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भगवान राम की माता कौशल्या जन्मभूमि को लेकर गरमाती राजनीति

भगवान राम की माता कौशल्या जन्मभूमि को लेकर गरमाती राजनीति


सुशील भोले

  भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि के नाम पर इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमा गई है. कांग्रेस जहाँ राजधानी रायपुर  के पूर्व दिशा में लगभग 25 कि. मी. की दूरी पर स्थित ग्राम चंदखुरी, जहाँ विश्व का एकमात्र "कौशल्या मंदिर" है, जिसमें माता कौशल्या की गोद में भगवान राम बालक रूप में विराजित हैं, उसे ही जन्मभूमि के रूप में मानकर उस स्थल का विकास करना चाहती है, वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और और पूर्व संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर इस स्थल को केवल कौशल्या मंदिर होने और जन्मभूमि बिलासपुर जिला के ग्राम कोसला में होने का दावा कर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह भी अजय चंद्राकर के बयान के साथ खड़े हो गये हैं. इधर जोगी कांग्रेस ने भी इन दोनों ही पार्टियों को एक सप्ताह के अंदर प्रमाण प्रस्तुत करने की चेतावनी दे दी है.

   यहाँ यह जानना आवश्यक है कि कौशल्या जन्मभूमि के रूप में यहाँ के विद्वान एकमत नहीं हैं. चंदखुरी को जन्मभूमि मानने वालों की संख्या तो ज्यादा ही है. इसके साथ ही ग्राम कोसला को मानने वाले भी कम संख्या में नहीं हैं. वहीँ कुछ विद्वान जांजगीर जिला के ग्राम कोसिर को भी कौशल्या जन्मभूमि होना मानते हैं. वहाँ स्थित "कोसिर माता" के मंदिर को कौशल्या बताने का प्रयास करते हैं. इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का यह भी मत है, कि कौशल्या चूंकि दक्षिण कोसल की राजकन्या थी, तो उसका जन्म राजभवन में हुआ होगा, और चूंकि उस समय यहाँ की राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) थी, तो कौशल्या का जन्म भी सिरपुर में ही हुआ होगा.

   जितने मत उतनी मान्यता. पर किसी के पास सर्व स्वीकृत प्रमाण नहीं है. किन्तु एक बात अवश्य है, कि चंदखुरी को स्वीकार करने वालों की संख्या निश्चित रूप से अधिक है. पूर्व के सरकार के समय बनी "राम वन गमन पथ शोध समिति" के सदस्य भी चंदखुरी को ही जन्मभूमि मानकर उस स्थल के विस्तार के लिए प्रयास करने का अनुरोध सरकार से किए थे.

  जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत विचार है. मैं भी चंदखुरी को ही कौशल्या जन्मभूमि के रूप में स्वीकार करता हूँ. मैं उस समय से चंदखुरी स्थित कौशल्या मंदिर जा रहा हूँ, जब वह स्थल उजाड़ टापू की तरह दिखाई देता था. तब वहाँ तक जाने के लिए आज की तरह कोई पक्का मार्ग नहीं था, लोग तालाब में तैरकर वहाँ तक पहुंचते थे. नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की बाहुल्यता को देखते हुए लकड़ी और बांस बल्लियों से चैलीनुमा अस्थायी मार्ग बना दिया जाता था.

   ग्राम चंदखुरी को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई ऐतिहासिक गाँव है. वहाँ पुरातात्विक महत्व के मंदिर और मूर्तियां, कारीगरी युक्त पत्थर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए दिख जाते हैं, जो इस बात का अहसास कराते हैं, कि भले ही यह किसी राज्य की राजधानी न रहा हो,   किन्तु कोई प्राचीन ऐतिहासिक स्थल तो अवश्य ही है.

कौशल्या मंदिर के संबंध में मेरा एक आलेख कुछ वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुआ था. मेरे ब्लाग और फेसबुक पर भी रिलीज़ हुआ था. उसे पढ़कर राम जन्मभूमि समिति अयोध्या से जुड़े एक सदस्य मुझसे चंदखुरी मंदिर स्थल से जटायु समाधि की फोटो खिंचकर भेजने के लिए अनुरोध किए थे. तब तक मैं जटायु समाधि स्थल के संबंध में अपरिचित था. हाँ इतना अवश्य है कि जिस स्थल को जटायु समाधि बताया गया, वहाँ पर पहले एक बेर का पेड़ था, जिसके सहारे से लगा हुआ एक बड़ा सा पत्थर गड़ा हुआ था, जिसमें जटायु की आकृति अंकित थी. अभी दो-तीन वर्ष पूर्व और जाना हुआ, तब वहाँ रावण के राजवैद्य सुषैन की समाधि होने का भी ज्ञान हुआ. इसके संबंध में बताया गया कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से बचाने के पश्चात सुषैन वैद्य वापस लंका न जाकर इधर आ गये थे, उन्हें डर था कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से जागृत करने के कारण रावण या उसके अन्य कोई अनुयायी इन्हें जान से मार डालेंगे. इसलिए यहाँ आकर राजाश्रय मांगकर रहने लगे. कौशल्या मंदिर परिसर में एक लम्बा सा पत्थर का रखा हुआ है, इसे  ही सुषैन वैद्य का समाधि बताया जाता है. उसके संबंध में यह जन आस्था है कि उस स्थल की मिट्टी को लगाने से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिल जाती है.

  एक प्रश्न मन में बार-बार उठ जाता है कि पंद्रह वर्षों तक यहाँ भाजपा की सरकार थी. अजय चंद्राकर जी स्वयं संस्कृति मंत्री रहे हैं, तब इस कौशल्या जन्मभूमि के विवाद को स्पष्ट कर ऐतिहासिक सच्चाई को प्रमाणित क्यों नहीं किया गया? अब विपक्ष में जाने के पश्चात ज्ञान चक्षु अचानक कैसे जागृत हो गया?

  आप इस पर क्या कहते हैं...???