गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी धर्म पत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी को लेकर पेंड्रा रोड जा रहे थे।  कोलकाता से बिलासपुर होते हुए उन्हें रेल मार्ग से पेंड्रा रोड तक जाना था। उनके तथा मृणालिनी देवी के पेंड्रा रोड जाने की भी एक अलग  ही कहानी है। 


श्रीमती मृणालिनी देवी उन दिनों यक्ष्मा ( टी. बी.) रोग से पीड़ित थी। इस बीमारी के बारे में पता लगने पर गुरुदेव ने मृणालिनी देवी को शांतिनिकेतन से कोलकाता लाकर उस समय के नामी चिकित्सकों को दिखलाया। पर कोलकाता में भी मृणालिनी देवी के स्वास्थ्य में पर्याप्त सुधार न होता देख ,उन्होंने मृणालिनी देवी को एक तरह से  पेंड्रा रोड ले जाना ही उचित समझा। 

उन दिनों पेंड्रा रोड स्थित टी.बी. सेनेटोरियम पूरे देश में प्रसिद्ध था। ईसाई मिशन द्वारा संचालित यह टी.बी. सेनेटोरियम लगभग एक सौ चवालीस एकड़ भूमि पर पेंड्रा रोड एवं गौरेला के मध्य स्थापित था। पूरे देश भर से लोग यहां ईलाज करवाने के लिए आते थे। 

यह उन दिनों एशिया का सबसे बड़ा टी. बी. सेनेटोरियम कहलाता था ।गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने  इसलिए मृणालिनी देवी को लेकर पेंड्रा रोड आना उचित  समझा। पेंड्रा रोड अमरकंटक से लगे होने के कारण जलवायु की दृष्टि से भी कोलकाता की तुलना में एक सर्वोत्तम  स्थान था ।

उस समय कोलकाता के अनेक लेखक और मनीषी इसी के चलते अमरकंटक तथा पेंड्रा रोड आते-जाते रहते थे।

कोलकाता से रेल्वे मार्ग से बिलासपुर आने पर सबको छः घंटे तक प्लेटफार्म पर इसलिए रुकना पड़ता था क्योंकि पेंड्रा रोड जाने वाली एकमात्र ट्रेन इसके छः घंटे बाद ही बिलासपुर से छूटती थी। सो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सामने इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था कि वे भी मृणालिनी देवी के साथ छः घंटे का समय बिलासपुर रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर बिताए। उन्होंने अपनी सुप्रसिद्ध कविता   " फांकि " में इसका चित्रण करते हुए लिखा है  :   

"बिलासपुरेर स्टेशने बदलते होबे  गाड़ी,  

ताड़ा ताड़ी नामते होबे।  

छः घंटा काल थामते होबे जात्रीशालाय। 

मन होलो, ए की विषम बलाई।" 

( " बिलासपुर में बदलनी होगी गाड़ी ,उतरना होगा जल्दी। छः घंटे होगा रुकना मुसाफिरखाने में, यह भी मुसीबत है भारी " ) 

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने प्रथम श्रेणी यात्री प्रतीक्षालय में छः घंटे बिताना पसंद किया। गुरुदेव ने मृणालिनी देवी के लिए वहां बिस्तर बिछाया तथा उन्हें आराम करने के लिए कहकर, स्वयं एक अंग्रेजी उपन्यास लेकर प्रथम श्रेणी प्रतीक्षालय के बाहर आराम कुर्सी पर बैठ कर उपन्यास पढ़ने में तल्लीन हो गए।

अभी उपन्यास के कुछ ही पृष्ठ पढ़े थे कि प्रतीक्षालय के भीतर से मृणालिनी देवी की आवाज सुनाई दी। मृणालिनी देवी कविगुरु को भीतर आने के लिए ही आवाज लगा रहीं थीं।  कविगुरु को लगा कि मृणालिनी देवी को किसी चीज की आवश्यकता होगी, सो अंग्रेजी उपन्यास को कुर्सी पर रखकर वे प्रतीक्षालय के भीतर चले गए। भीतर जाने पर देखा कि मृणालिनी देवी एक महिला से बात कर रही हैं।


गुरुदेव को देखते ही मृणालिनी देवी ने उस महिला से उनका परिचय करवाते हुए कहा कि ये रूखमणी है, जो रेल्वे स्टेशन में झाड़ू-पोंछा और साफ-सफाई का काम करती है और यहीं पास में ही अपने परिवार के साथ एक झोपड़ी में रहती है।

रवींद्रनाथ ठाकुर अपनी पत्नी के भोलेपन और उनकी अछोर करुणा से भली-भांति परिचित थे। वे समझ गए थे कि कुछ ही पलों के पश्चात यहां भी मृणालिनी देवी का दयालू रूप उभर कर सामने आने ही वाला है। वे आने वाले खतरे को भांप चुके थे और मन ही मन चिंतित भी होने लगे थे, पर मृणालिनी देवी को इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। 

वह गुरुदेव से कहती जा रही थी कि इसका पति झुमरू भी यहीं रेल्वे स्टेशन पर छोटा-मोटा काम करता है। मृणालिनी देवी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और वे लगातार गुरुदेव को बताती ही जा रही थी कि ये लोग आज पास के एक गांव के रहने वाले हैं ,जहां इनकी थोड़ी सी खेती भी है, पर अकाल के कारण इन्हें अपना गांव छोड़कर बिलासपुर आने के लिए मजबूर होना पड़ा है ।

शेष अगले रविवार..



हिन्दी की अनेक सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएँ, लेख, साक्षात्कार तथा समीक्षाएँ प्रकाशित।

'समकालीन हिन्दी कविता’ तथा छत्तीसगढ़ की छह सौ वर्षों की दुर्लभ काव्य-यात्रा पर केन्द्रित ग्रन्थ 'जल भीतर एक वृच्छा उपजै’ का सम्पादन।

एक काव्य-संग्रह 'लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’ प्रकाशित। रायपुर स्थित शासकीय दू्.ब. महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यापक।