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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- छत्तीसगढ़ : क्या खोया क्या पाया

   प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- छत्तीसगढ़ : क्या खोया क्या पाया

छत्तीसगढ़ की अमीर धरती के गरीब लोगों ने अपने राज्य की स्थापना के बीस वर्षों का सफर तय कर लिया है। इस बीस साल के सफर में यहां के लोगों ने क्या खोया और क्या पाया इस पर विचार जरूरी है। झारखंड और उत्तराखंड के साथ छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था और यह बात खूब जोर-शोर से प्रचारित की गई थी कि छोटे राज्यों में विकास की गति तेज होती है। शासन-प्रशासन जनता के नजदीक होता है या कहें उसकी पहुंच में होता है जिसकी वजह से वहां लालफीताशाही नहीं पनप पाती। सब काम फैसले तेजी से होते हैं। राज्य के मंत्रालय, विधानसभा कार्यालयों तक यदि जनता की पहुंच से दूर हैं और वहां स्थायी कोरोना काल होने से जनता की उपस्थिति बाधित है तो क्या यह बेहतर प्रशासन की निशानी है? क्या छोटे राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था इतनी साफ-सुथरी ईमानदार और जनता के प्रति जवाबदेह होती है कि बिना किसी सिफारिश, रिश्वतखोरी के लोगों के काम हो जाते हैं? तीनों राज्यों की जनता से जाकर यदि यह सवाल पूछे जाए तो वे अपनी आपबीती बयां करेंगे जिसके बाद आप कह सकते हैं कि राज्य छोटा हो या बड़ा इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि वहां की प्रशासनिक व्यवस्था कैसी है, वहां का नेतृत्व क्या चाहता है।

छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से पिछड़ेपन और विकास के समान अवसर नहीं मिलने के कारण अलग राज्य बना था। भाजपा के बौद्धिक वर्ग छोटे राज्य की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि राज्य छोटे होंगे तो केंद्र मजबूत होगा। छत्तीसगढ़ में अन्य छोटे राज्यों की तरह राजनीतिक अस्थिरता का माहौल नहीं है। राज्य बनने के प्रारंभ में विधायकों की खरीद-फरोख्त और तीसरा दल बनाने की कोशिश हुई किन्तु यहां के लोगों को दो दलीय व्यवस्था ही पसंद है। यही वजह है कि यहां चाहे विद्याचरण शुक्ल रहे हो या अजीत जोगी दोनों के ही नेतृत्व वाले क्षेत्रीय दल को कोई खास सफलता नहीं मिली।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के साथ ही यहां के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने एक विजन डाक्यूमेंट तैयार किया और आने वाले बीस-पच्चीस साल बाद का छत्तीसगढ़ कैसा होगा इसकी कल्पना की थी। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित के माध्यम से छत्तीसगढ़ की एक जनरपट भी तैयार की गई थी। छत्तीसगढ़ बनने के बाद फौरी तौर से तत्कालिक व्यवस्था के अंतर्गत रायपुर के डी.के. हास्पिटल को मंत्रालय, जल संसाधन विभाग के रिसर्च सेंटर को विधानसभा भवन बनाया गया। बाद में यातायात के बढ़ते जनदबाव और जरूरतों को ध्यान में रखकर नई राजधानी बनाने की परिकल्पना की गई। सोनिया गांधी ने इस नई राजधानी परियोजना का शुभारंभ किया। 2004 में भाजपा की सरकार ने के बाद नई राजधानी निर्माण को गति मिली, जो आज तक जारी है। इस बीच 2012 में नई राजधानी में मंत्रालय, विभागाध्यक्ष कार्यालय सहित बहुत से दफ्तर शिफ्ट हुए। जंगल सफारी, पुरखौती मुक्तांगन, आईआईएम, आईआईटी, सांई हार्ट केयर, बालको कैंसर इंस्टटीयूट जैसे संस्थान नये रायपुर की पहचान बने। भूपेश बघेल सरकार अब यहां नया विधानसभा के साथ-साथ राजभवन, मुख्यमंत्री, मंत्री निवास बनाने जा रही है। नई राजधानी में आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर मेफेयर जैसे हॉटल, गोल्फ क्लब आदि भी संचालित हैं। राज्य बनने के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में नवा रायपुर है जिस पर छत्तीसगढ़ गौरवान्वित हो सकता है। राज्य बनने के बाद से प्रशासनिक कसावट और व्यवस्था की दृष्टि से नये जिले बने, तहसीलें बनी हैं। बहुत सी कंपनियों के आफिस यहां आये। बिलासपुर में हाईकोर्ट बना। तालाबों का सौंदर्यीकरण हुआ। टाइगर रिजर्व बढ़े। सिरपुर जैसे पर्यटक केंद्र को नये सिरे से सजाया-संवारा गया। पर्यटकों के लिए बहुत से मोटेल बने किन्तु यह व्यवस्था उतनी कारगर साबित नहीं हुई जैसा इसे बनाते समय सोचा गया था। किसी भी राज्य में बहुत सारी व्यवस्था, निर्माण अपने लोगों को उपकृत करने के लिए किये जाते हैं, चाहे उनकी जरुरत हो या न हो।

राज्य बनने के बाद से सर्वाधिक कार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में हुआ। छत्तीसगढ़ की अस्मिता को लेकर भी इधर के सालों में कुछ ज्यादा फोकस रहा है। सरकारों ने राज्य उत्सव के दौरान छत्तीसगढ़ की विभूतियों के नाम से अलकंरण और पुरस्कारों की परंपरा प्रारंभ की। सरकार द्वारा पिछले बीस सालों में कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति नहीं बनाने के कारण छत्तीसगढ़ की कलाओं का जो विकास और संवर्धन होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। आज तक हबीब तनवीर के नाम से किसी प्रकार का संस्थान नहीं बन पाया इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ सिनेमा का जिस तरह से विस्तार हुआ, उसके लिए भी सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं थी। सरकार ने फिल्म सिटी बनाने की घोषणा की है जिसकी उतनी जरूरत नहीं है जितनी की फिल्म एंड टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान की।
यदि हम शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो प्रायमरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है। राज्य बनने के समय प्रायमरी स्कूलों की संख्या जहां 13 हजार के आसपास थी वह आज बढ़कर 37 हजार हो गई है। इंजीनियरिंग कालेज 14 से बढ़कर 49 हो गए हैं। मेडिकल कालेजों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। आई.आई.एम, आई.आई.टी, ट्रिपल आई.टी., एनआईटी एम्स जैसी संस्थाएं भी राज्य बनने के बाद यहां आई है। बिलासपुर, रायगढ़, जगदलपुर, राजनांदगांव, अंबिकापुर सभी जगह मेडिकल कालेज का होना छत्तीसगढ़ में बढ़ती स्वास्थ्य सेवाओं का परिचायक है।

शांति का टापू कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी ताकत है उसके मेहनतकश शांत प्रवृत्ति के संतुष्ट नागरिक। जब पूरे देश में लॉकडाउन के कारण वहां के प्रवासी मजदूरों को रोजी-रोटी कामकाज के लिए भटकना पड़ा वहीं छत्तीसगढ़ के मजदूरों को न केवल घर बैठे काम मिला बल्कि यहां के किसानों को राजीव गांधी न्याय योजना के जरिये 300 करोड़ का नगद भुगतान हुआ। गोबर खरीदी और धान खरीदी के जरिये उनके खाते में नगद राशि जमा हुई। आज छत्तीसगढ़ की आर्थिक व्यवस्था दूसरे राज्यों की तुलना में बेहतर है और यहां की बेरोजगारी की दर देश में सबसे कम है।

छत्तीसगढ़ के बीस साल के सफर में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न रही हो उसका फोकस कृषि और सिंचाई को बढ़ावा देकर खेती किसानी को बेहतर बनाने का रहा है। छत्तीसगढ़ की तीन शुगर मिल, रबी के रकबे में बढ़ोत्तरी, सिंचाई क्षमता में वृद्धि और कृषि उत्पादन दर का राष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से ज्यादा होना इस बात का प्रमाण है।

किसी समय धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ ने स्टील के क्षेत्र में भी अपनी नई पहचान कायम की। सरप्लस पावर वाले छत्तीसगढ़ में बिजली की सतत आपूर्ति और श्रमिकों की उपलब्धता ने स्टील व्यवसायियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करके उन्हें यहां उद्योग-धंधे स्थापित करने मजबूर किया। छत्तीसगढ़ के बजट में भी इस बीच 18 गुना का इजाफा हुआ। सरकार लाख प्रयास के बावजूद छत्तीसगढ़ गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या आज भी 39.99 प्रतिशत है।

जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लडऩेे वाला यहां का वनवासी लंबे समय से नक्सलवाद की चपेट में है। बस्तर के आदिवासियों को सलवा जुडुम के नाम से लामबंद पर नक्सलियों से निपटने की कोशिश हुई जो नाकाम रही। नक्सलियों द्वारा झीरम घाटी में कांग्रेस के बड़े नेता विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा सहित बहुत से नेताओं की निर्मम हत्या करके लोगों के बीच आतंक पैदा करने की कोशिश की गई किन्तु छत्तीसगढ़ की जनता ने अपना हौसला नहीं खोया।

छत्तीसगढ़ ने अपनी इस बीस साल की यात्रा में यदि बहुत सी उपलब्धियां दर्ज की है तो बहुत कुछ खोया भी है। छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले हबीब तनवीर, झाडूराम देवांगन, देवदास बंजारे से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, अजीत जोगी, रामचंद्र सिंहदेव, दिलीप सिंह जूदेव, बलीराम कश्यप, लखीराम अग्रवाल जैसे बहुत से ख्याति नाम लोग हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ को सजाया संवारा उन्हे हमने अपने बीच से खोया भी है।