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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-छत्तीसगढ़ के लोकपथ की झांकी राजपथ पर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-छत्तीसगढ़ के लोकपथ की झांकी राजपथ पर


छत्तीसगढ़ के लोक संगीत और लोक जीवन का प्रगटीकरण करने वाले वाद्ययंत्रों की झांकी इस वर्ष देश के गणतंत्र दिवस समारोह में राजपथ पर आकर्षण का केन्द्र होगी। यह लोकपथ की झांकी है, जो राजपथ पर निकल रही है। छत्तीसगढ़ चूंकि कृषि प्रधान, वनाच्छादित प्राकृतिक संपदा से भरा-पूरा क्षेत्र है, इसलिए यहां के गीत, संगीत और वाद्ययंत्रों में प्रकृति का राग सुनाई देता है। छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में उपयोग में लाए जाने वाले लोक वाद्यों को जिनमें बस्तर का धनकुल, तुरही, तम्बुरा, खंजेरी, नगाड़ा, बांस, गढवा बाजा, डफड़ा, चिकारा, माडिय़ा, ढोल, सिंहबाजा, झांझ, मंजीरा, मोहरी आदि शामिल है, झांकी में प्रदर्शित होंगे। झांकी में छत्तीसगढ़ के स्थानीय रीति-रिवाजों के जरिये यहां के सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रदर्शित किया गया है।

छत्तीसगढ़ का राजगीत अरपा पैरी के धार महानदी है अपार सुनकर यह भली-भांति समझा जा सकता है। यहां की कला संस्कृति को समृद्घ करने वालों में यूं तो बहुत से लोगों का योगदान है किन्तु कुछ नाम ऐसे हैं जिनके बिना इसका वैभव अधूरा है। राजा चक्रधर सिंह, दाऊ रामचंद देशमुख, दाऊ मंदराजी, हबीब तनवीर, झाड़ूराम देवांगन, मुकुटधर पांडे, रामदयाल तिवारी, माधवराव सप्रे, देवदास बंजारे, लक्ष्मण मस्तूरिया, सूरूज बाई खांड़े, तीजनबाई, खुमान साव, देवीलाल नाग जैसे नाम शामिल हैं। रायगढ़, पेन्ड्रा, अर्जुन्दा, भिलाई, राजनांदगांव जैसी जगहों का छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में अपना स्थान है। सुसराल गेंदा फूल जैसे गानों के बीच रायपुर भी मौजूद है, जहां पर खाये के बीड़ापान सैंयाजी की शान अलग ही होती है।
छत्तीसगढ़ की समृद्घ कला, संस्कृति, लोकजीवन और जनजातीय नृत्यों को यूं तो देश-विदेश में होने वाले अनेक समारोह में शामिल किया गया है। कई बार तो छत्तीसगढ़ को जानबूझकर एकदम पिछड़ा हुआ, सिर पर सिंग लगाकर नाचने वाले, धनुष-बाण धारण करने वाले लोगों की धरती के रुप में भी दिखाया गया है। अभी भी बहुत सारे लोगों के मन में बस्तर के अर्धनग्न आदिवासी और घोटुल के नाम पर फैलाई गई भ्रांति के साथ अब नक्सलाईटों का खून-खराबा, हिंसा भी जगह बना चुकी है। छत्तीसगढ़ क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का 9वां बड़ा राज्य है। जहां बड़े-बड़े कल कारखाने हैं, जहां बिजली की आपूर्ति चौबीसों घंटे होती है।

सामान्यत: संस्कृति की दो धाराएं होती हैं जिनमें एक शासक वर्ग की और दूसरी शासित वर्ग की। छत्तीसगढ़ इस मामले में भाग्यशाली है कि यहां के राजा चक्रधर सिंह जैसे शासक हो या दाऊ रामचंद्र देशमुख या दाऊ मंदराजी जैसे कलाप्रेमी। यहां के संपन्न समझे जाने वाले सामाजिक लोगों ने भी यहां की लोक संस्कृति को बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। ये अलग बात है कि सरकारी तंत्र या सरकारी कार्यसंस्कृति से जुड़े लोगों ने यहां की संस्कृति को अपनी संपत्ति बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। राज्य के संस्कृतिकर्मियों, लोककलाकार, साहित्यकारों को जो पहचान, सम्मान और सहयोग संस्कृति के पोषकों की ओर से मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। राज्य बनने के बाद संस्कृति को इंवेंट में तब्दील कर बहुत सारे इंवेंट मैनेजरों ने लोक कलाकारों का हित मारकर उन्हे प्रदर्शन की वस्तु की तरह जगह-जगह परोसा किंतु जनता की कला,जनसंस्कृति बाजार की लाख मिलावट और हेराफेरी के बावजूद जीवित है। लोककलाकार मनरेगा में काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं। रिखी क्षत्री जैसे बहुत से दीवाने हैं जो यहां के वाद्ययंत्रों को सहज रहे हैं, संवार रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की लोककला लोकजीवन से पुष्पित पल्लवित होती है। यहां के पर्व और त्यौहार इस अंचल तथा जाति का सामूहिक आनंदोल्लास है जो विशेष अवसरों पर ऋतुओं के परिवर्तन पर खेती के उगने, लहलहाने और पकने पर अभिव्यक्त या प्रदर्शित होते है। इनके पीछे धार्मिक आस्था और विश्वास के रंग भी अभिव्यक्त होते हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों में राउत नृत्य, डंडा नृत्य, गेंड़ी नृत्य, देवार नृत्य, सुआ नृत्य, गौरा नृत्य, झूमर नृत्य, आंगनई नृत्य, रीना, सरहुल, करमा, पंथी, बार नृत्य, जात्रा नृत्य उल्लेखनीय हैं। राउत नृत्य अहीर लोगों का है तो खानाबदोश देवार जाति का देवार नृत्य। सैला-सरगुजा की उरांव जाति का। राउत राउत नृत्य कार्तिक अमावस्या से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा तक अनवरत रूप से चलता है। डंडा या सैला-नृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी से फागुन पूर्णिमा तक। गेंड़ी नृत्य हरियाली अमावस्या के दिन तो कार्तिक मास में- सुआ नृत्य। करमा छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक चर्चित नृत्य है जो सरगुजा के उरांव बड़े उल्लास से मनाते हैं जिसमें स्त्री पुरुष दोनों भाग लेते हैं। सुग्गी नृत्य मात्र स्त्रियों का है और इसी तरह गौरा भी झूमर नृत्य के लिए समय या त्यौहार की आवश्यकता नहीं। सभी जाति की स्त्रियां इसमें भाग लेती है।

गोवर्धन पूजा राउत नाचा का मूल है। यह एक उत्तेजक वीर नृत्य है जिसमें गीत कम व नृत्य अधिक रहता है। लाठी राउत की सज्जा का एक अंग है। लाठी चलाने की कला में वे बहुत प्रवीण होते हैं-
तेन्दू सार की लाठी, सेर भर घी खाई।
एक लाठी परगे, टें टे नरियाई।।

राउत नाच में अखरा का पूज्य और महत्वपूर्ण स्थान है। वह अस्त्र-शस्त्र विद्यार्जन की पाठशाला है। राउत नाच में नृत्यकों की वेशभूषा देखते ही बनती है। इस अवसर पर वे भड़कीली रेशमी, सूती, मखमली जरी कारीगरी से युक्त कपड़े धारण करते हैं। पैरों में मोजे, जूते, घुंघरु, बांधे घुटने तक धोती, कमर में करधन गले में तिलरी या पुतरी, मुंह पीले रंग से पुता हुआ, आंखों में चश्मा, सिर पर कागज के फूलों से बना गजरा दाये, में तेंदू की लाठी, बाये हाथ में ढाल सम्हाले, कौडिय़ों की माला गले से कमर तक। वीर श्रृंगार रस का इसका मूल स्त्रोत है, नाचते समय फटी गदका, पठा बनेठी आदि में अपनी निपुणता दिखाते हैं।

पंथी नृत्य सतनामी समाज का श्रम साध्य नृत्य है। निर्गुन भजन या गुरु घासीदास के गुणानुवाद के गीत गाये जाते हैं। पिरामिड बनाने की कलात्मकता इस नृत्य को विलक्षण बना देती है। कंवर जाति का वार नृत्य हर तीसरे वर्ष आयोजित होता है। नर्तकों की नृत्य के समय जो लोक वाद्य भी नगाड़ा-मांदर, ढोलक, तम्बूरा, डफ, चिकारा, ढिसकी, झांझ, सिगी खंजरी, बांसुरी, ढेकी, ढोल, तुड़बड़ी आदि प्रमुख लोक वाद्य है। यहां का संगीत-नृत्य प्रदान रहस, गीत गम्मत से पुराजोर नाचा तथा हाव भावयुक्त पंडवानी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उद्योषक हैं। रहस अर्थात रास याने भगवान कृष्ण का विविध लीलाभिनय। पूरी कथा को मामा-भांजे की कहानी कही जाती है। इसे कई लीलाओं में विभाजित कर खेला जाता है। नाचा में गीत और गम्मत दो अंग होते है। गीत नृत्य के साथ होता है और गम्मत अभिनय के रूप में। गम्मत का व्यंग्य बेधने वाला होता है। गम्मत और नाचा देखने लोग रात-रात रूकते हैं। लोककलाकार अपनी तात्कालिकता से सामयिक विषयों, विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।

पंडवानी छत्तीसगढ़ी लोकशैली में महाभारत गायन है और जिसे लोक बैले की संज्ञा दी जा सकती है। यह छत्तीसगढ़ी की अपनी विशेषता है। उत्तर भारत में महाभारत का पाठ स्त्रियों के लिए वर्जित है। वह मात्र द्विजों तक सीमित है। छत्तीसगढ़ में उस तरह का जेंडर भेद नहीं है, जैसा बाकी जगह। यही वजह है की यहां अधिकांश स्त्रियों द्वारा पंडवानी की प्रस्तुति की जाती है।

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का चित्रफलक अत्यंत व्यापक है। जिनका चित्रण यहां के लोकगीतो में देखने को मिलता है। नृत्य और संगीत छत्तीसगढ़ी में आदिवासियों का जन्मजात गुण है। संतोषपूर्ण, सरल, सहज जीवन और चारों और उन्मुक्त नैसर्गिक सौन्दर्य उनको गति प्रदान करता है। लोक संगीत कहीं का भी हो वह लोगों को अपने साथ बांधकर थिरकने पर मजबूर कर देता है। आदिवासी संगीत में सामुदायिक उत्सवों का एक जीवन्त स्वर है। सामूहिक सुख-दुख का दर्पण है। इनका संगीत से ही प्रारंभ होता है और संगीत में समाप्त होता है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति अत्यंत समृद्घ है जो यहां के पारंपरित लोकगीत एवं लोकनृत्य में दिखाई देती है। यहां की संस्कृति लोकसंस्कृति और जनजातीय संस्कृति में झलकती है। यहां के लोकगीत एवं जनजातीय नृत्य पूरे विश्व में प्रसिद्घ है। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में पंडवानी, भरथरी, चंदैनी, ढोलामारु, ददरिया, बांस गीत प्रमुख हैं। वहीं लोकनृत्यों में सुआ, राउत नाचा, करमा, ककसार, गौर नृत्य प्रमुख हैं। परघोनी नृत्य अथवा परघौनी नृत्य छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी लोगों का नृत्य है। इसे विवाह के अवसर पर बारात के स्वागत के समय किया जाता है।  
दाउ रामचंद्र देशमुख ने तत्कालीन नाचा शैली का परिष्कार कर उसे सामाजिक दायित्व बोध से जोडऩे का प्रयास किया। दाऊ मंदराजी की नाचा पार्टी के कार्यक्रम रायपुर, दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, नागपुर, जगदलपुर, अंबिकापुर, रायगढ़, अकलतरा, चांपा, बिलासपुर, बरगढ़, संबलपुर, टाटानगर के कई छोटे-बड़े शहर एवं गांव में हुए तथा लोगों ने पसंद किया। लोकनाट्य नाचा के माध्यम से अंचल की लोक संस्कृति को जीवंत रखने और उनके समुचित संरक्षण के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

हबीब तनवीर अपने नाटकों में छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पारंपरिक संगीत, वाद्य, नृत्य, गायन, अभिनय और मंच का अत्यंत कल्पनाशील प्रयोग किया। उन्होंने लोकनाट्य और लोककला की ताकत और शख्सियत को समझने, उसे दिल में गहरे उतारने का प्रयास किया। हबीब तनवीर ने स्काटलैंड, इंग्लैंड, वेल्स, आयरलैंड, हालैंड, जर्मनी, यूगोस्लाविया, फ्रांस और रुस इत्यादि देशों में श्रेष्ठ नाट्य प्रदर्शन किया। नया थिएटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों द्वारा उन्ही की भाषा और उन्हीं के लोक रुपों में प्रस्तुत छत्तीसगढ़ और राजस्थान की लोककथाओं का हबीब तनवीर द्वारा लिखित निर्देशित नए रुपों में, का सफल प्रदर्शन लोक तत्वों के सार्थक एवं प्रासंगिक प्रयोगों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। छत्तसीगढ़ी लोक नाट्य नाचा के जनक दाऊ मंदराजी भी ऐसे ही महान विभूति थे जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ी अंचल का नाम देश-विदेश में रोशन किया। राजा चक्रधर सिंह राजकीय कार्यो के अतिरिक्त अपना अधिकांश समय संगीत, नृत्य, कला और साहित्य साधना में लगाने लगे। उनके शासन काल में गणेश मेला अपने चरम पर था। रायगढ़ में देश-विदेश के संगीतज्ञ, कलाविद्, साहित्यकारों का आना-जाना पहले से अधिक होने लगा। कहा जाता है कि उस समय भारत का ऐसा कोई भी महान कलाकार या साहित्यकार नहीं था, जो राजा चक्रधर सिंह के दरबार में आतिथ्य और सम्मान न पाया हो। इनमें पं. ओकारनाथ, मनहर बर्वे, नारायण व्यास, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, भगवतीचरण वर्मा, डॉ, रामकुमार वर्मा. पं. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे महान साहित्यकार शामिल थे।